29 अप्रैल, 2018 को कासरगोड, केरल में केरल के केंद्रीय विश्वविद्यालय के नए परिसर के उद्घाटन तथा देश को शैक्षणिक संस्थान समर्पित करने के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

कासरगोड, केरल | अप्रैल 29, 2018

"मैं तेजस्विनी हिल्स में केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्घाटन करके और इस शैक्षिक संस्थान को राष्ट्र को समर्पित करके अत्यंत प्रसन्न हूं।

मैं इस शुभ अवसर पर सभी प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, संकाय सदस्यों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों, छात्रों और केरल की सिविल सोसाइटी को बधाई देता हूं। मैं इस विश्वविद्यालय के अकादमिक और प्रशासनिक नेतृत्व को भी बधाई देता हूँ।

सर्वप्रथम, मैं राज्य को शिक्षा और सामाजिक विकास में अग्रणी बनाने के लिए केरल के लोगों की सराहना करना चाहता हूं। श्री चिथिरा थिरुनल जैसे व्यक्तियों के प्रबुद्ध नेतृत्व, श्री नारायण गुरु जैसे सुधारकों की प्रेरणा और मिशनरियों तथा सामाजिक सुधार के स्थानीय निकायों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किये गए कार्यों का एक लंबा इतिहास है जिसने केरल को लगभग पूर्णत: साक्षर समाज बना दिया है। फिर भी चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं।

कासारगोड जिला की संस्कृति और इतिहास समृद्ध है। 1 नवंबर, 1 9 56 को हुए राज्य पुनर्गठन से पहले यह दक्षिणी कन्नड़ का हिस्सा था। 1 9 84 तक कासरगोड कन्नूर जिले का हिस्सा था और उसके बाद से यह केरल का सबसे उत्तरी ज़िला बन हुआ है। कासरगोड में कई लोकप्रिय कलाएं और परंपराएं हैं जैसे थेय्यम, पूरक्कली और यक्षगणम । यहां अनेक भाषाएं बोली जाति हैं और बहुभाषी परंपरा को दर्शाता है।

कासारगोड को सप्तभाषा भूमि भी कहा जाता है।

कासरगोड में केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय की उपस्थिति उत्तर मालाबार के लोगों के लिए एक वरदान है। इस क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर जोर देने की आवश्यकता है। मुझे यकीन है कि केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय की उपस्थिति न केवल शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करेगी बल्कि विशेषरूप से कासरगोड के और सामान्य रूप से केरल के जीवन स्तर में सुधार करने में भी योगदान करेगी।

आज एक नए परिसर का उद्घाटन छात्रों और संकाय के लिए नई संभावनाएं खोल देगा जिससे वे अकादमिक उत्कृष्टता की खोज जारी रखेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि तेजस्विनी हिल्स का यह संस्थान विश्व के दृष्टिकोण और दुनिया को भी बदलते हुए अपने 'तेज' या रोशनी को दूर-दूर तक फैलाये।

बहनों और भाइयों, शिक्षा किसी राष्ट्र की प्रगति की नींव रखती है। 21 वीं शताब्दी के ज्ञान-आधारित समाज के निर्माण में उच्च शिक्षा विशेष रूप से एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों सहित सभी उच्च शिक्षण संस्थानों पर देश को ज्ञान और नवाचार के केंद्रबिंदु में रूपांतरित की भारी ज़िम्मेदारी है।

यदि आपको स्मरण हो, एक समय में भारत को 'विश्वगुरु' के नाम से जाना जाता था और दुनिया भर के लोग यहां अध्ययन करने और अलग-अलग विधाओं में ज्ञान और विशेषज्ञता हासिल करने के लिए आते थे। हालांकि, विदेशी हमलों और ब्रिटिश शासन के बाद स्थिति बदल गई और भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी प्रतिष्ठित स्थिति खो दिया। आज देश के पास शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक शक्ति के रूप में फिर से उभरने का अवसर है। परंतु इसके लिए पाठ्यक्रम के पुनर्निर्माण से लेकर विश्वस्तरीय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के एकमात्र उद्देश्य के साथ बुनियादी ढांचे में सुधार सहित जबरदस्त रूपांतरण की आवश्यकता है।

