27 फरवरी, 2017 को नई दिल्ली में यूनिस रज़ा स्मृति व्याख्यान में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | फ़रवरी 27, 2017

संधारणीय भविष्य की दिशा में

छठे यूनिस रज़ा स्मृति व्याख्यान में आमंत्रित किया जाना एक सम्मान की बात है।

प्रोफेसर यूनिस रज़ा, जिन्हे उनके मित्र और मेरी पीढ़ी के उनके जानकार यूनिस भाई कहा करते थे, एक शिक्षाविद से कहीं ज्यादा थे। वे पिछली सदी के पांचवे दशक के शुरूआती और मध्य के दौर के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रगतिशील समूह के रहनुमा थे और एक ऐसे समय में जब विचारधारा के प्रति झुकाव खुलकर ज़ाहिर किए जाते थे, उन्होंने एक बिरले जोश और प्रतिबद्धता के साथ उन्हें अपनाया।

अथर परवेज़ साहब जैसे उनके समकालीन शख्स ने उनके कैंपस छोड़ने के सालों बाद भी उनके अलीगढ़ आने पर उनके द्वारा दर्शाई गई अनौपचारिक व्यावहारिकता के बारे में आने वाले पीढ़ियों के लिए लिख छोड़ा है। उनके व्यक्तित्व के इस पहलू को बाद के सालों में दिल्ली में कई लोगों ने याद किया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उनके कार्यकाल को समग्र प्रगति और शैक्षिक गतिविधियों के मामले में उपयोगी होने के रूप में याद किया जाता है। वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सह-संस्थापक थे और उन्होंने इसके भौतिक वातावरण के साथ-साथ इसके उदार मूल्यों पर भी अपनी छाप छोड़ी, जो कुछ लोगों के लिए चिंता का विषय बन गया सा प्रतीत होता है, जिन्हें एलैक्ज़ैंडर पोप ने संकीर्ण आत्माओं की संज्ञा दी होती।

उनकी शैक्षिक वृत्ति एक भूगोलविद् की थी, जिनका ध्यान मानवीय भूगोल पर केंद्रित था। उनके काम से पारंपरिक मानवीय भूगोल और पर्यावरण विज्ञान के बीच की सीमाएं मिट सी गई थीं जिसके तहत उन्होंने भूगोल के प्राकृतिक और सामाजिक-आर्थिक तत्वों तथा उसके जनसामान्य पर प्रभाव दोनों का समन्वय किया था। उन्होंने सिखाया कि संस्कृति, समाज, अर्थशास्त्र और राजनीति सभी हमारे परिवर्तनशील प्राकृतिक वातावरण में अपना-अपना योगदान देते हैं और केवल इन कारकों को समझकर ही हम लोगों और स्थानों के बीच के जटिल संबंधों को समझ सकते हैं और भावी चुनौतियों के लिए तैयारी कर सकते हैं।

यहां उपस्थित आप में से कुछ लोगों को याद होगा कि वर्ष 1972 में मानवीय पर्यावरण विषय पर आयोजित स्टॉकहोम सम्मेलन के दस वर्षों बाद पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के क्षय के बारे में सशक्त जागरूकता 1983 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के ब्रन्टलैंड आयोग के गठन के निर्णय के माध्यम से ही आ पाई थी, आयोग की 1987 में आई रिपोर्ट ने 'सस्टेनेबल डिवेलपमेंट' (संपो‍षित विकास) शब्द गढ़ा, और इसे ऐसे विकास के रूप में परिभाषित किया है जो भावी पीढ़ियों की मांगों की पूर्ति करने की क्षमता को घटाए बगैर वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करता है।

इस प्रतिवेदन में संपोषित विकास के तीन आयामों - पर्यावरण, अर्थव्यवस्था एवं समुदाय - पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। इससे प्रेरित होकर, 1990 की तेलोवो घोषणा के माध्यम से उच्च शिक्षा में संपोषणीयता को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया। यूनिस रज़ा इस घोषणा और एसोसिएशन ऑफ यूनिवर्सिटी लीडर्स द्वारा प्रस्तुत की गई दस-सूत्रीय कार्य-योजना को प्रस्तावित करने वालों में से एक थे। ऐसोसिएशन ने संपोषित भविष्य के लिए पर्यावरण की दृष्टि से संपोषित विकास की जागरूकता बढ़ाने की प्रतिबद्धता को शामिल करवाया।1.

