13 अप्रैल, 2017, को मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद में भारत के उपराष्ट्रपति माननीय श्री मो. हामिद अंसारी द्वारा मोहम्मद कुली कुतुब शाह पर दिया गया व्याख्यान

हैदराबाद | अप्रैल 13, 2017
समृद्ध इतिहास की क्षेत्रीय विरासत

आसमां बारे अमानत न तवानस्त कासिर
कुरा-ए-फाल ब नाम-एमन-ए दिखाना जदोद

मैं इसे अपना सौभाग्य समझता हूं कि मुझे मौलाना आज़ाद (राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में पहला मोहम्मद कुली कुतुबशाह स्मारक व्याख्यान देने का अवसर मिला है, मुझे आज यहां आमंत्रित करने के लिए मैं कुलपति, प्रोफेसर अशलम परवेज़ को धन्यवाद देता हूं।

इस व्याख्यान के लिए इस से बेहतर कोई और जगह नहीं हो सकती थी। 'स्वर्ग की प्रतिकृति' के रूप में अभिकल्पित इस शहर की स्थापना मोहम्मद कुली कुतुबशाह ने ही की थी। 17वीं सदी के आरंभिक वर्षों में यहां आए एक अंग्रेज यात्री ने इसकी 'ताजी हवा' पानी की सुविधा और उपजाऊ मिट्टी' के लिए इसकी प्रशंसा की थी और इसे मुगल साम्राज्य या किसी अन्य रियासत के किसी और शहर के मुकाबले ऊंचा दर्जा दिया था।

एक और वजह से यह विषय और यह स्थान एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है दक्खिनी उर्दू की उत्पत्ति यहीं हुई है और वह बीजापुर तथा गोलकुंडा की रियासतों की दरबार की भाषा रही है। मोहम्मद कुली कुतुबशाह ने स्वयं स्वीकार किया था कि वह प्रतिदिन ऐसे काव्य रचते थे जैसे 'नदी में लहरें उठती-गिरती हैं' और वह दीवान का संकलन करने वाले पहले व्यक्ति थे। हाफिज़ की रचनाओं का पहले-पहल अनुवाद उन्होंने ही किया और उनके इस प्रयासों से ही 'फारसी काव्य शैली का जन्म हुआ और दाबिस्तान-ए-गोलकुंडा में इसका प्रयोग शुरू हुआ।1

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार वह स्वभाव से सुरूचिपूर्ण और 'रसिक प्रवृत्ति' के थे, और यह उनके काव्य में भी पर्याप्त रूप से परिलक्षित होता है। 'तुलसीदास, मीराबाई और सूरदास के समकालीन मोहम्मद कुली कुतुबशाह का काव्य जमीन से जुड़ा हुआ है और वह प्रेम व रहस्यात्मक अनुभवों की सार्वभौमिकता का बखान करता है।' इसमें गहन भारतीयता और धर्मरिपेक्षता का भाव निहित है।' सत्रहवीं शताब्दी के इतिहासकार मोहम्मद क़ासिम फरिश्ता ने उनके स्वभाव को 'क्षमाशील और नम्र' बताया है।

हैदराबाद के निर्माण का कार्य 1590-91 में प्रारंभ हुआ था। हैदराबाद के संस्थापक ने नए शहर के लिए अपनी मनोकामना की अभिव्यक्ति इस शेर में की है:-

मोरा शहर लोगों से मायूर कर
रख्यां जुं तुं दरिया मै मिनया सामेई

इस नए शहर के निर्माण के पीछे की सच्चाई चाहे कुछ भी हो, हमारे दौर के एक शायर ने इससे जुड़ी लोकप्रिय भावनाओं का इजहार कुछ यूं किया है:

शहर बाक़ी है, मुहब्बत का निशां बाकी है
तू नहीं है तेरी चश्म-ए-निगारांबाकी है।

प्राचीन एथेंसवासियों की ही भांति हैदराबादी भी अपने शहर को देखते हैं और उससे प्यार करते हैं। इस शहर के आकर्षणों के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। प्रोफेसर आगा हैदर हसल मिर्ज़ा का निबंध संग्रह 'हैदराबाद की सैर' और अल्लामा एजाज फारूख का 'हैदराबाद शहर-ए-निगारों' इसके साक्षी हैं। सिब्ते हसन ने इनका उल्लेख एक ऐसी जगह के रूप में किया है जहां उनकी चेतना को जीवन की सुन्दरता का बोध हुआ और जहां उन्होंने मनुष्य से प्रेम करना सीखा। नरेंद्र लूथर ने इस शहर के इतिहास पर और बसंत बावा ने निजामशाही के अंतिम चरण पर अपनी लेखनी चलाई है तथा सैयद इमाम ने इस शहर की अलग-अलग पीढ़ी और जीवन के हर क्षेत्र के प्रशंसकों की 38 रचनाओं का संकलन तैयार किया है।

II

कुतुबशाही साम्राज्य के इतिहास पर विचार करते समय उस युग और स्थान के संदर्भ पर भी विचार करना जरूरी है, कुतुबशाही वंश केवल 164 वर्ष तक सन 1523 से 1687 तक-चला और इसके अंतिम शासक अबुल हसन ने एक मुगल सेनापति के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इस छोटी सी कालावधि में इसके अधीन स्थापत्य, काव्य, संगीत, कला, नृत्य और पाककला खूब फली-फूली और यह शहर अंतरराष्ट्रीय व्यापार का जीवंत केंद्र होने के साथ-साथ संस्कृति का पर्याय भी बन गया था।

हमारे इतिहास के मध्यकाल में तीन शताब्दियों तक हमारी भारतीय भूमि की एक अस्तित्वपरक वास्तविकता थी-उत्तर भारत में स्थित एक केंद्रीय शक्ति की प्रधानता, मुगल शासक अकबर की दक्षिण नीति के बारे में एक जीवनीकार ने लिखा है, "अकबर एक बाज की तरह उतरी क्षितिज पर तब तक मंडराता रहा और दक्षिणी राज्यों के शासकों को लड़ते-झगड़ते, दूसरे को विदीर्ण करते देखता रहा जब तक कि उनका शिकार करने का उसका खुद का समय न आ गया," परिणामस्वरूप, एक और इतिहासकार के शब्दों में "दक्कन का अपना कोई प्रमुख इतिहास नहीं है लेकिन इसका उत्तरी भारत के लोगों, संस्कृतियों और राज्यों के साथ गहन सम्पर्क होता रहा है, जो हमारे समय में नर्बदा के दक्षिण में स्थित समाजों के लिए एक प्रकार के प्रतिरूप बन गए। व्यक्ति, समुदाय और संपूर्ण राज्य अपनी पहचान को उत्तर के इस विशाल साम्राज्य के संदर्भ में ही परिभाषित करते रहे-कभी इसके विरोध में तो कभी इसकी नकल में"। ये स्वतंत्र या अर्द्धस्वतंत्र इकाइयां किसी न किसी प्रकार का आधिपत्य स्वीकार कर अलग-अलग अवधियों तक साम्राज्यवादी हमले से बची रहीं। इस प्रक्रिया में उन्होंने शासन की अपनी शैली विकसित कर ली। उन्होंने धर्म को शासन-कला से और संस्कृति को प्रादेशिक सीमाओं से अलग करके रखा और इस प्रकार स्वयं को काफी उदार और राष्ट्र से परे छवि प्रदान की।’5

समाज के भिन्न-भिन्न तबकों के बीच संबंध बनाने में सूफी-संतों की भूमिका की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। इसकी वजह से अंतत: धर्मों और संस्कृतियों का मेल-मिलाप हुआ।

