28 अगस्त, 2017 को नई दिल्ली में राष्ट्रीय खेल प्रतिभा खोज पोर्टल के शुभारंभ के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का अभिभाषण

नई दिल्ली | अगस्त 28, 2017

मुझे राष्ट्रीय खेल प्रतिभा खोज पोर्टल, जो युवक कार्यक्रम और खेल मंत्रालय की एक पहल है, का उद्घाटन करते हुए असीम प्रसन्नता हो रही है। इस प्रकार की पहल से न केवल सर्वोत्तम प्रतिभा की पहचान करने में सहायता मिलेगी, बल्कि सभी आवेदकों को समान अवसर भी प्राप्त हो सकेंगे और एक प्रतिस्पर्धात्मक माहौल निर्मित होगा।

खेल राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग होता है, क्योंकि यह व्यक्तिगत विकास, सामुदायिक विकास, सामाजिक समावेशीकरण और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी राष्ट्र के लिए खेल शक्ति के रूप में उभरने के लिए आवश्यक सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारकों में से एक कारक सही प्रतिभा की खोज करना और उसका विकास करना होता है । विश्व जनसंख्या के सातवें हिस्से वाले हमारे देश में, विशेषकर तब जब यहां 450 करोड़ से अधिक युवा हैं, प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। वास्तव में, हमारा देश प्रतिभा की दृष्टि से बहुत ही संपन्न है, लेकिन इसे सही दिशा देने के लिए हमें प्रतिभाओं की पहचान करने और उन्हें निखारने तथा विश्व विजेता के रूप में विकसित करने के लिए एक सुदृढ तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय खेल प्रतिभा खोज पोर्टल एक परिवर्तनकारी मंच होगा और इससे युवक कार्यक्रम और खेल मंत्रालय और भारतीय खेल प्राधिकरण को सर्वोत्तम प्रतिभा के चयन में सहायता मिलेगी। मैं इस महत्वपूर्ण कदम के लिए श्री विजय गोयल को बधाई देता हूं। देश में उपलब्ध सर्वोत्तम खेल प्रतिभाओं को आकर्षित करने में इस कदम के दूरगामी परिणाम होंगे। यह पोर्टल त्वरित और पारदर्शी होगा तथा इससे निष्पक्ष चयन के लिए तंत्र उपलब्ध होगा। इससे केवल योग्य और प्रतिभाशाली युवा खिलाड़ियों का ही चयन किया जाएगा।

यह पोर्टल मोबाइल ऐप के रूप में भी उपलब्ध है, जिसे स्मार्टफोन पर डाउनलोड किया जा सकता है। मुझे यह जानकर अत्यंत संतोष हुआ कि प्रतिभा खोज पोर्टल और ऐप को अत्यंत प्रतिष्ठित सॉफ्टवेयर और डाटा एनालिटिक्स कंपनी, आईआरआईएस ने कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) सहयोग के अधीन विकसित किया है। मैं आईआरआईएस और भारतीय खेल प्राधिकरण के घनिष्ठ परामर्श से इस महत्वपूर्ण मंच को विकसित करने वाली टीम को बधाई देता हूं।

खेलों से व्यक्तियों का सशक्तीकरण होता है, समुदायों में बदलाव आता है और लोग सकारात्मक परिवर्तन के लिए प्रेरित होते हैं। खेल बदलाव का साधन बन गया है। इसकी बदौलत ग्रामीण नशे की लत से छुटकारा पा रहे हैं, समुदाय में जातिगत बाधाएं टूट रही हैं,महिलाएं घरों से बाहर निकल रही हैं और सशक्त बन रही हैं। खेलकूद से व्यक्तियों और संपूर्ण गांव में जोश और गर्व की भावना को नया जीवन मिल रहा है।

खेलों से मैत्री, एकता और स्वस्थ जीवंत समाज का विकास होता है। इस साधारण किंतु जोशो-खरोश से भर देने वाले कदम से आनंद और सामुदायिक भाईचारे की भावना को बल मिलता है। खेलों से महिलाओं के आत्मविश्वास में होने वाली वृद्धि और इस क्षेत्र में पहल की भावना आगामी सामाजिक बदलाव की पूर्वपीठिका है।

खेलों की शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लाने व नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और सामाजिक समावेशन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इससे नेतृत्व कौशल और टीम भावना का भी विकास होता है और व्यक्ति में जय-पराजय के दौरान समभाव अनुभव करने की क्षमता विकसित होती है।

जीवन कौशल आधारित शिक्षा और स्वस्थ जीवन शैली जिसमें शारीरिक स्वस्थता, समुचित खान-पान का महत्व एवं स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाले विकल्प चुनना शामिल है, खेल एक अच्छा प्रवेश द्वार है। इस बात के प्रमाण हैं कि खेल-कूद बाल विकास को बढ़ावा देते हैं और बेहतर अकादमिक प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित करते हैं। खेल एक सशक्त सामाजिक माध्यम है जो विभिन्न नस्लीय, सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषायी और समाजार्थिक पृष्ठभूमियों के व्यक्तियों को एक-दूसरे से जोड़ता है।

खेल हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। कुछ लोगों का मानना है कि खेल-कूद केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही महत्वपूर्ण हैं। मेरा मानना है कि खेल-कूद किसी व्यक्ति के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। हमारा देश बहुत विशाल और विविधताओं से भरा देश है। खेल-कूद राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने का एक बड़ा माध्यम हो सकता है। खेल-कूद से हममें खेल-भावना विकसित होती है जो हमारे सामाजिक जीवन को सरल बनाने का काम करती है। खेलों से हमें जीतने से भी अधिक यह सीखने में मदद मिलती है कि हार का सामना किस प्रकार करना चाहिए। खेल-कूद से हमें एक योद्धा बनने में सहायता मिलती है।

