30 नवंबर, 2018 को हैदराबाद में इंडियन एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट सिकाइअट्री के 19वें वार्षिक सम्मेलन के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

हैदराबाद | नवम्बर 30, 2018

"किसी समाज की समृद्धि और विकास में स्वास्थ्य की प्रमुख भूमिका होती है। एक स्वस्थ और उत्पादक समाज एक राष्ट्र की आर्थिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन स्वास्थ्य को "पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से स्वस्थ होने के रूप में परिभाषित करता है, न कि केवल बीमारी या अशक्तता की अनुपस्थिति" के रूप में परिभाषित करता है।"

हालांकि, विकासशील और विकसित दोनों प्रकार के राष्ट्र विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं से आक्रांत हैं, मानसिक बीमारी दुनिया की प्रमुख गैर-संक्रमणीय बीमारियों में से एक है और यह एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन गई है।

मानसिक विकार अस्वस्थता एवं अशक्तता का एक प्रमुख कारण हैं। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज़ रिपोर्ट 2015 के अनुसार, मानसिक विकार कुल डीएएलवाई (निशक्तता समायोजित जीवन वर्ष) और वाईएलडी (नि:शक्तता के साथ बिताए जीवन के वर्षों की हानि) का 13 प्रतिशत हैं। इनमें अवसाद प्रमुख कारण है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में नि:शक्तता का मुख्य कारण अवसाद है और यह बीमारी के समग्र वैश्विक बोझ में एक प्रमुख योगदानकर्ता है। वैश्विक स्तर पर, सभी उम्र के 300 मिलियन से अधिक लोग अवसाद से ग्रस्त हैं।

पुरुषों की तुलना में महिलाएं अवसाद से अधिक प्रभावित हुईं। उन्होंने आगे कहा कि भारत की सामान्य आबादी के कम से कम 13.7 प्रतिशत का विभिन्न मानसिक बीमारियों से पीड़ित होने का अनुमान लगाया गया है और इसमें से 10.6 प्रतिशत के मामले में तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि एनआईएमएचएएनएस द्वारा केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को प्रस्तुत राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-2016 के अनुसार लगभग 150 मिलियन भारतीयों को प्रत्यक्ष चिकित्सा उपचार की आवश्यकता है।

आत्महत्या

प्रिय बहनों और भाइयों,

चिंता का एक और प्रमुख क्षेत्र आत्महत्या की व्यापकता है। बार-बार, हम युवाओं, किसानों और महिलाओं द्वारा आत्महत्या किए जाने का समाचार पढ़ते हैं। यह एक बहुत ही परेशान करने वाली प्रवृत्ति है और आत्महत्या को रोकने के लिए तत्काल परिवार के नजदीकी सदस्यों, सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाकारों, नीति निर्माताओं और गैर सरकारी संगठनों सहित सभी हितधारकों द्वारा सामूहिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। मुझे लगता है कि एक राष्ट्रीय अभियान और राष्ट्रीय आत्महत्या निवारण नीति शुरू करने की आवश्यकता है। समय पर परामर्श और पारिवारिक सहायता अवसाद से पीड़ित लोगों को कोई भी बड़ा जानलेवा कदम उठाने से रोक सकता है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि आत्महत्या के कारणों में से एक कारण यह है कि जोखिम वाले लोगों को पहचानने और उनसे निबटने के लिए उपयुक्त स्वास्थ्य देखरेख सेवाओं की कमी है।

भारत की 65 प्रतिशत आबादी के 35 साल से कम उम्र के होने के कारण इसे एक विशिष्ट लाभप्रद स्थिति में रखा गया है। फिर भी, यही वह समूह है (विशेष रूप से 15-29 वर्ष की उम्र के लोग) जिन्हें आत्महत्या से मौत का खतरा सर्वाधिक है। यह एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता है और हमें इस समस्या के हल के लिए उन युवाओं, जिनके अवसाद से ग्रस्त होने की संभावना है, की मदद करने के लिए अपने प्रयासों को बड़े पैमाने पर बढ़ाने की जरूरत है।

लांछन और जागरूकता

प्रमुख चुनौतियों में से एक चुनौती मानसिक बीमारी से जुड़ा सामाजिक लांछन है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मानसिक बीमारी से पीड़ित लोग प्राय: बुरे वर्ताव और भेदभाव का सामना करते हैं, कभी-कभी करीबी रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों के हाथों। यह बिलकुल अस्वीकार्य है, भले ही यह समझ की कमी या गलतफहमी के कारण हो। मानसिक रोगियों के साथ बुरा व्यवहार करने का किसी को कोई अधिकार नहीं है, इस तरह के व्यवहार से बीमारी की गंभीरता में और वृद्धि होगी।

मैं चाहता हूँ कि आपके जैसे निकाय इस पहलू के संबंध में लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए देशव्यापी अभियान चलाएं। वर्तमान समय में यह और अधिक आवश्यक है क्योंकि आधुनिक दवाओं और उचित उपचार से मनोवैज्ञानिक विकारों से पीड़ित लोगों को सामान्य उत्पादक जीवन जीने में मदद मिलेगी, भले ही वे लंबी अवधि से इस समस्या का सामना कर रहे हों।