दक्कन राज्यों की शासन-कला के दो पहलुओं को पहचाना जा सकता है और वे उल्लेखनीय हैं। पहला, शासन का दर्शन और राज्य की प्रजा के प्रति एक व्यावहारिक नीति अपनाए जाने की आवश्यकता थी। दूसरा, उन भू-राजनीतिक अवधारणाओं से संबंधित था जिसको उन्हें भारतीय उप महाद्वीप में प्रभुत्व प्राप्त शक्ति के संदर्भ में सामना करना पड़ा।

कुत्ब-शाही ईरानी मूल के थे और उनमे ईरान के साथ उनके संबंध, विशेष रूप से वर्ष 1501 के पश्चात् जब शाह इस्माइल ने सांप्रदायिक कट्टरता को अपनाया, के प्रति उत्पन्न मजबूत धार्मिक संबद्धता का भाव था। इसके होते हुए भी, शासन की उनकी नीति व्यवहारिक और धर्मनिरपेक्ष थी। मोहम्मद कुली कुतुब शाह के पिता इब्राहिम के शासनकाल में प्रशासनिक प्रणाली के बारे में लिखते हुए इतिहासकार हारून ख़ान शेरवानी ने उल्लेख किया है कि जहां तक राज्य के कार्यों का संबंध है हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बहुत मामूली भेदभाव किया जाता था। यही स्थिति मोहम्मद कुली कुतुब शाह के शासनकाल में भी थी जब उस युग की विशेषता वह सौहार्द था जो हिन्दू और मुसलमान संप्रदायों के बीच मौजूद था और सरकार की पूरी नीति राज्य के सभी अधिकारियों के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों के बीच व्यवहारिक रूप से अवसरों की समानता की रही थी। उसी इतिहासकार के अनुसार उनके दरबार में मुसलमानों और गैर-मुसलमानों की संस्कृति का एक जैसा प्रतिनिधित्व था, और यद्यपि वह मुसलमानों के गैर-शिया पंथ के प्रति अपने उल्लेख के कारण पक्षपातपूर्ण लगता है, तथापि, जहां तक उनकी जीवनशैली को उनके द्वारा सराहे जाने का संबंध है, वह सांस्कृतिक रूप से हिन्दुओं और पारसियों और साथ ही आम आदमी के निकट दीखते हैं। परिणामस्वरूप राज्य और सुलतान का समग्र दृष्टिकोण गैर-साम्प्रदायिक था।’9

इस नीति की उदारता का एक अन्य पहलू तेलुगू के प्रति सुलतान का दृष्टिकोण था। उनके पिता जिन्होंने सात वर्ष विजयनगर में सम्मानित अतिथि के रूप में व्यतीत किए, के मन में इस भाषा के प्रति प्रेम विकसित हो गया और यही भावना मोहम्मद कुली के लिए थी जिनके लिए तेलुगू 'मातृभाषा की तरह' थी और जिन्होंने अपनी दक्खिनी उर्दू कविताओं में तेलुगू शब्दों का प्रयोग किया, उसके साहित्यकारों को संरक्षण प्रदान किया और उनके फरमान और सरकारी घोषणाएं द्विभाषी हुआ करती थीं।10

इस प्रकार सुलतान ने दक्कन में संस्कृतियों को मिलाने का सुविचारित प्रयास किया और हैदराबाद के लोगों में सहिष्णुता, दृष्य और प्रकृति की कोमलता के प्रति प्रेम के गुणों का समावेश किया। यह बिल्कुल भी इत्तफाक नहीं है कि उनका एक उत्तराधिकारी 'कुचीपुड़ी' नृत्य कला का संरक्षक बना।12

मोहम्मद कुली कुतुब शाह का हमारे इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है और उनके व्यक्तित्व और योगदान का अध्ययन वास्तुशिल्प, भाषा और संस्कृति के विकास में रूचि रखने वालों के लिए काफी लाभकारी है। शांति और कूटनीति की उनकी नीति ने उनके सत्ता में रहते हुए मुगल राजनीतिक प्रभाव को हावी नहीं होने दिया और 31 वर्षों तक शासन करने के बाद 31 जनवरी, 1626 को उनकी मृत्यु के बाद ही बादशाह शाहजहां के लिए दक्कन के राज्यों पर अपना आधिपत्य जमाने के उसके मंसूबों के रास्ते खुल गये।13