एक ऐसे समय में जब भूमण्डलीकरण, तीव्र जनसंख्या वृद्धि एवं मानव प्रवासन हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर और ज्यादा दबाव दाल रहे हें, यूनिस रज़ा के कथन "हमारे चारों ओर की दुनिया और उसके भीतर हमारा स्थान" को और बेहतर तरीके से समझे जाने की आवश्यकता है।.

II

हम एक गतिशील, मानव बहुल्य पारिस्थितिकी तंत्र में रहते है जिसमें पर्यावरण से जुड़े विविधतापूर्ण, अचानक होने वाले और स्थायी परिवर्तन बार-बार हो रहे हैं। पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव डालने वाली मानवीय गतिविधयों के इस युग में संपोषणीयता के लिए शासन करने के लिए हमारे कार्य के उद्देश्यों, अंतर्निहित मूल्यों और आदर्शों के साथ-साथ ज्ञान पद्धतियों, सत्ता संरचना एवं सुरक्षा की अवधारणा को फिर से परिभाषित और मूल्यांकित किए जाने की आवश्यकता है।

हाल के वर्षों में सुरक्षा को समझने और परिभाषित करने के हमारे तरीकों में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। सुरक्षा समीकरण के केन्द्र में भूभाग के स्थान पर लोगों को रखकर हमने 'मानवीय सुरक्षा' की अवधारणा को विकसित किया है। यह राष्ट्रीय एवं सैन्य सुरक्षा की पारंपरिक धारणा से आगे की बात है जिसमें विकास एवं मानवाधिकारों के सम्मान जैसे मुद्दे शामिल हैं। यह आपातकालीन, परिवर्तनशील और विकासात्मक संदर्भ में मानवीय कार्यों एवं क्षमता निर्माण संबंधी प्रयासों की रूपरेखा तैयार करने, उसको बढ़ाने और मूल्याकंन करने के लिए एक व्यापक एकीकृत ढांचा मुहैया कराता है। यह मानता है कि आज के वैश्वीकृत होते समाज अभी भी अंतर्राज्यीय मुद्दों एवं आंतरिक द्वंद्वों के साथ-साथ नई और बार-बार उत्पन्न होने वाली चुनौतियों जैसे पुराने खतरों से प्रभावित हो रहे हैं जो लोगों और उनकी संस्थाओं को कमजोर करते हैं। इसमें सुरक्षा के मायनों में अब विस्तार को मान्यता दी गई है जिसके अंतर्गत राज्य के संरक्षण पर ध्यान केन्द्रित करने के स्थान पर संरक्षण एवं मानवजाति की गरिमा दोनों पर ध्यान केन्द्रित करना शामिल है।

व्यापक पैमाने पर मानव सुरक्षा प्राकृतिक संसाधनों तक लोगों की पंहुच और पर्यावरण में हो रहे परिवर्तन की सुभेद्यता पर निर्भर करती है - और पर्यावरण में होने वाले परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानवीय गतिविधियों और टकरावों से प्रभावित होता है। इस प्रकार, पर्यावरण मानव के अस्तित्व, भलाई और गरिमा - मानव सुरक्षा के सभी पहलुओं को प्रभावित करता है।

परिणामस्वरूप, मानव सुरक्षा की नीति संपोषित मानवीय विकास के विचार के साथ गहनता से जुड़ी हुई है, जिसमें न केवल आर्थिक विकास करने की बल्कि उसके लाभों को समान रूप से वितरित करने, पर्यावरण को बर्बाद करने के बजाय उसे पुनरूज्जीवित करने, और लोगों को पिछड़ा बनाने के बजाय उन्हें सशक्त बनाने की परिकल्पना की गई है।

यह निरंतर स्पष्ट होता जा रहा है कि विकास की केवल आर्थिक मूल्यों पर आधारित नीतियाँ अपर्याप्त हैं। सतत विकास पर व्यापक जोर दिये जाने की जरूरत है। इससे एक महत्वपूर्ण क्षेत्र अर्थात् - पर्यावरण सुरक्षा की पहचान हुई है, जो इस बात की जाँच करता है कि पर्यावरण हमारी सुरक्षा से किस प्रकार से जुड़ा हुआ है। ऐसी जाँच में, मानव जाति और सामाजिक संबंध ऐसी वस्तुएं या प्राथमिकता वाले विषय बन जाते हैं जिन्हें पर्यावरण संबंधी खतरों, न कि राज्यों से, सुरक्षित किया जाना होता है।3

