27 सितंबर, 2018 को रांची में पेयजल तथा स्वच्छता विभाग द्वारा ललखटंगा पंचायत मे आयोजित स्वच्छता ही सेवा - 2018 के तहत जनसंवाद-सह-जागरूकता कार्यक्रम में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

रांची | सितम्बर 27, 2018

"स्वच्छता पखवाड़े के अवसर पर आप सबके साथ इस पावन जन-आंदोलन में सम्मिलित होने का मौका दिया है, इसके लिये आप सबके प्रति विनम्र आभार व्यक्त करता हूँ। हमने 2019 के राष्ट्रपिता पूज्य बापू की 150 वीं जन्म जयंती तक स्वच्छ भारत के स्वप्न को साकार करने का संकल्प लिया है और यह संकल्प ही हमारे स्वच्छ जनानंदोलन की प्रेरणा है। यह एक कृतज्ञ राष्ट्र की अपने आदर्श पुरूष के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि भी है।

गांधी जी के स्वच्छता को शुभता और ऐश्वर्य का पर्याय माना। एक समाज सुधारक के रूप में, गांधी जी का मानना था “स्वच्छता राजनैतिक आजादी से महत्वपूर्ण है” गांधी जी मात्र निजी स्वच्छता के ही नहीं अपितु सामुदायिक स्वच्छता के समर्थक थे। उनका मानना था कि हमारे गंदे शौचालय और मल विसर्जन की गंदी आदतें ही हमारी बीमारियों की जड़ हैं। सामुदायिक स्वच्छता गांधीवादी जीवन शैली का अपरिहार्य आवश्यक अंग रही। उनके आश्रमों में सामुदायिक और निजी स्वच्छता पर विशेष आग्रह रहता था।

आज हमने उसी गांधी दर्शन को अपने सामुदायिक सार्वजनिक जीवन में अंगीकार करने का संकल्प लिया है। इस जनआंदोलन में समाज का हर वर्ग, हर छोटा, बड़ा नागरिक और बच्चे, स्त्री, पुरूष, बढ़ चढ़ कर भाग ले रहे हैं।

मित्रों, हाल ही में 23 सितंबर को इसी शहर में प्रधानमंत्री के आयुष्मान भारत योजना को राष्ट्र को समर्पित किया। योजना के तहत 10 करोड़ परिवारों को 5 लाख का स्वास्थ्य बीमा दिया जायेगा। गरीब और वंचित वर्गों को बड़ी राहत मिलेगी। एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष 5 करोड़ लोग महंगे उपचार के चलते गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। आयुष्मान भारत इन परिवारों को वस्तुत: आयुष्मान बनाने की दिशा में सफल कदम है। लेकिन मित्रों, रोग के उपचार से बढ़कर रोग का प्रतिकार, स्वास्थ्य की अधिक प्रभावी गारंटी है। रोगों के प्रतिकार के लिये सामुदायिक और निजी स्वच्छता, शुचिता, सस्ता और प्रभावी माध्यम है।

मित्रों,

यूनीसैफ के अध्ययन के अनुसार स्वच्छता और शुचिता से एक परिवार प्रतिवर्ष उपचार आदि पर होने वाले लाभों रू 50,000 के खर्च की बचत कर सकता है। भारत में ही प्रतिवर्ष 1 लाख बच्चे अस्वच्छता के कारण डायरिया जैसी बीमारी के शिकार हो जाते है। अस्वच्छता और मलिन वातावरण बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास को बाधित करता है और समाज के बहुमूल्य भविष्य को प्रभावित करता है। यदि हम अस्वच्छता की Social Cost के बारें में बात करें तो विश्व बैंक के अध्ययन के अनुसार मलिनता के कारण प्रतिवर्ष 6% की दर से हमारी विकास दर प्रभावित होती है।

मलिनता आपके समुदाय, शहर और राष्ट्र के सम्मान को प्रभावित करती है। खुले में शौच हमारी महिलाओं और बच्चियों के सम्मान, स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