III

शासनकला की शब्दावली में राजनीतिक सत्ताओं के बीच अधिक से अधिक प्रभाव जमाने के प्रयास श्रेष्ठता, प्रभुत्व या आधिपत्य का स्वरूप ले लेते हैं। सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रायद्वीपीय भारत के राजनीतिक भूगोल की प्रमुख विशेषता विजयनगर साम्राज्य तथा (बहमनी साम्राज्य के पतन के पश्चात्) अहमदनगर, बीजापुर, बीदर, बरार और गोलकुंडा जैसी पांच छोटी सत्ताओं की श्रेष्ठता थी। यह स्थिति 1565 में तालीकोटा की लड़ाई तक बनी रही जिसमें उत्तरी सत्ताओं में से चार ने मिलकर विजयनगर को बुरी तरह से पराजित कर दिया।

उस अवधि के दौरान इस क्षेत्र का एक अन्य पहलू ईरानी पठार के साथ तीव्र गति से होने वाले व्यावसायिक और सांस्कृतिक सम्पर्क का रहा 'जिसने पूरे दक्कन को फारसी संस्कृति की परिधि में लाने का काम किया।' इसमें सांप्रदायिक संबद्धता तथा कुछ हद तक राजनीतिक संबद्धता को साभिप्राय व्यक्त करने के लिए शुक्रवार के प्रवचन (खुतबा) में फारस के शाह का उल्लेख करना शामिल था।

दक्कन के क्षेत्रीय राज्य तंत्र ने अंतर-राज्य संव्यवहार के लिए अपने नियम भी विकसित किए थे और बरार व अहमदनगर में मुगलों के आकस्मिक हमलों को देखते हुए क्षेत्रीय वैमनस्य को भुला दिया गया और 'घुसपैठियों को रोकने के लिए बीजापुर और गोलकुंडा अपने झगड़ों को भुलाकर एक हो गए।'’15

इस प्रकार, दक्कन की सत्ताओं के प्रति मुगलों के इरादों और दक्कन की सत्ताओं की फारस से संबद्धता के परिणामस्वरूप अनिवार्य रूप से हितों और अनुभूतियों का टकराव हुआ। उस समय के द्विपक्षीय संबंधों पर किए गए अध्ययन में यह निष्कर्ष निकला कि 'फारस और दक्कन के बीच की दूरी और फारस के पास नौसैना की शक्ति न होने के कारण फारस के लिए दक्कन को भौतिक सहायता उपलब्ध कराना असंभव था, हालांकि शाह अब्बास (प्रथम) जैसा शक्तिशाली शासक कूटनीतिक सहायता प्रदान कर सकता था। फारस और दक्कन के साम्राज्यों के बीच राजनीतिक संबंधों तथा गोलकुंडा में प्रवचन (खुतबा) के दौरान शाह का नाम उच्चारित किए जाने से मुगल, विशेषत: शाहजहां जैसे शक्तिशाली सम्राट चिढ़े हुए थे। साथ ही, उत्तराधिकार की लड़ाई के दौरान शाह अब्बास (द्वितीय) द्वारा दक्कन के राजाओं को मुगलों के खिलाफ उकसाने का प्रयास करना भी इतना ही आपत्तिजनक था।'’16

