18 अप्रैल, 2017 को आई.आई.सी.अनेक्सी, नई दिल्ली में इंडियन ट्रस्ट फॉर रुरल हेरीटेज एण्ड डेवलपमेंट (आईटीएचआरडी) द्वारा आयोजित किए गए विश्व धरोहर दिवस समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | अप्रैल 18, 2017

संस्कृति केवल गीत, नृत्य अथवा वास्तुकला ही नहीं बल्कि उससे कहीं बढ़कर है। यह ज्ञान, अनुभव, आस्थाओं, मूल्यों, दृष्टिकोणों, अर्थों, तारतम्यों, धर्म, समय की अवधारणाओं, भूमिकाओं, स्थानिक संबंधों, ब्रह्माण्ड की संकल्पनाओं के साथ-साथ व्यक्ति और समूह के प्रयास से पीढ़ियों तक व्यक्ति समूह द्वारा उपार्जित भौतिक वस्तुओं और सम्पत्तियों का भण्डार है।

संस्कृतियों को उन समाजों से पृथक नहीं किया जा सकता जिनमें वे जन्म लेती हैं, फलती-फूलती हैं, और, कभी-कभी नष्ट हो जाती है तथा अन्य संस्कृतियों में मिल जाती है अथवा पूर्ण रूप से मिट जाती हैं। सांस्कृतिक सीमाएं व्याप्त होती हैं किन्तु "परम्परा" अथवा "संस्कृति" शब्द आसानी से एक समाज और इसकी सांसारिक, रैखिक मौजूदगी का पता चलता है। परम्परा, और संस्कृति एक दूसरे से जुड़े हुए हैं क्योंकि ये दोनों पहचान के प्रत्यय है जो किसी विशिीष्ट समाज के द्योतक के रूप में समझा जा सकता है जो कि समस्या खड़ी कर सकता है।

प्रत्येक संस्कृति स्वयं अपनी कतिपय अनूठी विशेषताएं विकसित करती हैं जो अपनी सम्पूर्णता और अन्तर्संबद्धता में अपनी प्रबल अभिसंरचना का गठन करती और इसे अन्य संस्कृतियों से अलग बनाती है। भारतीय संस्कृति अपनी सनातनता एवं विविधता, अपनी सामंजस्यपूर्ण स्वरूप और अपनी सामासिक बहुलतावादी पहचान के संबंध में अन्य संस्कृतियों से विशिष्ट है।

भारत ने संसार के भिन्न-भिन्न हिस्सों की सांस्कृतिक धाराओं के मेजबान की भूमिका अदा की है। समय बीतने के साथ, वे भारत में समामेलित और यहां के जीवन के अनुकूल हो गई। विभिन्न समुदायों के बीच स्वीकृति और अनुकूल की प्रक्रिया ने एक ओर भारत की अभिलाक्षणिक विविधता को और दूसरी ओर, हमारी सामासिक सांस्कृतिक परम्परा को जन्म दिया है।

हमारी बहुरंगी सांस्कृतिक छवि के विकास को शायद रघुपति राय फ़िराक़ द्वारा सारगर्भित ढंग प्रस्तुत किया था:

सर जमीं-ए-हिंद पर अक़्ो-वाम-ए-आलम के फ़िराक़,
कारवां आते गए हिन्दोस्तां बनता गया।

लगभग एक शताब्दी पूर्व, डा. तारा चन्द ने यह समीक्षा की थी:

“भारतीय संस्कृति की प्रकृति संश्लिष्ट है। इसमें भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं के विचार सम्मिलित हैं। इसके दायरे में विश्वास, रीति-रिवाज, संस्थाएं, कला, धर्म तथा विकास के विभिन्न चरणों में समाज के स्तरों से संबंधित दर्शन समाविष्ट है। यह हमेशा से ही विजातीय तत्वों में एकात्मकता तलाशती रहती है जो इसे सम्पूर्ण बनाती है। खराब से खराब स्थिति में यह यंत्रवत होती गई और अच्छी स्थिति में इसने सफलतापूर्वक एक मूलभूत व्यवस्था को जन्म दिया।"

कुछ लोग विविधता और अनेकता की सराहना करते है जैसी भारत में है। यहां संसार के सभी धर्मों का सम्मान करता है, और हमारे देश की भाषायी और सांस्कृतिक विविधता बेजोड़ है। इस विविधता के बावजूद, भारत में लोग सदियों से मिलजुल कर रहते आए हैं और रहते रहेंगे।

