28 अप्रैल, 2017 को यूनिवर्सिटी ऑफ वॉरसॉ, पोलैंड में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी द्वारा दिया गया भाषण

पोलैंड | अप्रैल 28, 2017

भारतीय लोकतंत्र के सात दशक

हाल ही के और दीर्घकाल के इतिहास की कुछ जानकारी रखने वाला कोई भारतीय इतिहास की परिवर्तनशीलता की गहरी भावना के साथ वॉरसॉ आता है। दुर्भाग्यवश अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण क्षेत्रीय इतिहास की ताकतों के प्रहारों से पोलैंड की सीमाएं पिछली शताब्दियों में बनती-बिगड़ती रही हैं।

16वीं शताब्दी के आरंभ और मध्य में पोलैंड एक बड़ा और शक्तिशाली देश था, लेकिन पड़ोसी साम्राज्य इसमें हस्तक्षेप करते रहे और इसका विभाजन करते रहे। इसलिए, इसके बाद स्वतंत्रता और लोकतंत्र की बहाली के लिए पोलैंड का संघर्ष सराहनीय है और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र से आया हुआ एक व्यक्ति इस गणतंत्र में प्रतिबिंबित होने वाली पोलैंड की अदम्य भावना को सलाम करता है जो "अपने सभी नागरिकों के साझा कल्याण के लिए" समर्पित है और उनके अधिकारों को "सदा के लिए" सुनिश्चित करने का आंकाक्षी है।.

मैं इस ऐतिहासिक शहर में आकर प्रसन्न हूं और आपको संबोधित करने के लिए आमंत्रित किए जाने पर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता हूं। लोकतंत्र की अवधारणा के प्रति आपके जुड़ाव को ध्यान में रखते हुए मैं लोकतंत्र के साथ हमारे अनुभवों के संबंध में कुछ विचार साझा करना चाहता हूं और इसके (क) सिद्धांतों, (ख) प्रणालियों, और (ग) समय-समय पर इसके समक्ष उत्पन्न चुनौतियों पर प्रकाश डालना चाहता हूं।

II

लगभग तीन दशक पहले एक प्रतिष्ठित समाजशास्त्री ने भारतीय लोकतंत्र को "आधुनिक विश्व का एक धर्मनिरपेक्ष चमत्कार और अन्य विकासशील देशों के लिए एक आदर्श" कहा था। स्वतंत्रता-प्राप्ति के सात दशकों के पश्चात् भारतीय लोकतंत्र का चमत्कार उन लोगों के लिए आशा की किरण की तरह निरंतर चमक रहा है जो मूलभूत मानवीय मूल्यों पर आधारित स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण मानते हैं।

भारत ने तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन से अपनी आजीविका कमाने वाले व्यक्तियों द्वारा लगभग प्रामाणिक विश्वास के साथ बनाई गई इस धारणा, कि आर्थिक विकास के निम्न स्तर, असमानता के उच्च स्तर और सामाजिक विविधता के उच्च स्तरों के कारण लोकतांत्रिक राजनीति में अस्थिरता आती है, को बहुत पहले ही गलत सिद्ध कर दिया है । तथापि, जो लोग भारत को अच्छी तरह से जानते हैं, उनके लिए "इस बात की कल्पना करना मुश्किल था कि यदि भारत की बहु-सांस्कृतिक विविधता को किसी स्थायी एकल देश के रूप में संगठित किया जाए तो इसे एक तो संगठित नहीं किया जा सकता है, परंतु लोकतांत्रिक राज-व्यवस्था के अन्य रूप में बिल्कुल नहीं।

यह एक मान्य सत्य है कि प्रत्येक देश और जनता अपने ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर एक विशिष्ट तरीके से अपनी नियति को आकार देती है। हमारे मामले में, यह अनुभव कम-से-कम ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी पुराना है। इस दीर्घकालिक 'तार्किक परंपरा' और विधर्मी के प्रति सहिष्णुता ने हमारे लोकतंत्र के विकास के लिए एक उर्वर धरातल उपलब्ध कराया है।