इस वजह से मुगलों के आधिपत्य स्थापित करने के प्रयास जारी रहे। इस तरह शाहजहां के शासनकाल में दक्कन के शासकों को इंकियादनामों अथवा आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने को विवश किया गया। उनका ब्यौरा बहुत रोचक है। गोलकुंडा के मामले में, दस्तावेज में विनिर्दिष्ट स्वीकार्यता को मुगल सम्राट का 'परंपरागत अनुयायी' कहा गया था और इसमें (1) बारह इमामों और फारस के शाह के नामों को हटाकर उनकी जगह चार खलीफाओं और मुगल सम्राट का नाम रखने (2) सोने और चांदी के सिक्कों को सम्राट द्वारा पारित सूत्र के अनुसार बनाने (3) वार्षिक शुल्क के रूप में एक निर्धारित धनराशि भेजने (4) सम्राट के मित्रों को मित्र मानने और उसके शत्रुओं को शत्रु मानने (5) इन सभी प्रतिबद्धताओं का अनुसरण करने के लिए कुरान की कसम खाने की बात कही गई थी और 'यदि वह सही रास्ते से भटकेगा तो सम्राट को अधिकार होगा कि वह अपने सेवकों को उस साम्राज्य को जीतने का आदेश दे' और (6) यदि कोई पड़ोसी हमला करके गोलकुंडा के भूक्षेत्र को हथिया ले, तो उसे आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने और उसे हुई क्षति की पूर्ति करने की बात कही गई थी।17

इस प्रकार 'सुल्तान' से 'परंपरागत अनुयायी' के रूप में बदलाव से जागीरदारी प्रथा की स्थिति को स्पष्ट कर दिया गया। इसके बावजूद, सफावितों और मुगलों में प्रभुत्व जमाने और उसे सीमित करने का विस्तृत कूटनीतिक खेल जारी रहा। इसी प्रकार, गोलकुंडा आने वाले ईरानी व्यापारियों को स्थानीय शासक के नाम शाह का पत्र देकर भेजना भी जारी रहा और मुगल राजदरबार में इस पर कड़ी आपत्ति की गई। ईरानी शासकों द्वारा ईरानी वंश के अधिकारियों के माध्यम से स्थानीय प्रभाव को बढ़ाने के लिए भी इसी प्रकार के प्रयास किए गए। इन शासकों में सबसे प्रसिद्ध नाम अमीर और साधन-संपन्न हीरा व्यापारी मुहम्मद सईद, जिसे मीर जुमला नाम के आधिकारिक खिताब से जाना जाता था, का है जो शाह अब्बास (द्वितीय) के साथ पत्र-व्यवहार करता रहता था। इस कारण मुगलों ने बदला लेने के लिए हैदराबाद पर हमला कर दिया और अब्दुल्ला कुत्ब शाह को शाह अब्बास से 'मुगलों की सीमा पर कुछ फारसी सैन्य-टुकड़ियों को तैनात करने और आक्रमण के खर्च का भुगतान करने' की अपील करने के लिए मजबूर कर दिया।’18

इसी प्रकार, शाहजहां की मौत के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई में सफाविद द्वारा दारा शिकोह के पक्ष में हस्तक्षेप करने के स्पष्ट प्रमाण हैं। इसके जवाब में, औरंगज़ेब ने उज्बेगों के साथ मिलकर फारस में हमला करने का विचार तो किया लेकिन हमला नहीं किया। इस बीच, गोलकुंडा और अन्य दक्कन सत्ताओं को जीत लेने के बाद और फारस में शाह अब्बास (द्वितीय) के कमजोर उत्तराधिकारियों के कारण दिल्ली से कूटनीतिक और सैन्य दबाव बनाने की आवश्यकता समाप्त हो गई।

अंतिम विश्लेषण में, मुगल साम्राज्य खतरों से निपटने और प्रभुत्व कायम करने में सफल रहा। यह अलग बात है कि यह प्रभाव बहुत समय तक नहीं रह पाया क्योंकि अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही उसके कमजोर होने और अंतत: विघटित होन के संकेत मिलने लगे थे। 1713 में औरंगज़ेब के पोते फर्रूखसीयर ने आसफ जाह को दक्कन का वायसराय बनाया। आसफ जाह को 'अपनी सीमाओं का पता था और उसने कभी भी राजा होने का दावा नहीं किया।' उसके वंश के उत्तराधिकारियों ने भी इस परंपरा का पालन किया।19

