30 मई, 2018 को नई दिल्ली में डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा लिखित स्ट्रेट टॉक नामक पुस्तक का विमोचन करने के उपरांत सभा में भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | मई 30, 2018

"आदरणीय पूर्व प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी, आज की शाम के मेजबान राज्य सभा सदस्य श्री अभिषेक मनु सिंघवी, विशिष्ट अतिथियों, मीडिया से आये मित्रों, भाइयों और बहनों!

आज की शाम इतने बुद्धिजीवियों और सुविज्ञ व्यक्तियों के साथ कुछ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना मेरे लिए प्रसन्नता की बात है। मुझे 'स्ट्रेट टॉक' पुस्तक के विमोचन से जुड़े होने पर विशेष रूप से प्रसन्नता हो रही है, जो पिछले पांच सालों में श्री अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा कई मुद्दों पर लिखे गए लेखों का संकलन है।

मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहूँगा कि राजनीति, संसदीय वाद-विवाद , लेखन आदि क्षेत्रों में नाम कमाने के अलावा श्री अभिषेक देश के अग्रणी वकीलों में भी शामिल हैं। वे एक प्रमाणित और पूर्ण बहु-कार्यकर्ता है जो उन चुनिंदा और गौरवशाली लोगों में शामिल हैं जो राजनीति में सफल रहे हैं।

मैं उन्हें कुछ दशकों से देख रहा हूं। मैं उनकी विचारों की स्पष्टता, अभिव्यक्ति की क्षमता, संतुलन की भावना और कलम की शक्ति से प्रभावित हूं। राज्यसभा के सभापति के रूप में, मुझे प्रसन्नता है कि वह राज्य सभा के सदस्य हैं। अभिषेक जी आपने बहुत अच्छा कार्य किया है और आप इसे आगे भी जारी रखें।

उन्होने पाँच वर्ष पूर्व “कैंडिड कॉर्नर” की रचना की थी और अब 'स्ट्रेट टॉक' की। “कैंडिड कॉर्नर” उनके लेखों का इसी तरह का संग्रह था जिसके लिए प्राक्कथन डॉ. मनमोहन सिंह जी द्वारा ही लिखा गया था।

अपने लेखों के नवीनतम संग्रह के साथ, अभिषेक सीधे पाठकों से सपने देखने और बड़े सपने देखने का आग्रह करते हैं जिसका आधार 'इंडिया ऑफ माई ड्रीम्स' है । वे सुझाव देते हैं कि ये मधुर सपने नहीं हैं , बल्कि ये उन्नतिशील भारत के बारे में कटु तथ्यों पर आधारित कठिन सपने हैं। वह आध्यात्मिकता, परंपराओं, इतिहास, हमारी मूल्य प्रणालियों, बॉलीवुड, पाक शैली, संस्कृति, भाषाओं, भारत की गंध और ध्वनियों जैसी सौम्य शक्तियों के लिए मशहूर रोमांटिक भारत से दूर जाने की वकालत करते हैं।

श्री सिंघवी इस पुस्तक में दृढ़ विश्वास और निकट भविष्य में बेहतर भारत के लक्ष्य की प्राप्ति की आशा व्यक्त करते हैं और मैं उन्हें उद्धृत करता हूँ, " हमें कठोर सपने देखने की आवश्यकता है क्योंकि तेजी से बढ़ते हुये दूरसंचार क्षेत्र, भारतीय कंपनियों की बढ़ती हुयी वैश्विक उपस्थिति आदि के साथ भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के करीब है। "वे भारत की पूरी क्षमता का उपयोग करके इसे बेहतर बनाने के पक्ष में तर्क देते हैं ताकि देश उस स्थान पर पहुँच सके जिसका वह पूरी तरह अधिकारी है।

पुस्तक में सभी 63 लेख सोच समझकर गुड गवर्नेंस, सोसायटी टुडे, रिफार्मिंग ज्यूडिशियरी, फेसिंग टेरेरिज़्म, दि न्यूक्लियर इशू, ट्रेंड्स इन द मीडिया और सम हीरोज ऐंड आइकन्स जैसे सात अध्यायों के तहत वर्गीकृत किए गए हैं। सुशिक्षित और विद्वान, श्री सिंघवी भारत की ताकत, क्षमताओं, विरोधाभासों, सहयोग, सोच, हमारे गौरवशाली अतीत और कुछ छोटी चीजों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हैं जिन्हें विगत वर्षों में उपेक्षित किया गया था और जो बेहतर भारत बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकते थे ।