पर्यावरण परिवर्तन के लोगों के हितों और आजीविका पर प्रत्यक्ष और तत्काल प्रभाव पड़ सकते हैं। इस प्रकार, जल की कमी, तात्कालिक अथवा सुदूर कारण से होने वाले युद्ध से शरीर में पानी की कमी से होने वाली मौतों, खाद्य उत्पादन की कमी होने और आजीविका के अवसरों में कमी आने के कारण असुरक्षा उत्पन्न हो सकती है।4 इसके अनेक प्रभाव हो सकते हैं जो स्वास्थ्य, आर्थिक उत्पादकता और राजनैतिक अस्थिरता तक हो सकती है और वह व्यक्तियों, परिवारों,समुदायों, सामाजिक संगठनों को और विशेष रूप से सीमान्त और संवेदनशील समूहों को भी प्रभावित कर सकती है। यद्यपि पर्यावरण संबंधी कुछ समस्याएं स्थानीय हो सकती हैं, तथापि कुछ अन्य व्यापक होती हैं और उनका प्रभाव भावी पीढ़ियों पर पड़ सकता है।

III

पर्यावरण सुरक्षा और विकास को देखें तो लोगों, प्रकृति और अर्थव्यवस्थाओं के बीच का संबंध अपरिहार्य है क्योंकि वे मानव सुरक्षा से संबंधित हैं। सुरक्षा और विकास की इच्छा लोगों को पर्यावरणीय खतरों से संरक्षित करने या मानव गतिविधियों से पर्यावरण का संरक्षण करने के प्रयासों से अधिक रहती है। वे निरंतर रूप से पर्यावरण द्वारा प्रदत्त अवसरों का लाभ उठाने के लिए व्यावहारिक कदमों, उसमें अंतर्निहित मूल्य को पहचानने में, और मानव जाति, समाज और अर्थव्यवस्थाओं से उसके गहरे रिश्ते पर आधारित होते हैं - ताकि विकास इस प्रकार से हो जो संपोषणीय हो।

संपोषणीय विकास का विचार 1992 के रियो दि जिनेरो सम्मेलन से निरंतर विकसित हुआ है।6 इसे बाद के दशक में "लोकल एजेंडा" और वर्ष 2002 के जोहानिसबर्ग में संपोषणीय विकास संबंधी वैश्विक शिखर सम्मेलन द्वारा पोषित किया गया था।7 दिसम्बर 2015 में पेरिस में संयुक्त राष्ट्र के पक्षकारों के सम्मेलन 21 (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टिस 21) जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में पर्यावरण परिवर्तन और संपोषणीयता एक बार फिर से फोकस में थी, जिसमें "सार्वभौमिक जलवायु परिवर्तन" के लिए वैश्विक कार्रवाई को स्वीकृत किया गया।

मौलिक अंतर्विचारों जिनसे संपोषणीयता के विचार का आरंभ हुआ था, अब दृढ़ता से स्थापित हो चुका है। यह समझ बढ़ रही है कि मानव जाति की बेहतरी के उद्देश्य के साथ प्रकृति का संरक्षण करने के प्रयास नहीं किए गए तो वे उसी प्रकार से विफल हो जाएंगे जैसे कि वे लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के प्रयास विफल हो जाएंगे, यदि अनिवार्य संसाधन बढ़ा नहीं पाएं और पर्यावरण का संरक्षण नहीं हो पाए।

इस विचार को हर जगह निर्धन और पिछड़ों सहित सभी लोगों के लिए कार्यदक्ष बनाना एक चुनौती है।

IV

पेरिस सीओपी में सर्वसम्मति तक पंहुचने की कामयाबी को, सावधानी और आलोचना से संतुलित किया गया है। पृथ्वी ग्रह के लिए एक मार्शल योजना होने से काफी अलग, इस जलवायु करार को "विभिन्नता के मिश्रण" के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें एक कार्यकर्ता समूह यह तर्क दे रहा है कि सरकारें "संकीर्णता से परिभाषित और अल्पावधिक हितों" को मानवता के हित से ऊपर रखने में विफल रही हैं, यह भी कहा गया है कि इस करार में केवल"विश्व के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर लोगों के लिए एक जीण-शीर्ण जीवन-रेखा" का प्रस्ताव किया गया है।