खेल-कूद से किशारियों के स्वाभिमान में वृद्धि होती है और इससे लैंगिक भेदभाव जैसी बाधाओं को पार करने की दृष्टि से आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं। खेल-कूद का उपयोग बच्चों के लिए सुरक्षित और संरक्षणात्मक वातावरण का संवर्धन तथा बच्चों को यह सिखाने के लिए किया जा सकता है कि किसी विवाद का समाधान अहिंसक तरीके से किस प्रकार किया जा सकता है। खेल-कूद के कार्यकलाप अल्प-लागत वाले हो सकते हैं और इनमें स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किया जा सकता है। खेल-कूद से बच्चों के शारीरिक कौशल का विकास करने, व्यायाम करने, उन्हें टीम के एक सदस्य के रूप में खेलने, निष्पक्ष खेलने और स्वाभिमान में वृद्धि करने में सहायता मिलती है।

स्वस्थ व्यक्तियों से स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण होता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति सक्रिय और स्वस्थ होगा, तो वह आर्थिक रूप से बेहतर उत्पादक होने के साथ-साथ खुशहाल जीवन-यापन कर सकेगा। 'आरोग्यम महा भाग्यम', अर्थात 'स्वास्थ्य ही धन है' कथन के माध्यम से हमारे देश में युगों-युगों से स्वास्थ्य के महत्व को स्वीकार किया गया है। लेकिन आज स्थिति भिन्न है। हमारा देश तेजी से विश्व के 'मधुमेह केन्द्र' के रूप में उभर रहा है। इसका कारण आधुनिक जीवनशैली, खान-पान की आदतें और शारीरिक कार्यकलापों में गिरावट होना है। यह हमारे देश के लिए एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौती है।

हमारे देश की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत हमेशा ही बहुत समृद्ध रही है, और अनंत काल से ही खेल-कूद भारतीय संस्कृति का महत्वपर्ण हिस्सा रहा है। धीरे-धीरे माहौल में बदलाव आया है और ऐसा खेलों के मामले में भी हुआ है।

पारंपरिक खेल केवल खेल नहीं होते थे, उन्हें इस प्रकार से बनाया जाता था कि कोई व्यक्ति उनसे तार्किक सोच, कूटनीति निर्माण, एकाग्रता, मूलभूत गणित, लक्ष्य निर्धारण जैसे अनेक प्रकार के कौशल का विकास कर सकता था। ऋगवेद, रामायण और महाभारत काल के समय विशिष्ट महारत हासिल पुरूषों से रथ-दौड़, धनुर्विद्या, सैन्य व्यूह-रचना, तैराकी, कुश्ती, घुड़सवारी और शिकारकला में पारंगत होने की अपेक्षा की जाती थी। जहां आज के युग में तीरंदाज स्थिर लक्ष्यों को भेदने के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई देते हैं, वहीं युगों पूर्व अर्जुन ने 'घूमती हुई मछली अर्थात् मत्स्य यंत्र' का भेदन करके और अपने प्रतियोगियों को परास्त करते हुए द्रौपदी को जीता था।

हम प्राचीन समय से बहुत आगे आ चुके हैं और हमारे देश में युवाओं की संख्या बहुत अधिक है जिसकी प्रतिभा को निखारने की आवश्यकता है। एक टीम के रूप में खेले जाने वाले क्रिकेट और कुछ समय पहले हॉकी को छोड़कर खेल स्पर्धाओं में हमें यदा-कदा ही सफलता मिलती थी और यह सफलता किसी सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन के कारण नहीं अपितु व्यक्तिगत प्रयासों और प्रतिभा के कारण मिलती थी। इस स्थिति में परिवर्तन होना चाहिए। चाहे सानिया मिर्ज़ा हों या पी.वी. सिंधु, साइना नेहवाल हों या पी.टी. ऊषा हों या मिल्खा सिंह हों या फिर अभिनव बिंद्रा, सभी ने अपने परिश्रम और दृढ़संकल्प से स्वयं के प्रयासों से ऐसा किया है और इस देश को गौरवान्वित किया है।

जैसा कि मैंने कहा, हमें सभी राज्यों में अच्छी खेल अवसंरचना का निर्माण करना है और खेल प्रतिभाओं को छोटी आयु से ही पोषित करना है। हमें युवा पुरूषों और महिलाओं को खेल सितारों में परिवर्तित करने और उन्हें भावी पीढ़ियों के लिए आदर्श बनाने के लिए समूचे देश में और अधिक प्रशिक्षण अकादमियों और कोचिंग केन्द्रों का निर्माण करने की आवश्यकता है।

यह मेरा सपना है, ऐसा सपना है जिसे मैं अपने करोड़ों देशवासियों को बताना चाहता हूं कि भारत विश्व में एक प्रमुख खेल राष्ट्र के रूप में उभर कर सामने आए। भारत सभी क्षेत्रों में बड़े बदलावों को लाने के लिए तैयार है और मुझे विश्वास है कि खेलों के मामले में भी यह बात सत्य है। वह दिन दूर नहीं जब भारत ओलम्पिक खेलों और अन्य खेल प्रतियोगिताओं की पदक तालिकाओं में प्रमुख स्थान हासिल करेगा।
जय हिन्द।"