'स्ट्रेट टॉक' के परिचय में अपने स्वयं के शब्दों में, श्री सिंघवी कहते हैं और मैं उन्हें उद्धृत करता हूँ "उद्देश्य और इरादा, दृष्टिकोण और तकनीक - चाहे यह समालोचनात्मक हो, प्रशंसनात्मक हो, उपदेशात्मक (प्रेरणात्मक) हो, दोषदर्शी हो, विश्लेषणात्मक हो, तर्कवादी या तुलनात्मक हो - हमेशा एक ही है: इस महान देश को अपने सपनों के भारत के करीब लाना"। और उनका सपना है एक बेहतर भारत का सपना।

अब, हमें यह जानने की आवश्यकता है कि बेहतर भारत के निर्माण में कौन-कौन सी चुनौतियां हैं? अभिषेक जी उनमें से आठ को सूचीबद्ध करते हैं। ये हैं: लगभग 300 मिलियन भारतीयों को अत्यधिक निर्धनता से बाहर निकालना, पर्यावरण अवक्र.मण, भारत के उदार लोकतंत्र को सुदृढ़ करना और एचआईवी / एड्स की महामारी जैसे स्वास्थ्य मुद्दे। इन चारों को एडवर्ड लुस की पुस्तक 'इन स्पाइट ऑफ द गॉड्स' से लिया गया है। और उसके बाद उन्होंने चार और चुनौतियाँ अर्थात् भारत की भावना और भारत के मूल्यों और दर्शन की भावना के साथ प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की सर्वसुलभता, भ्रष्टाचार, न्यायिक सुधार और चुनावी सुधार भी जोड़ी हैं। बेहतर भारत के मार्ग में इन चुनौतियों पर कौन सवाल उठा सकता है या इनसे कौन असहमत हो सकता है? मुझे विश्वास है कि इन पर कोई भी सवाल नहीं उठा सकता है या इनसे कोई भी असहमत नहीं होगा ।

दोस्तों !

कोई भी पुस्तक केवल तभी सार्थक होगी यदि उसमें कार्रवाई करने के लिए कुछ ठोस सुझाव हों जो स्थिति में बदलाव ला सकें। इस मोर्चे पर भी श्री सिंघवी ने अच्छा लिखा है।

मैं पूरी किताब पढ़ने का दावा नहीं कर सकता। लेकिन मैंने परिचय और कुछ अन्य चुनिंदा लेखों को पढ़ा। इनसे विधायिकाओं, न्यायपालिका, चुनाव, मीडिया, उत्कृष्टता को बढ़ावा देने आदि से संबंधित निम्नलिखित नौ महत्वपूर्ण सुझाव सामने आते हैं:

1. व्यवधान के कारण बर्बाद हुए प्रति दिन या प्रति घटें के लिए कानून निर्माताओं के लिए भत्ते का स्वत: निलंबन और साथ ही, लंबे समय तक नामित सदस्यों का निलंबन जिसे अनुचित उदारता दिखाते हुए निरस्त नहीं किया जाये।

मुझे खुशी है कि इस सुझाव में सदन की कार्यवाही के गंभीर आक्रामक व्यवधान पर मेरी चिंता प्रतिध्वनित हुई है। मैंने सदन की सुचारू कार्यवाही के लिए राज्यसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन संबंधी नियमों की समीक्षा और पुनरीक्षण करने के लिए एक समिति की स्थापना की है। इस समिति ने काम शुरू कर दिया है और अंतरिम प्रतिवेदन अगले महीने प्रस्तुत किए जाने की संभावना है। मुझे उम्मीद है कि श्री सिंघवी के इस सुझाव पर समिति द्वारा विचार किया जाएगा।

2. यह सुनिश्चित करने के लिए कानून में संशोधन करना कि व्हिप विधायी मतदान पर और विधायकों के पुरःस्थापन के समय लागू नहीं हो ताकि ऐसे द्विपक्षीय विधायी प्रस्ताव, जिनके कानून बनने के आसार हैं, पारित किए जा सकें ।

श्री सिंघवी का तर्क यह है कि यह मतदान और विधायी रचनात्मकता में लचीलेपन को प्रोत्साहित करता है क्योंकि कानूनों का प्रस्ताव अब केवल सरकारों के क्षेत्राधिकार में है।

3. किसी भी कानून पर सदन में कम मत प्राप्त करने पर सरकार को सदन का विश्वास खोने के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। सरकार में सदन का विश्वास केवल विशिष्ट अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से परीक्षण किया जाना चाहिए।

यह सुझाव विधेयकों पर मतदान पर सांसदों को स्वतंत्रता देने की सिफारिश के अनुरूप है।

4. अदालतों द्वारा आरोपों को तय करने के चरण में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधि निर्माताओं को अयोग्य घोषित करना