जैसा कि महान साहित्यकार रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा,

“हमारे समक्ष अनेक कठिनाइयां होने के बावजूद, भारत ने कुछ उल्लेखनीय किया है। इसने भिन्न-जातिगत समूहों के बीच, जहां कही भी वास्तविक मतभेद थे, उन्हें स्वीकार करते हुए उनमें समायोजन करने का प्रयास किया और इसके अलावा भी उनमें एकता का कुछ-न-कुछ मूलतत्व खोजा।”

अक्सर यह मान लिया जाता है कि भारत में एकता है तथा उसे बिना प्रमाण के सही ठहराया जाता है; शायद ही कभी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इसकी आलोचनात्मक जांच की गई है। यह शायद इसलिए है क्योंकि एकता की जो भावना भारतीय समाज के ढांचे में व्याप्त है वह अमूर्त है। फिर भी यह प्रत्येक भारतीय के मन में जीवित है और दैनिक जीवन के सामासिक एवं विविध परिवेशों में दिखाई देती है।

सदियों से हमारे समाज ने एक अनूठा और बौद्धिक माहौल प्रदान किया है जिसमें अनेक अलग-अलग सांस्कृतिक धाराएं न केवल शांतिपूर्वक अपितु साथ-साथ रही है अपितु उन्होंने एक-दूसरे को समृद्ध भी बनाया है। सांस्कृतिक बदलाव का भारतीय नजरिया समेकित सामंजस्य में से एक है। भारतीय संस्कृति की विविधता का परिदृश्य न केवल नये एवं विभिन्न तत्वों के प्रति उदारता का परिणाम है अपितु उन्हें स्वीकार भी करता है।

इसे हमारे दैनिक जीवन के सभी पहलुओं में देखा जा सकता है। इस पर भरोसा करने के कारण विद्यमान हैं, इसलिए, वैश्वीकरण की मौजूदा लहर भारत की सांस्कृतिक पहचान को मिटा नहीं पायेगी अपितु वैश्वीकृत होती संस्कृति में भारतीय आयाम जुड़ जायेगा।

सांस्कृतिक कलाकृतियों का आनन्द उठाने तथा समुदाय के सांस्कृतिक जीवन में भागीदारी का हमारा अधिकार संयुक्त राष्ट्र के 1948 के मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में प्रदर्शित होता है। यह कलाकृतियों और सांस्कृतिक वस्तुओं के गैर-कानूनी व्यापार; पुरातात्विक स्थलों पर लूट-मार; तथा एतिहासिक इमारतों और संस्मारकों की तोड़-फोड़ को निषिद्ध बनाता है, चूंकि इससे किसी भी समुदाय की सांस्कृतिक की विरासत को अपूरणीय क्षति पहुंचती है। इन सिद्धान्तों पर सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के संबंध में यूनेस्को के विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमयों में जोर दिया गया है। हमारे संविधान में, अनुच्छेद 49 राज्य को कलात्मक और एतिहासिक रूचि के संस्मारकों और वस्तुओं को नुकसान पहुंचाने और नष्ट करने से संरक्षित करने का निदेश देता है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 51क(च) प्रत्येक नागरिक को कर्त्तव्यबद्ध करता है कि वह हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे।

कानून और विनियम हमें कार्यवाही करने के लिए तो ढांचा प्रदान कर सकते हैं किन्तु हमारी बहुलवादी विरासत के मूल्यों से अपनी युवा पीढ़ी को शिक्षित करना शायद यह सुनिश्चित करने का सर्वोत्तम मार्ग होगा कि हमारी विरासत संरक्षित रहे। मैं इंडियन ट्रस्ट फॉर रुरल हेरीटेज एंड डेवलपमेंट की हमारी सांस्कृतिक विरासत ग्रामीण क्षेत्रों में मूर्त और अमूर्त दोनों, को संरक्षित रखने में उनकी पहल और युवा पीढी को शिक्षित करने और इस मुद्दे के बारे में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए सराहना करता हूं। मैं उनके भावी प्रयासों में सफलता प्राप्ति की कामना करता हूं तथा आप सभी को विश्व विरासत दिवस की बधाई देता हूं।
जय हिन्द।