यह संतोष का विषय है कि पिछले चार सालों में, देश ने प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत आह्‌वाहन को अंगीकार कर जनआंदोलन का स्वरूप दिया है। सामुदायिक स्वच्छता सिर्फ सरकारी प्रोग्राम से नहीं प्राप्त की जा सकती। इसे जनआंदोलन के रूप में जनस्वीकार्यता मिली है। इस अभियान के तहत समुदायों, शहरों, गांवों को खुले में शौच से मुक्त करना, मानव द्वारा मल ढोने की अमानवीय पद्धति को समाप्त करना, कूड़े का प्रबंधन तथा समुदायों में स्वच्छता के संस्कार को पुनर्जागृत करना है।

आज देश के हर क्षेत्र से स्वच्छाग्रही आंदोलनकारियों द्वारा किये गये सकारात्मक कार्यों की प्रेरक कथाएं और चित्र सामने आ रहे हैं, जो समाज की दिशा और भविष्य के प्रति आशान्वित करते हैं। छोटे शहरों, गांवों, कस्बों के कितने ही नागरिकों ने अपने निजी संसाधनों को सामुदायिक स्वच्छता में लगा दिया, कुछ ने निजी स्तर पर शौचालय बनाने में श्रमदान किया तो किसी ने इस विषय पर सामुदायिक चेतना बढ़ाने का कार्य किया। यह आंदोलन हम सबका है। हम निजी स्तर पर भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। मित्रों, हमारे गांव, शहर प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कूड़ा पैदा करते हैं। हमारे शहर गांव जहाँ-तहाँ कूड़े के अंबारों से पटे हैं। यदि हममें से प्रत्येक यह संकल्प ले कि अपने घर, कार्यालय, पार्कों या सार्वजनिक स्थानों पर बिखरे प्लास्टिक के कुछ ही थैलों को कुड़ेदान में डालेगा, तो आप पायेगें कि आपका यह छोटा सा कार्य ही प्रेरणा बनकर, शनै: शनै: समाज में सामुदायिक स्वच्छता का संस्कार बन जायेगा।

पिछले चार वर्षों में स्वच्छता, रैलियों, पोस्टरों, विज्ञापनों नुक्कड़ नाटकों और लोकगीतों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश प्रभावी ढंग से जन जन तक पहुंचाया गया है। लोगों को इस आंदोलन से जोड़ा गया है। सरकार और समुदाय की साझी नीयत और निष्ठा से ही इसे जनआंदोलन का रूप दिया जा सका है। सरकार के हर मंत्रालय ने विभिन्न शहरों में स्थानीय स्तरों पर कार्यक्रम किये हैं। निजी या सरकारी क्षेत्र के प्राय: हर उपक्रम ने CSR के माध्यम से स्वच्छता अभियान में अभिनंदनीय भाग लिया है। पिछले चार वर्षों का साझा प्रयास रंग लाया है। 2014 में जब यह अभियान प्रारंभ हुआ था देश के अधिकांश प्रांतों में 30% घरों में ही शौचालय थे। झारखंड जैसे प्रांत में तो यह औसत 30% से भी कम था। गत चार वर्षों में यह औसत बढ़कर 90% से अधिक पहुँच गया है। झारखंड में यह वृद्धि दुगने से अधिक है। गत चार वर्षों में देश भर में घरों में लगभग 14 करोड़ शौचालय बनाये गये है। ग्रामीण क्षेत्रों में 8 करोड़ घरेलू शौचालय बनवाये गये है। देश के 60% गांव Open Defecation Free घोषित कर दिये गये है। 4.5 लाख गांव और 459 जिले और 21 राज्य ODF घोषित हो चुके हैं।

एशियन डेवेलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (आद्री) द्वारा झारखंड के कतिपय ब्लॉकों में किये गये अध्य्यन से उत्साहवर्धक निष्कर्ष सामने आये हैं। महिला समूहों में सामुदायिक और निजी शुचिता के प्रति जागरूकता और आग्रह बढ़ा है। महिलायें अपने परिवारों में भी शुचिता को लेकर जागरूक हुई हैं। गत वर्षों में दस्त के मामलों में 23% और अनीमिया के मामलों में 10% की कमी आयी है। ये निष्कर्ष भविष्य के प्रति आशान्वित करते हैं।