इस करार के अन्य आलोचकों ने कहा है कि एक नये भावी जलवायु वित्तपोषण के लक्ष्य का केवल एक अस्पष्ट वचन दिया गया है, जबकि इस करार में देशों को जलवायु परिवर्तन आपदा को रोकने के लिए उत्सर्जन में पर्याप्त कटौती करने के लिए बाध्य नहीं किया गया है, जिससे केवल भविष्य में रूपांतरण लागत ही बढ़ेगी।8

असमान हितों, चाहें एक तरफ मितव्ययिता-विरोधी समूह हों या दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ता हो, का एक संयुक्त मोर्चा बनाये बिना वैश्विक उपायों को किसी भी प्रकार से कार्यान्वित करना निरर्थक होगा। पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और राजनीति व्यापक हैं किंतु एक जटिल संरचना की अभिन्न कड़िया हैं।9

संयुक्त राज्य में नये प्रशासन के कुछ सदस्यों द्वारा अभिव्यक्त विचारों से जलवायु परिवर्तन संबंधी सतत वैश्विक कार्रवाई के भविष्य पर प्रश्न उठने लगे हैं। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने और संपोषणीयता को बढ़ावा देने के तात्कालिक लक्ष्य और वचनबद्धताएं जोखिम में पड़ सकते हैं। वैश्विक प्रणाली में बहिर्मुखी होने की तुलना में अधिक अंतर्मुखी होने के बढ़ते हुए बदलाव से वैश्विक सहयोग को मजबूत बनाने में चुनौतियां भी आएंगी।

आज हमें सतत विकास के ऐसे ढाँचे को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाने की और ज्यादा जरूरत है, जो स्थायी मानव विकास हेतु सुरक्षा के मानवीय और पर्यावरणीय दोनों प्रकार के तत्वों में सामंजस्य स्थापित करता हो।10 मानव जीवन के लिए मूलभूत रूप से आवश्यक विभिन्न स्वछंदताओं की दृढ़ता, उनकी परस्पर निर्भरता और सार्वभौमिकता पर बल देते हुए लोगों की उत्तरजीविता, जीविका और गरिमा को सुनिश्चित करने तथा हमारी असंख्य समस्याओं - मनुष्यों का पलायन, जलवायु संबंधी आपदाओं, बार-बार पड़ने वाले अकाल, स्थायी गरीबी, महामारियों, भयंकर असमानताओं और अन्य समस्याओं का व्यवस्थित समाधान ढूँढने हेतु यह आवश्यक है।

मात्र प्रौद्योगिकीय समाधानों, राजनीतिक विनियमनों या वित्तीय साधनों द्वारा सतत् विकास संभव नहीं है। इसके लिए हमें अपने सोचने के तरीके और कार्यप्रणाली को बदलने की आवश्यकता है। हमें वर्तमान और भावी वैश्विक चुनौतियों का सकारात्मक और सृजनात्मक रूप से समाधान करने तथा अधिक स्थायी एवं लचीले समाज का निर्माण करने में सक्षम बनाने हेतु सभी स्तरों पर और सभी सामाजिक संदर्भों में स्थायी विकास की शिक्षा और अधिगम की आवश्यकता है।

व्यक्तिगत पहलों को भी कमतर महत्व नहीं दिया जा सकता है क्योंकि पर्यावरणीय प्रदूषण या क्षरण जितनी समुदाय की जिम्मेदारी है, उतनी ही व्यक्ति विशेष की भी। अनवरत रूप से किए गए छोटे-छोटे उपाय से स्थायी सकारात्मक परिवर्तन हेतु क्रमिक विकास और तीव्र विकास, दोनों में मदद मिलती है।

भारत के एक पूर्व प्रधान मंत्री ने पर्यावरण संबंधी एक वैश्विक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा था "यह स्पष्ट है कि आज विश्व जिस पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है, उससे भविष्य में हमारे ग्रह में अत्यधिक बदलाव आएगा। हममें से कोई भी, चाहे हमारी हैसियत, शक्ति या परिस्थिति कुछ भी हो, इससे अप्रभावित नहीं रह सकता। परिवर्तन की प्रक्रिया वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय नीतियों को चुनौती देती है। क्या "एक धरती" और "एक पर्यावरण" के संबंध में बढ़ती जागरुकता से हम "एक मानवता" की अवधारणा की ओर अग्रसर होंगे? क्या विश्व के कम विकसित हिस्से की त्वरित प्रगति में होने वाली पर्यावरणीय क्षति की लागत का वितरण और अधिक समान रूप से किया जाएगा और इसमें अधिक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय रूचि संभव होगी? या, क्या हम देश-विशिष्ट आत्मनिर्भरता पर आधारित संकीर्ण सोच तक ही सीमित रहेंगे?”11