यद्यपि भारत में 800 से अधिक विश्वविद्यालय हैं, उनमें से किसी का भी स्थान विश्व के शीर्ष शैक्षिक संस्थानों में नहीं है। अगर हम स्थिति को बदलना चाहते हैं तो 'जैसा चल रहा है चलने दो' दृष्टिकोण को अपनाकर नहीं चल सकते हैं। निजी शैक्षणिक संस्थानों से लेकर आपके जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों तक, प्रत्येक अकादमिक संगठन को शिक्षा एवं नवाचार के क्षेत्र में भारत को अग्रणी राष्ट्र बनाने के लिए 21 वीं शताब्दी की अपेक्षाओं के अनुरूप शैक्षिक ढांचे का पुनर्निर्माण करने के लिए मिशन मोड में काम करना होगा। परिवर्तन के दायरे और गति को देखते हुए, समाज उत्तरोतर ज्ञान आधारित बन गया है और उच्च शिक्षण और शोध के संस्थान व्यक्तियों, समुदायों और राष्ट्रों के सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक विकास के मुख्य साधन बन गए हैं।

यद्यपि, भारत में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणाली है, फिर भी यहां सकल नामांकन अनुपात केवल 25.2% है। देश के पास उपलब्ध विशाल जनसांख्यिकीय लाभांश के वरदान को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी है कि देश और समाज की बेहतरी के लिए उच्च शिक्षा प्रणाली में गुणात्मक और मात्रात्मक रूप से विस्तार होना चाहिए। आखिरकार, इसका उद्देश्य एक नए, समावेशी, अहिंसक और गैर-शोषणकारी समाज के निर्माण का होना चाहिए, जिसके लिए अत्यधिक सभ्य और अभिप्रेरित व्यक्ति मानवता के प्रति प्रेम से ओतप्रोत और विवेकानुसार कार्य करने वाले व्यक्ति होने चाहिए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं है, अपितु शिक्षा का उद्देश्य प्रबुद्ध बनाना, सशक्त बनाना और समग्र रूप से व्यक्तित्व का विकास करना है जिसके नैतिक के प्रतिमान कभी भी सन्मार्ग से विचलित नहीं होते। शिक्षा के माध्यम से यथोचित आचरण को बढ़ावा दिये जाने के अलावा चरित्र, सामर्थ्य और क्षमता का निर्माण भी होना चाहिए।

प्रिय छात्रों, हमेशा याद रखें कि आप एक समृद्ध इतिहास वाली सभ्यता की महान संस्कृति और विरासत के उत्तराधिकारी हैं। आपको हमारी संस्कृति, परंपराओं, लोकाचारों और रीति-रिवाजों का ध्वज वाहक होना चाहिए। किसी अन्य स्थान की बेहतर प्रथाओं को अपनाने और आत्मसात करने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन हमें सदैव अपनी प्राचीन संस्कृति और विरासत से जुड़ा रहना चाहिए। यहां उन्होंने राष्ट्रपिता के प्रसिद्ध शब्दों को स्मरण किया-"मैं नहीं चाहता कि मेरा घर चारों ओर से दीवारों से घिरा हो और मेरी खिड़कियाँ बंद हों। मैं चाहता हूं कि सभी देशों की संस्कृति मेरे घर में यथासंभव स्वच्छंद विचरण करें। लेकिन मैं नहीं चाहता हूँ कि कोई मुझे अपनी संस्कृति से दूर करे।"

पिछले दो दशकों में उच्च शिक्षा पूर्णतया बदल गई है। हालांकि वैश्विक प्रणाली के रूप में उच्च शिक्षा के बारे में सोचना अभी संभव नहीं है, लेकिन विश्व के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा शिक्षा प्रणालियों के मध्य काफी अभिसरण देखा जा सकता है। वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप, स्नातकों को न केवल स्थानीय या राष्ट्रीय संदर्भ में अपितु बढ़ते वैश्विक बाजार में भी प्रतिस्पर्धी होने की जरूरत है। इस 'वैश्विक गांव' में भावी नेताओं के रूप में हमारे स्नातकों को एक नए प्रकार की अंतर-सांस्कृतिक समझ, सर्वसम्मत नियमों और निष्पक्षता के प्रति सम्मान, भिन्न- भिन्न हितों, दृष्टिकोणों और विचार शैलियों की समझ तथा विश्लेषण और संश्लेषण करने की क्षमता की आवश्यकता है।