आधुनिक अर्थ में, स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक चेतना औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता के लिए हमारे संघर्ष की विरासत का प्रतिबिंब है। राष्ट्रीय आंदोलन में हासिल किए गए अधिकांश अनुभवों को हमारे संविधान में प्रतिष्ठापित किया गया है और वे आज भी भारत के राजनीतिक और न्यायिक सिद्धान्त को आलोकित करते हैं। हमारी जनता ने सरकारों, राजनीतिक दलों और संस्थाओं के परवर्ती कार्यनिष्पादन का मूल्यांकन करने के लिए इस विरासत का एक मानदंड के रूप में उपयोग किया है।

हमारे संविधान में एक अर्द्ध-संघीय ढांचे में द्विसदनीय संसदीय लोकतांत्रिक संरचना का उपबंध किया गया है। इसका लक्ष्य संवैधानिक संस्थाओं और विधि के शासन के सिद्धांत का उपयोग कर सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के माध्यम से एक न्यायोचित समाज का निर्माण करना है।

हमारे संविधान ने एक ऐसे समय में सभी नागरिकों को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान किया जब अनेक और भी पुराने लोकतंत्रों में इसकी कल्पना भी नहीं की गई थी। यह अधिकारों और कर्तव्यों के घोषणापत्र का उल्लेख करता है। यह जनता के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने हेतु राज्य नीति के कतिपय निदेशक सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है। यह संघीय और राज्य विधायिकाओं के विधिक क्षेत्राधिकार की रूपरेखा भी प्रस्तुत करता है।

इस प्रकार, संविधान के माध्यम से 'व्यक्तियों और समूहों के विविध संग्रह एक एकल ग्रंथ के पात्र बन गए जो उनके परस्पर अधिकारों की संरक्षा के लिए उनकी प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है और उनकी सामूहिक पहचान को व्यक्त करता है।'

पिछली शताब्दी के एक प्रतिष्ठित ब्रिटिश राजनीति-शास्त्री ने अगस्त 1950 में अपनी अंतिम प्रकाशित पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर भारत के संविधान की उद्देशिका को रखा, क्योंकि, जैसा कि उन्होंने लिखा है, यह 'इस ग्रंथ की मूल भावना को संक्षिप्त और सारगर्भित रूप से व्यक्त करती है।'

III

संवैधानिक तंत्र ने लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाए रखा और उसका अनुरक्षण किया है। आवधिक चुनावों, एक स्वतंत्र चुनाव आयोग और न्यायिक समीक्षा की व्यापक शक्तियों वाली स्वतंत्र न्यायपालिका ने लोकतांत्रिक संस्कृति का पोषण करने में सहायता की है।

भारत में चुनाव संचालन की जटिलता किसी भी संस्थागत ढांचे के लिए एक चुनौती है। पहले आम चुनाव वर्ष 1951 में हुए थे जब मतदाताओं की संख्या 173 मिलियन थी। वर्ष 2014 में हुए 16वें आम चुनावों में मतदाताओं की कुल संख्या 814.4 मिलियन थी जिनमें से 66 प्रतिशत मतदाताओं ने लगभग 464 राजनीतिक दलों के 8251 उम्मीदावारों में से संसद के निम्न सदन के लिए 543 सदस्यों का चुनाव करने के लिए मतदान किया। यह चुनाव 930,000 मतदान केन्द्रों और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के माध्यम से संचालित किया गया। 6 मिलियन से अधिक कार्मिकों को विभिन्न चुनावी ड्यूटी के लिए तैनात किया गया था। इसे सही में अब तक के लोकतंत्र के इतिहास की सबसे बड़ी प्रक्रिया कहा गया है।

हमारे संघीय ढांचे को देखते हुए राज्य विधानसभाओं के लिए भी आवधिक चुनाव कराए जाते हैं, जो एक निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से संघीय संसद की राज्य सभा के सदस्यों का भी चुनाव करते हैं। समाज के ऐतिहासिक तौर पर वंचित रहे वर्गों को संसद और राज्यों की विधानसभाओं, दोनों में विशेष प्रतिनिधित्व दिया जाता है।

वर्ष 1992 में संविधान संशोधनों के माध्यम से ग्राम परिषदों और नगरपालिकाओं में महिलाओं को अनिवार्य प्रतिनिधित्व दिया गया है। राज्यों की विधानसभाओं और संघीय संसद में अभी यह कार्य किया जाना शेष है।