यह 1972 में कहा गया था। दुखद है कि धरती के अंतरिक्षयान के यात्री अभी भी संकीर्ण स्वार्थ के द्वण्द्वों में फँसे हैं और इस बात पर अभी भी आम सहमति नहीं बना पाए हैं कि हम जिस विनाशकारी पथ पर अग्रसर हैं, उसे कैसे बदलें। तथापि हमें प्रोफेसर मुनीस रज़ा जैसे मानव भूगोलविदों समेत उन अग्रदूतों को धन्यवाद देने की आवश्यकता है जिन्होंने इस समस्या की गंभीरता की ओर ध्यान दिलाया।

V

हम यहाँ जिस महान विभूति का सम्मान करने हेतु एकत्रित हुए हैं, उनकी सामाजिक चेतना के बारे में एक अंतिम बात कहूँगा। जन्म से मुस्लिम, विचार से मार्क्सवादी और आध्यात्मिक मामलों में अनीश्वरवादी मुनीस साहिब भारतीय परिदृश्य की समाज शास्त्रीय अनिवार्यताओं से पूरी तरह परिचित थे। सितम्बर 1994 में, एक पेपर में उन्होंने साम्प्रदायिक स्थिति पर विचार किया और उस संदर्भ में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक आर्थिक स्थिति का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय की निर्धारक विशेषताएं हैं "भारतीय होना और मुसलमान होना" और इसे न तो दरकिनार किया जा सकता है और न ही कमतर करके आंका जा सकता है।

तत्कालीन उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर उन्होंने समुदाय की सामाजिक-आर्थिक दशा और क्षेत्रीय विशिष्टताओं दोनों पर जोर दिया और यह निष्कर्ष निकाला कि 'चूँकि विकास अविभाज्य है' भारतीय मुस्लिमों की नियति भारत की नियति का अभिन्न घटक है और भारत की नियति अनिवार्यत: भारतीय मुस्लिमों की नियति से जुड़ी है। दोनों अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, एक-दूसरे पर आश्रित हैं और एक दूसरे के पूरक हैं। अत: हमारे समय की मांग है कि मुस्लिम नागरिकों की प्रगति के साथ भारत की प्रगति और साथ ही, भारत की प्रगति के साथ मुस्लिम नागरिकों की प्रगति हो।' 12

यह बात सच्चर समिति की 2006 में आयी रिपोर्ट और उसके बाद आयी रिपोर्टों के 12 वर्ष पहले और मई, 2014 के 'सबका साथ, सबका विकास' के 20 वर्ष पहले की है। मिर्जा गालिब का एक शेर याद आता है; कोई आशावादी कहेगा कि दोनों काम प्रगति पथ पर हैं।

जय हिन्द।


1ULSF - Programs & Services
2ULSF - Talloires Declaration
3http://hdr.undp.org/en/content/human-development-report-1994
4Myers, Norman; Environmental Security: What's New and Different?, Remarks at the Hague Conference on Environment, Security and Sustainable Development, May 2004
5Khagram, Sanjeev, William C. Clark, and Dana Firas Raad. 2003. "From the Environment and Human Security to Sustainable Security and Development." Journal of Human Development 4(2): p 289-313.
6ibid
7http://www.unep.org/Documents.Multilingual/Default.asp?documentid=78&articleid=1163
8National Research Council, Our Common Journey: A Transition Toward Sustainability, National Academy Press, Washington, DC. 1999
9https://www.oxfam.org/en/pressroom/pressreleases/2015-12-12/agreed-climate-deal-offers-frayed-life-line-worlds-poorest-people
10Kampmark, Binoy; ‘The COP21 Climate Summit: The Ambitions and Flaws of the Paris Agreement- Outcome of Deception and Bullying’; Global Research, December 13, 2015
11Khagram et al
12Indira Gandhi. Speech at the Plenary Session of United Nations Conference on Human Environment, Stockholm 14th June, 1972
13Moonis Raza. ‘Indian Muslims in Their Homeland’ – Economic & Political Weekly, volume 29, No, 39 (September 24, 1994) pp 2540-42.