आपराधिक रिकॉर्ड वाले विधि निर्माताओं की बढ़ती संख्या के बारे में बढ़ती चिंता के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है। मैं लंबे समय से कह रहा हूं कि कानून निर्माताओं को अँग्रेजी के चार सी अर्थात कपेसिटी,कैलिबर,कैरेक्टर और कंडक्ट के आधार पर निर्वाचित किया जाना चाहिए और अन्य चार सी अर्थात कास्ट,कम्यूनिटी,कैश और क्रिमिनल प्रोवेस के आधार पर नहीं चुना जाना चाहिए।

5. एक न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने से एक महीने पहले अनुवर्ती न्यायाधीश की घोषणा।

तंत्र का एक हिस्सा होने के नाते, श्री सिंघवी ने मामलों के अत्यधिक समय तक लंबित रहने के कारणों का गहन विश्लेषण किया है और इस सुझाव को गंभीरतापूर्वक विचार के योग्य बनाया है।

6. सभी कानूनों के अनिवार्य न्यायिक प्रभाव मूल्यांकन।

यह सिफारिश शायद किसी भी कानून से उद्भूत मुकदमेबाजी की संभावना का आकलन करने के लिए है ताकि विधायी प्रस्तावों को तैयार करते समय सरकार अधिक सावधान रह सके।

7. चुनाव से संबंधित मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट।

यह ऐसे मामलों का निर्णय लेने में अनियमित देरी के संदर्भ में महत्वपूर्ण है जिनके कारण अयोग्य करार दिये जाने वाले कानून निर्माता ने सभी लाभों का लाभ उठाते हुए अपना कार्यकाल पूरा किया होगा। छह महीने में चुनाव के मामलों का फैसला करने के वैधानिक प्रावधान का अनुपालन अब उल्लंघन के मामले में अधिक किया जाता है।

8. उत्कृष्टता संबंधी नया मंत्रालय

हमारे संदर्भ में उत्कृष्टता को लंबे समय तक संभ्रांतवादी अवधारणा के रूप में माना जाता रहा है, इस संबंध में चिंता व्यक्त करते हुए उत्कृष्टता को संस्था का रूप प्रदान करने, आत्मसात करने और सभी स्तरों पर कार्यरूप प्रदान करने के लिए इसका सुझाव दिया गया है। उत्कृष्टता आंदोलन को शुरू करने का भी आह्वान किया गया है। यह हमारे विशाल मानव संसाधनों और उत्पादन की दक्षता की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

9. समान स्तर प्रदान किए जाने और मीडिया द्वारा निष्पक्ष समाचार और रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने के लिए विधायी हस्तक्षेप।

मुझे यकीन है कि मीडिया के दोस्तों सहित सभी इसमें रुचि रखेंगे। यह सुझाव 'टी आर पी (टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट) निर्दयता' के संदर्भ में दिया गया है जहां आत्मवाद और शोर टीवी समय पर हावी हो गया है और सत्य, व्यक्ति और संस्थाएं इस प्रक्रिया का शिकार बन रहे हैं।

इस तरह के विशिष्ट सुझावों के अतिरिक्त, प्रबुद्ध श्री अभिषेक मनु सिंघवी ने कुछ टिप्पणियां भी की है, जो सार्वजनिक बहस के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

न्यायपालिका के बारे में उन्होंने लिखा है और मैं उद्धृत करता हूँ "न्यायिक सक्रियता, लोकतांत्रिक राजनीति की कार्यप्रणाली में अत्यधिक न्यायिक हस्तक्षेप के अर्थ में, भारत में एक बुनियादी और निर्विवाद सत्य है। न्यायपालिका द्वारा अपने दायरे से आगे बढ़ना एक आंखों देखी वास्तविकता है, जिससे फ़रियाद औपचारिक और विरोध अलंकारिक बन जाते हैं। बंदर से लेकर कुत्ते के खतरे तक, भ्रष्टाचार से लेकर शहरों और नदियों की सफाई तक, हास्य से लेकर दिव्यता तक और उपयोगिता से लेकर सामान्य स्थिति तक, भारत में न्यायिक सक्रियता की सभी विविधताओं को देखा जा सकता है।

हमारी सवैंधानिक व्यवस्था में शक्तियों के पृथकीकरण के संदर्भ में, इस व्यापक चिंता के विषय पर उन लोगों द्वारा विचार किए जाने की आवश्यकता है, जो हमारे प्रतिष्ठित लोकतंत्र के संरक्षक हैं। श्री सिंघवी ने अपनी 'स्ट्रेट टॉक (सीधी बात) में न्यायपालिका द्वारा अपने दायरे के बाहर जाकर काम करने के कुछ उदाहरण उद्धृत किए हैं।

श्री सिंघवी द्वारा व्यक्त की गई अन्य मुख्य चिंताओं में चुनावों में बढ़ता धन बल और हमारे विधि निर्माताओं का अधिक से अधिक वंशानुगत होना शामिल हैं।

चुनाव हारने वालों द्वारा इलेक्ट्रानिक मतदान मशीन (ई वी एम) के खिलाफ दर्ज कराई जाने वाली शिकायतों के संदर्भ में, इस "सीधी बात" में यह कहा गया कि, "समय-समय पर ईवीएम का उपहास उड़ाने और आलोचना के बावजूद इस बात पर लगभग सर्वसम्मति है कि इससे उल्लेखनीय तौर पर सटीक और वस्तुत: अकाट्य परिणाम प्राप्त होते हैं।"

मित्रो!