भारतीय लोकतंत्र सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य मानकों और परंपराओं की कसौटी पर खरा उतरा है और लोकतांत्रिक चेतना हमारी जनता के मानस में गहरी पैठ बना चुकी है।

IV

सभी लोकतांत्रिक देशों में सामाजिक बंधनों और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं, राज्य सुरक्षा की अनिवार्यताओं और नागरिकों की स्वतंत्रता, तथा भिन्न-भिन्न राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोणों के बीच तनाव की स्थिति बनी रहती है। भारत के संबंध में सामाजिक न्याय, विविधता की स्वीकार्यता और कार्यान्वयन, और सामाजिक मतभेद के निवारण और सुधार की चुनौतियां सदैव बनी रहती हैं।

भारतीय समाज गहन विविधता वाला बहुलतावादी समाज है जिसमें विभिन्न सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषायी छटाएं दिखाई देती हैं। यहां लगभग उतने जातीय समूह मौजूद हैं जितने समूचे अफ्रीका महाद्वीप में हैं। हमारे संविधान में 22 भाषाओं और सौ से अधिक बोलियों को मान्यता दी गई है। मौद्रिक इकाइयों का मूल्य 17 भिन्न लिपियों में लिखा जाता है। हमारे देश में विश्व के सभी प्रमुख धर्मों को मानने वाले लोग निवास करते हैं। हमारी कुल जनसंख्या में धार्मिक अल्पसंख्यकों की संख्या 19.4 प्रतिशत है।

सामाजिक मतभेद पर नियंत्रण की चुनौती निरंतर सामने आती रहती है। हमारे समाज के सभी वर्ग, चाहे वे किसी भी धर्म को मानने वाले हों, सामाजिक-आर्थिक श्रेणियों में विभक्त हैं जिनकी जड़ें इतिहास में बहुत गहरी हैं। ऐसी क्षेत्रीय, सामाजिक, भाषायी और धार्मिक विविधता वाले देश में तनाव की स्थितियां अपरिहार्य हैं, और कभी-कभी वे संघर्ष में परिवर्तित हो जाती हैं। ये संघर्ष अधिकांशत: स्थानीय और क्षणिक होते हैं और जिस तथाकथित लोकतांत्रिक प्रक्रिया से वे उत्पन्न होते हैं, उसी प्रक्रिया से उनका समाधान भी होता है। जन जागरूकता, अतिवादी कार्रवाई का परिहार, और प्रशासन द्वारा त्वरित उपचारी कार्रवाई इस प्रक्रिया में सहायता करती है; और किसी भी कारण से यदि ये उपाय नहीं किए जाएं तो यह स्थिति बिगड़ जाती है और सामाजिक ताने-बाने को हानि पंहुचाती है।

भारतीय लोकतंत्र ने समानता और सामाजिक समावेशन को अपने उद्देश्यों में शामिल किया है। लोकतांत्रिक संस्थाएं ऐसा माध्यम हैं जिनके द्वारा समुदाय और जनता अपनी गरिमा को अभिव्यक्त करते हैं तथा सामाजिक और आर्थिक समानता की मांग करते हैं।

लोकतंत्र सामाजिक सशक्तिकरण का अग्रदूत भी रहा है। संस्थागत मुक्त राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की प्रणाली के परिणामस्वरूप ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे वर्ग सामाजिक यथास्थिति को चुनौती देने के लिए सक्रिय हुए हैं। इस सक्रियता के परिणामस्वरूप भारतीय लोकतंत्र और भी गहरा हुआ है।

भारत में लोकतंत्र का चहुंमुखी विस्तार भी हुआ है। स्वतंत्रता के समय से और हाल ही में तिहत्तरवें संविधान संशोधन के पारित होने के बाद से एक संघीय राजनीतिक संरचना प्रक्रिया ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समायोजन सुनिश्चित करने में सहायता की है। इस संशोधन के पश्चात्, जमीनी स्तर की लोकतांत्रिक संस्थाएं, अर्थात पंचायती राज संस्थाएं ऊर्जावान हुई हैं। उन्होंने विकेन्द्रीकृत आयोजना को संभव बनाया है और "सरकार से बातचीत करने के लिए जनता हेतु नए अवसर सृजित किए हैं।"