IV

किसी इतिहासकार या भू-राजनीति के किसी विद्यार्थी के लिए एक ओर मुगलों और कुत्बशाही के बीच सत्ता समीकरण, और दूसरी ओर मुगलों तथा सफाविदों के बीच सत्ता समीकरण राजनीतिक शतरंज के खेल के नियमों पर रोचक रूप से प्रकाश डालते हैं, जिसकी गुणवत्ता चिरकालिक तथा समय और भूगोल की सीमाओं से बढ़कर है। इसके साथ ही, शक्ति का भय या उपयोग, धर्म के नाम पर हस्तक्षेप, व्यापार और व्यापारियों का उपयोग और दुरूपयोग, और नस्ल या उत्पत्ति के बंधुत्व के आधार पर देशद्रोहियों का समर्थन हासिल करने के प्रयासों के रूप में अपने नीतिगत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उपयोग में लाए गए साधनों का नियमित स्वरूप भी स्पष्ट दिखाई देता है।

कुछ अन्य इतिहासकार, यहां तक कि सामान्य नागरिक भी मोहम्मद कुली कुत्ब शाह और उसके उत्तराधिकारियों की क्षणिक विरासत के बजाय स्थाई विरासत की जानकारी हासिल करना चाहेंगे और संभवत: दो प्रश्न पूछेंगे: 'हैदराबाद के उत्तराधिकारी रियासतों को विरासत में किस प्रकार की राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक संस्कृति मिली थी? क्या हैदराबाद राज्य ने कोई मूल्यवान धरोहर पीछे छोड़ी और क्या वह अभी भी भारतीय राज्यव्यवस्था में योगदान दे सकती है।?’20

समकालीन हैदराबाद ने अपने कौशल के आधार पर 21वीं सदी के नव विश्व में सफलतापूर्वक अपना स्थान बनाया है। हम आशा करते हैं कि इसे विरासत में मिली सहिष्णुता, सह-अस्तित्व, समावेशन और सांस्कृतिक जीवंतता की परंपराएं अपनी अभिन्नता को दर्शाती रहेंगी और देश के लिए एक उदाहरण बनी रहेंगी।

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना खुद है ज़माने से हम नहीं

जय हिंद।


1Hasan, Masud. Mohammad Quli Qutub Shah –Makers of Indian Literature, Sahitya Akademi (New Delhi 1996), being a translation of the original Urdu by Mehr Afshan Farooqi, p 21
2Zaidi, Ali Jawad. A History of Urdu Literature (New Delhi 2006) p 43.
3Sherwani, H.K. History of the Qutb Shahi Dynasty (New Delhi 1974) p 355, note 33, quoting Von Noer.
4Eaton, Richard M. A Social History of the Deccan 1300-1761 – The New Cambridge History of India 1.8 (Cambridge 2005) p.6.
5Ibid, pp 23 - 24.
6Sherwani, op cit p 198.
7Ibid p 298.
8Ibid p.335
9Sherwani, op cit p 300.
10Ibid pp 321 and 375 n 142.
11Syed Siajuddin. ‘For Better and Verse’ in Syeda Imam (ed) The Untold Charminar (New Delhi 2008) p 106.
12Sherwani, op cit pp 624-5.
13Shaerwani, Ibid p 397.
14Eaton, op cit p 102.
15Sherwani, op cit p 299.
16Riazul Islam. Indo - Persian Relations: A Study of the Political and Diplomatic Relations Tehran 1970) p 179.
17Sherwani, op cit p 436.
18Riazul Islam, op cit pp 118-120.
19Bawa, V.K. The Last Nizam:The Life and Times of Mir Osman Ali Khan (Hyderabad 1992) p 13.
20Bawa, op cit p 456.