बेहतर भारत हेतु बहुप्रतीक्षित परिवर्तन के लिए हमारी राज्य व्यवस्था की विभिन्न संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर इन विशिष्ट सुझावों और लेखक की टिप्पणियों पर व्यापक विचार-विमर्श किए जाने की आवश्यकता है।

श्री सिंघवी का सपना एक बेहतर भारत का निर्माण करना है। प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का लक्ष्य नए भारत का निर्माण करना है। दोनों की अंतर्निहित चिंताए और आशय एक ही हैं। प्रत्येक भारतीय का अपना एक सपना है और प्रत्येक नागरिक की अपनी एक महत्वाकांक्षा है। यह हमारे देश को एक आकांक्षापूर्ण भारत बनाता है।

मुख्य मुद्दा प्रत्येक भारतीय के सपने के इस नए और बेहतर भारत को साकार करना है। हमारे संसदीय लोकतंत्र में, राजनैतिक दलों की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राजनीति में केवल राजनैतिक कार्यकलाप ही सब कुछ नहीं होने चाहिए और यह उन्ही तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसका कार्य भारत को नए और बेहतर भारत में रूपान्तरित करना है।

हमें इस बात पर विचार करना चाहिए क्या हमारी विधान पालिकाएं उन लोगों को सही संदेश भेज रही है, जिन्हें हमारी विधान पालिकाओं, लोकतंत्र के मंदिर, से बहुत अधिक आशाएं हैं। 'सतारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच विभाजन, जो हमारी विधान पालिकाओं में तेजी से बढ़ रहा है, लोगों में विश्वास नहीं जगाता है।'

सतारूढ़ और विपक्षी दलों के पास निर्वहन हेतु विशिष्ट जिम्मेदारियां होती हैं। जबकि आज की सरकारें और सतारूढ़ दल विधायी प्रस्तावों को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं, विपक्ष के पास सर्वोत्तम संभव संवीक्षा सुनिश्चित करने का अधिदेश होता है। अंत में, ऐसे सर्वोत्तम संभव विधान पारित किए जाने चाहिए, जो लोगों की आंकाक्षाओं को और आगे बढ़ाए। ऐसा अनकी स्वयं की अपनी-अपनी पहचान को खोए बिना साकार किया जा सकता है। इसके लिए 'कम विभाजन और अधिक समेकन' के आधार पर नए राजनैतिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। संयोग से, यह सिंघवी की 'सीधी बात' में लिखे गए लेखों में से एक लेख का शीर्षक है।

राजनैतिक दल एक-दूसरे के केवल चिर प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं, शत्रु नहीं। प्रतिद्वंद्वी कतिपय मापदण्डों, परम्पराओं और सहमत सिद्धांतों के आधार पर एक-दूसरे से संर्घष करते हैं जबकि दुश्मन एक-दूसरे को तबाह करने का प्रयास करते हैं। मैं आशा करता हूँ कि सभी दल इस विशिष्टता से मार्गदर्शन प्राप्त करेंगे।

इस पुस्तक में उल्लिखित विषय और उप विषय शाश्वत हैं और ये राजनीति, राजनैतिक दलों सरकारों और वर्तमान घटनाओं से बढ़कर हैं। उन्होंने वैचारिक मुद्दों और व्यापक तौर पर देश के लिए सार्वकालिक महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया गया है।

इस पुस्तक में भारत को 'हार्ड पॉवर' के स्थान पर मुख्य 'सॉफ्ट पॉवर' तथा ताकतवर और दृढ़ निश्चयी परंतु विनम्र दर्शाए जाने पर श्री सिंघवी का रोष स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। इस रोष में हम उनके सहभागी हैं। आइए भारत को हम इसका न्यायोचित स्थान प्रदान करें। यह मिशन जारी है और हम उस स्थान तक पहुँच जाएंगे।

अंत में,

श्री अभिषेक मनु सिंघवी, सुविज्ञ सदस्यों की इस सभा में जिनके पास आपके द्वारा दिए गए संदेश को और आगे बढ़ाने की क्षमता है, मैं बेहतर भारत संबंधी इस सुविज्ञ चर्चा के लिए आपके प्रस्ताव को स्वीकार करता हूँ।

धैयपूर्वक सुनने के लिए आप सभी का धन्यवाद"