हमारे लोकतांत्रिक ढांचे ने सहचारी सक्रियता के लिए वांछित फलक उपलब्ध कराया है, और एक सद्भावपूर्ण चक्र में नागरिक समाज के विकास ने भी भारत में लोकतंत्र को गहराई प्रदान करने में योगदान दिया है और राज्य के साथ सक्रिय नागरिक संवाद के आदर्श को मजबूत बनाया है। हाल ही में भारत द्वारा अपनाए गए दो सर्वाधिक उदार और सशक्त विधान, अर्थात् नागरिकों को सूचना का अधिकार और निशुल्क मूलभूत शिक्षा का अधिकार - दोनों का ही नेतृत्व भारत में नागरिक समाज संगठनों द्वारा किया गया था।

लोकतंत्र का संचालन यह भी सुनिश्चित करता है कि हम वित्तीय समावेशन योजनाएं चला रहे हैं, और शिक्षा, सामाजिक स्वास्थ्य और बीमा कार्यक्रमों का सार्वभौमीकरण कर रहे हैं। हम अपनी कृषि, विनिर्माण और सेवाओं का आधुनिकीकरण कर रहे हैं और डिजिटल लेन-देन को अपनाने का प्रयास कर रहे हैं। हमारे मानव विकास सूचकांक, यद्यपि अभी यह कम है, में वृद्धि हो रही है और केरल जैसे अपेक्षाकृत विकसित क्षेत्रों में यह विकसित देशों के समतुल्य है।

एक लोकतांत्रिक और विचारशील वातावरण में उदारीकरण कार्यक्रम सहित नई आर्थिक नीतियां विकसित की गईं। भारत अब अपेक्षाकृत उच्च वृद्धि दर का आदी हो गया है। यह ध्यान देने योग्य है कि भारत को प्रमुख सफलता निर्यात जैसे परंपरागत क्षेत्रों में नहीं अपितु नए उद्योगों में मिली है, जिसमें सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग जैसे उच्च तकनीक वाले घटक शामिल हैं, जो एक साधारण शुरुआत के बाद तीव्र विकास कर बड़ा उद्योग बन गया है।

औषध विनिर्माण उद्योग एक ऐसा अन्य उद्योग है जिसमें भारतीय सुप्रयोगों से एड्स की दवाओं जैसी अनेक अनिवार्य औषधियों के दामों में भारी कमी आई है, किसी-किसी औषधि के दाम में 80 प्रतिशत तक की कमी हुई है। इस विकास ने हमें लाखों भारतीयों को भयंकर गरीबी से बाहर निकालने और उन्हें बेहतर जीवन प्रदान करने में सक्षम बनाया है।

भारत का सकल घरेलू उत्पाद, जो कि वर्ष 1991 में लगभग 273 बिलियन अमरीकी डालर था, वह अब लगभग नौ गुना बढ़कर करीब 2.4 ट्रिलियन अमरीकी डालर हो गया है। इसी अवधि में हमारी प्रति व्यक्ति आय वर्तमान और स्थायी मूल्यों के संदर्भ में क्रमश: लगभग 15 गुना और 12 गुना बढ़ गई है। भारत का बढ़ता मध्यम वर्ग अब वैश्विक महत्व का बाजार बन गया है। व्यापक वैश्विक मंदी के बावजूद, 'युनाईटेड नेशंस वर्ल्ड इकोनॉमिक सिचुएशन एंड प्रोस्पैक्ट्स 2017 रिपोर्ट में यह प्राक्कलन किया गया है कि गहन निजी उपभोग से लाभ उठाते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था वर्ष 2017 में 7.7 प्रतिशत की दर से और वर्ष 2018 में 7.6 प्रतिशत की दर से वृद्धि करेगी, जिससे यह विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था बन जाएगी।

यद्यपि आर्थिक वृद्धि के परिणामस्वरूप एक औसत भारतीय नागरिक के जीवन की गुणवत्ता बेहतर हुई है, तथापि ये लाभ एक-समान रूप से वितरित नहीं हुए हैं। फिर भी, यह भारत के लोकतंत्र की गहनता का ही परिणाम है कि बाजार-आधारित सुधारों के कारण जिन लोगों को हानि उठनी पड़ी है, वे भी लोकतांत्रिक प्रणाली को चुनौती नहीं दे रहे हैं।