मुझे बताया गया है कि स्किज़ोफ्रेनिया के 50 प्रतिशत से अधिक मरीज एंटीसाइकोटिक दवाओं और पारिवारिक देखभाल से एक साल के इलाज में बीमारी के पुनरावर्तन से मुक्त हो सकते हैं। इसी तरह, अवसाद से पीड़ित लोगों में से 90 प्रतिशत एंटीडिप्रेसेंट दवाओं और मनोचिकित्सा के उचित संयोजन से ठीक हो सकते हैं। सामाजिक कलंक और किफायती उपचार दोनों के बारे में अधिक जागरूकता होनी चाहिए।

मानसिक स्वास्थ्य देखरेख सेवा वितरण

प्रभावी मानसिक स्वास्थ्य देखरेख प्रदान करने में हम एक अन्य प्रमुख समस्या का सामना कर रहे हैं जो इस क्षेत्र में मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और प्रशिक्षित नर्सों की पर्याप्त संख्या का अभाव है। मरीजों को गुणवत्तापूर्ण उपचार प्रदान करने के लिए युद्ध स्तर पर इन पदों को भरना होगा।

मानसिक स्वास्थ्य देखरेख अधिनियम, 2017

जहां मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 एक रोगी-अनुकूल अधिनियम है और इसका उद्देश्य मानसिक रोगियों के अधिकारों की रक्षा करना है, वहीं यह देखभाल करने वालों की चिंताओं को भी ध्यान में रखता है और उनकी भागीदारी को प्रोत्साहित करता है।

देखभाल करने वालों पर आर्थिक बोझ

मानसिक स्वास्थ्य अभी भी बजट आवंटन के मामले में सरकारों का कम ध्यान आकर्षित करता है और नीति निर्माताओं को इस स्थिति को सुधारने की आवश्यकता है। 2011 की विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वाधिक विकसित राष्ट्र मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और शोध पर अपने बजट का 4% से अधिक खर्च करते हैं।

प्रमुख मनोवैज्ञानिक विकारों की एक दीर्घकालिक प्रक्रिया होती है और लंबे समय तक इलाज की आवश्यकता होती है। सीधी लागत का संबंध परामर्श शुल्क, दवा, चिकित्सा लागत, यात्रा लागत और देखभाल करने वालों और मरीजों दोनों के लिए काम से मिलने वाले वेतन की हानि से संबंधित है, वहीं अप्रत्यक्ष लागत में रोगियों के लिए देखभाल में लगा हुआ शामिल समय है।

कई निम्न और मध्यम आय वाले देशों (एलएएमआईसी) में, औपचारिक मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लागत का भुगतान रोगियों या उनकी देखभाल करने वालों द्वारा अपनी जेब से किया जाता है, यह तरीका भुगतान करने की क्षमता के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग इसे सीमित कर देगा जिसका परिणाम मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तक असमान पहुंच के रूप में होगा। मानसिक स्वास्थ्य उपचार के लिए लगातार अपनी जेब से अधिक व्यय उपचार तक पहुँच, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिन्हें अधिक उपचार की आवश्यकता है, में बाधा डाल सकता है।

इस समस्या का सबसे अच्छा समाधान सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली को मजबूत करना है, लेकिन तब तक चिकित्सा बीमा जिसमें मानसिक स्वास्थ्य शामिल है, फायदेमंद है। चिकित्सा बीमा में सभी मनोवैज्ञानिक विकारों को शामिल करना समय की आवश्यकता है।

नीति और विधान

प्रिय बहनों और भाइयों,

अन्य देशों की तुलना में भारत के पास कई लाभ हैं। हमारे पास सस्ती चिकित्सा और देश भर में अच्छी तरह से फैली सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली है। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में अंतराल को टेली-मनोचिकित्सा (टेली-मेडिसिन) के माध्यम से, जैसा तमिलनाडु में एससीएआरएफ फ़ाउंडेशन द्वारा किया गया है, अच्छी तरह से पाटा जा सकता है। टेली-मनोचिकित्सा के प्रयोग की अन्य स्थानों, विशेष रूप से दूरसंचार और मोबाइल फोन कनेक्टिविटी वाले ग्रामीण इलाकों में कोशिश की जा सकती है। वीडियो परामर्श सिर्फ एक फोन कॉल से हो सकता है! कम मानव संसाधन का उपयोग और गुणवत्तापूर्ण देखभाल की उपलब्धता का लाभ उठाया जा सकता है।

चिकित्सा पर्यटन

इस क्षेत्र में चिकित्सा पर्यटन की संभावनाओं का लाभ उठाने के लिए भारत के पास कुछ फायदे हैं। गुणवत्तापूर्ण उपचार, सस्ती चिकित्सा और कम लागत की उपलब्धता के साथ, अन्य देशों के मरीजों को उचित मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने की वास्तव में यहां गुंजाइश है।

मानसिक रूप से अक्षम लोगों के लिए, जो उपचार के बाद सभी कार्यों को सही तरीके से करते हैं, रोजगार के अवसर प्रदान करना, एक अन्य क्षेत्र है जहां नीति और योजना एक बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं। मनोवैज्ञानिक रोगों के लिए आधुनिक चिकित्सा उपचार के आगमन के साथ, कई लोगों के आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की संभावना है और ऐसे लोगों के लिए रोजगार का प्रावधान होना चाहिए।

मुझे विश्वास है कि यहां एकत्रित सभी विशेषज्ञ मानसिक स्वास्थ्य देखरेख से संबंधित विषय पर विचार करेंगे और सेवाओं में सुधार के लिए सुझाव देंगे।

धन्यवाद

जय हिन्द!"