मुझे यह जानकर खुशी है कि 2009 में अपनी स्थापना के बाद से ही केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय ने इस पिछड़े क्षेत्र में शिक्षा को बढ़ावा देकर अपने लिए एक स्थान बना लिया है। छात्रों का नामांकन जो वर्ष 2009 में 17 था उससे बढ़कर 2017-18 के दौरान 1426 हो गया। ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2022 तक 5000 छात्रों के नामांकन हो जायेगा। यहाँ 16 राज्यों के छात्रों की मौजूदगी इस विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय चरित्र को दर्शाती है।

मुझे यह जानकर खुशी हुई है कि विश्वविद्यालय छात्रों को सर्वश्रेष्ठ शिक्षण और अधिगम का वातावरण उपलब्ध करा रहा है। यथोचित वातावरण उनकी रचनात्मकता को विकसित करने में सहायता प्रदान करेगा। मैं चाहता हूं कि विश्वविद्यालय बड़े पैमाने पर शोध पर बल दें और उद्योगों के साथ संपर्क स्थापित करे ताकि ये पाठ्यक्रम उद्योगों की अपेक्षाओं के अनुरूप हो।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, आज के विश्वविद्यालय शिक्षण उत्कृष्टता, अनुसंधान, नवाचार और सहयोग के आदर्श हैं। शिक्षा क्षेत्र के सम्पूर्ण सामर्थ्य को साकार करने के लिए विद्यमान बाधाओं को अवश्य दूर किया जाए जिससे छात्र उन्हें उपलब्ध शैक्षिक अवसरों और प्रमाण-पत्रों का पूर्ण लाभ ले सकें। पर्याप्त परिवर्तन और विकास के लिए, बड़ी-बड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए न केवल सरकार और संस्था की अपितु छात्रों और उनके परिवारों, शिक्षकों और समुदाय सहित सभी हितधारकों की भी मजबूत भागीदारी की आवश्यकता होती है।

मुझे बताया गया है कि विश्वविद्यालय को वर्ष 2016 में एनएएसी की मान्यता प्रदान की गई थी और मूल्यांकन के अपने पहले चरण में इसे बी ++ प्रदान किया गया था। एनआईआरएफ की रैंकिंग 100 से 150 के बीच है और हमारे देश के सभी शैक्षणिक संस्थानों के शीर्ष 5% में मूल्यांकन किया गया है। इन मान्यताओं की सराहना करते हुए, मैं सभी हितधारकों को अगले चरणों में एनएएसी ग्रेड में सुधार किए जाने को ध्यान में रखने की याद दिलाना चाहता हूं।

विश्वविद्यालयों को शिक्षण और अधिगम की विशिष्ट रणनीतियों को कार्यान्वित करना होगा और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए कार्य पद्धितियों और साधनों की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए। घटते संसाधनों और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के मद्देनजर ये चुनौतियां दुसाध्य लग सकती हैं। फिर भी, संस्थानों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षण को बढ़ावा देने और छात्रों के अधिगम के परिणामों में सुधार करने के अपने प्रयासों को जारी रखना चाहिए। केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय को अभी भी एक लंबा सफर तय करना है। जहां एक ओर वर्तमान क्रियाकलापों से विजेय ऊंचाइयों को छूने के लिए संकेंद्रित दृष्टि और मिशन वाली समर्पित टीमों की अत्यंत आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर नई-नई ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए उदार ह्रदय रहने की आवश्यकता है।

इस महत्वपूर्ण अवसर पर आपकी गरिमामयी उपस्थिति और आपके ध्यानपूर्वक श्रवण के लिए आप सभी का एक बार पुनः धन्यवाद!

जय हिन्द!"