V

भारत द्वारा अपनी लोकतांत्रिक यात्रा आरंभ करने से बहुत पहले हमारे संविधान-निर्माताओं ने यह भांप लिया था कि किसी भी स्थान पर होने वाला अन्याय सार्वभौमिक न्याय के लिए खतरा बन जाएगा। इसलिए, एक लोकतांत्रिक भारत अफ्रीका और एशिया के ऐसे अन्य देशों के लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहा जो औपनिवेशिक शक्तियों की बेड़ियों से मुक्त होकर स्वयं अपने भाग्य-विधाता बनने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उनके स्वतंत्रता और आत्म-निर्भरता के मार्ग में भारत उनका सशक्त सहयोगी बना रहा।

भारत लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण साधनों को केवल देशों के भीतर मतभेदों का समाधान करने के साधनों के रूप में नहीं देखता है, अपितु अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक अभिशासन के लोकतांत्रिकरण का भी समर्थन करता है। आज मानव जाति के समक्ष जलवायु परिवर्तन के प्रभाव या बढ़ते अतिवाद और आतंकवाद जैसी जो बड़ी चुनौतियां हैं, उनके समाधान के लिए विश्व के सभी देशों के बीच समन्वय और सहयोग आवश्यक है।

VI

भारत में, "अनेक मतभेद केवल इसलिए सुलझा लिए जाते हैं क्यकि यहां एक लोकतांत्रिक ढांचा मौजूद है।" पिछले 70 वर्षों में हमने अपनी यथासंभव क्षमता के अनुसार लोकतंत्र का अनुपालन किया है, यद्यपि हम अपनी यथासंभव योग्यता के अनुरूप ऐसा नहीं कर पाए हैं। यह लक्ष्य से दूर बना हुआ है। लोकतंत्र का संचालन एक सतत प्रक्रिया है। भारत में लोकतंत्र की सफलता के बावजूद लोकतंत्र की गहनता और मजबूती के लिए अभी भी अनेक चुनौतियों का सामना किया जाना शेष है।

लोकतंत्र एक स्वत:-संशोधन और स्वत:-उन्नति करने वाली प्रणाली है। लोकतंत्र की त्रुटियों और कमियों को दूर करने के लिए और अधिक मजबूत लोकतंत्र की आवश्यकता है। जब विवादों का शांतिपूर्ण समाधान नहीं होता है, तब हिंसक अलगाववादी गतिविधियां और धार्मिक टकराव पैदा होते हैं और लोकतंत्र काम करना बंद कर देता है,जब व्यवस्था समावेशी नहीं होती और जनता को अपनी मांगों को व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता; जब उनके अधिकारों को कुचल दिया जाता है और बहुलतावाद का दम घुटने लगता है, तब वे अपने हितों की पूर्ति के लिए अन्य विकल्पों की तलाश करने लगते हैं।

चाहे कितना भी बड़ा बहुमत हो, उससे विपक्ष अशक्त नहीं हो जाता। एक सच्चे लोकतंत्र का महत्वपूर्ण परीक्षण इस बात में है कि वह विशेषत: लोकाधिकारवादी विचार-धाराओं की स्थिति में अल्पसंख्यकों, चाहे वे धार्मिक अल्पसंख्यक हों या राजनीतिक अल्पसंख्यक, की संरक्षा और सम्मान कैसे करता है। एक लोकतंत्र तभी पनप सकता है जब सरकारी या जनवादी प्रतिघात के भय के बिना विभिन्न विचारों को मुक्त रूप से सुना जाए।

अंतत:, लोकतंत्र जनता से संबंधित है। भारत की आम जनता हमारे लोकतांत्रिक भविष्य की श्रेष्ठ गारंटी है। जब तक एक सामान्य भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों और समन्वयवादी सांस्कृतिक परंपराओं का सच्चाई से अनुपालन करता रहेगा, जब तक हमारी जनता अपने अधिकारों को छीने जाने का विरोध करती रहेगी तथा सांप्रदायिक और कट्टरवादी विचारधारा के समक्ष नहीं झुकेगी, इस बात की प्रबल आशा है कि हमारा लोकतंत्र उन्नति करता रहेगा और दूसरों को प्रेरित करता रहेगा।

धन्यवाद