इसी प्रकार, सामुदायिक शौचालयों की संख्या इस अवधि में 900 से बढ़कर 10000 तक पहुँच गई है। मेरा सुझाव होगा कि झुग्गी झोपड़ी क्षेत्रों में तथा अनियंत्रित बसावट के इलाकों में सामुदायिक शौचालयों पर अधिक ध्यान दिया जाय। यह सुनिश्चित किया जाय कि शौचालय विशेषकर सामुदायिक शौचालयों में, पानी और निकासी को पर्याप्त व्यवस्था हो। सफाई और मरम्मत का विशेष और सतत ध्यान रखा जाना आवश्यक है। इसके लिये स्थानीय निकाय और सरकारी संस्थाएं, CSR के माध्यम से सरकारी उपक्रम, स्कूल विशेष सहायता कर सकते है। शौचालयों का रखरखाव, मरम्मत और गुणवत्ता इस जन आंदोलन की स्थायी सफलता के लिये आवश्यक है। ऐसी शिकायतें मिली हैं कि शौचालय सिर्फ सरकारी कागज़ों पर ही है वास्तविकता में नहीं। इस संशय को दूर करने के लिये नवनिर्मित शौचालयों की Geo-tagging की जा रही है। इस योजना को लाभार्थी के (आधार नंबर) से जोड़ा जा रहा है। ODF घोषित होने के लिये पानी की नियमित आपूर्ति आवश्यक शर्त होनी चाहिये। स्थानीय निकाय सतत जनजागरूकता अभियान चलायें। लोगों को शौचालय का प्रयोग करने के लिये प्रेरित करें। ODF घोषित करने से पूर्व किसी स्वतंत्र एजेंसी से भी निरीक्षण करवाना श्रेयस्कर होगा। आवश्यक हो तो ODF सर्वेक्षण बार-बार कराये, जिससे सुनिश्चित हो सके कि जनता शौचालयों को नियमित व्यवहार में ला रही है।

मुझे हर्ष है कि स्वच्छता जनांदोलन शहरों की अपेक्षा गांवों में अधिक स्वीकार किया गया है।

मित्रों,

ठोस और गीले कूड़े का प्रबंधन और निस्तारण पर और ध्यान देना होगा। शहरों में हम सिर्फ 68% वार्डो में घर-घर जाकर कूड़ा एकत्र कर रहे हैं। एकत्रित कूड़े का सिर्फ 23% ही Process किया जाता है। इस दिशा में सुधार की आवश्यकता है।

इससे ही जुड़ा एक और अति महत्वपूर्ण मानवीय मुद्‌दा है-मनुष्य द्वारा मल उठाने की अमानवीय प्रथा। इस अमानवीय प्रथा को तत्काल समाप्त होना ही चाहिये। कानून होते हुए भी इस प्रथा का जारी रहना हमारे समाज की नैतिकता और कानून के प्रति शासन की प्रतिबद्धता पर प्रश्न खड़े करता है। नाली साफ करने वाले सफाई कर्मियों की मृत्यु, हमारे सभ्य होने पर संशय पैदा करती है।

सरकार को इस दिशा में तत्काल अन्य वैज्ञानिक विकल्प खोजने चाहिए, स्थानीय निकाय भी वैकल्पिक वैज्ञानिक उपकरणों का प्रयोग करें। इसके लिये आवश्यक धनराशि उपलब्ध कराई जानी चाहिये। ऐसे सफाईकर्मियों और उसके परिवार को वैकल्पिक रोजगार और आर्थिक सहायता की व्यवस्था की जानी चाहिये। समाज और समुदाय इन सफाईकर्मियों और उनके परिवारों को सहायता के साथ अपनाने और उनके नवोत्थान में सहायक बने, एक मानवीय नैतिक समाज से यही अपेक्षा है।

मित्रों,

स्वच्छता और शुचिता के इस महान यज्ञ में आपका सतत सहयोग वांछनीय है, प्रार्थनीय है। हर घर, हर वर्ग, स्वच्छता के संस्कार को विकसित करे। माता-पिता, गुरू, अपने बच्चों और युवाओं में स्वच्छता का संस्कार डाले और सामुदायिक अनुशासन की प्रेरणा दें। इसी आशा के साथ, मैं अपने वक्तव्य को विराम देता हूँ।

जय हिंद!