26 अप्रैल, 2017 को येरेवान स्टेट यूनिवर्सिटी, अर्मेनिया में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी द्वारा दिया गया अभिभाषण

अर्मेनिया | अप्रैल 26, 2017

भावी दुनिया के संबंध में कुछ विचार

मैं इस मनोहारी शहर में आकर अत्यंत प्रसन्न हूं और आज येरेवान स्टेट यूनिवर्सिटी में मुझे आमंत्रित करने के लिए मैं यहां के रेक्टर और अध्यापकों का आभारी हूं।

मैं यहां, एक ऐसे देश में आया हूं जो भारत से कुछ दूर तो है परंतु भारतीयों की वैयक्तिक एवं सामूहिक स्मृति से दूर नहीं है। मैं स्वयं कलकत्ता (जिसे अब कोलकाता कहते हैं) में जन्मा हूं और उस शहर में मैंने कई वर्ष बिताए हैं। कोलकाता की ऐतिहासिक विशेषताओं में आर्मेनियाई गिरजाघर और इसके आर्मेनियाई निवासियों की अन्य निशानियां शामिल हैं। फादर माइकल कैमिच द्वारा रचित पुस्तक "हिस्टरी ऑफ आर्मेनिया" का कलकत्ता में 1827 में अनुवाद और प्रकाशन हुआ था। हाल में, मेशरॉव जैकब सेठ व जॉर्ज बोर्नोशियन जैसे इतिहासकारों ने भारत में कारोबार और वाणिज्य तथा विभिन्न सांस्कृतिक तथा धर्मार्थ कार्यकलापों में आर्मेनियाई जनता के योगदान के बारे में आधिकारिक रूप से लिखा है।

कम ही लोग जानते हैं लेकिन आर्मेनियाई मूल के एक संत मेरे देश के आध्यात्मिक इतिहास का एक अंग रहे हैं। मध्यकालीन इतिहास में सरमद के नाम से प्रसिद्ध एक रहस्यवादी संत थे जो इस इलाके के किसी स्थान से भारत आए थे और उन्होंने एक गैर-परंपरागत जीवन जिया। उन्हें 1660 में ईशनिंदा के लिए मृत्युदंड दिया गया क्योंकि उन्होंने एक ऐसे पंथ को अपनाया था जिसमें 'नकार' एवं 'स्वीकृति' की स्थितियों में अंतर माना जाता था। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख नेता और महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी अबुल कलाम आजाद सरमद की स्वतंत्र सोच और मानवतावाद से बेहद प्रभावित थे।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आधुनिक युग से भी काफी पहले लोगों का, व्यापार का और विचारों का आवागमन कोई अनूठी घटना नहीं थी। हालांकि आज मेरा प्रयोजन भविष्य के बारे में बात करना है, अतीत के बारे में नहीं।

II

श्रोताओं में मौजूद उम्रदराज पीढ़ी जानती है और युवाओं को बताया गया है कि 20वीं सदी संगठित उन्माद की सदी थी जिसकी विशेषताएं थी परामिथक और व्यापक संहार। इनके आधार पर एक प्रतिष्ठित इतिहासकार ने निष्कर्ष निकाला है कि हमारी दुनिया को बाह्य विस्फोट और अंत: विस्फोट दोनों का खतरा है; इसलिए इसे बदलना है।.

अपेक्षा थी कि सदी के आखिरी दशक में आए परिवर्तन से अधिक सौहार्दपूर्ण दुनिया बन सकेगी जिसमें अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं को अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के जरिए न्याय एवं अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के अनुरूप शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाया जाएगा, पर वैसा नहीं हुआ। इसके विपरीत, सोच और व्यवहार के पुराने तौर-तरीके बने रहे और नई प्रौद्योगिकी के सहयोग से दुनिया के अलग-अलग हिस्से में बाह्य विस्फोट और अंत:विस्फोट हुए। वैश्वीकरण के वायदे के सीमाएं भी ज़ाहिर हो चुकी हैं; एक विश्लेषक के शब्दों में, वर्ष 2008 के वित्तीय संकट ने "अनियंत्रित लालच के प्रति तंत्रगत कमज़ोरी" को उजागर कर दिया। अंतिम विश्लेषण में दोनों ही मामलों के संदर्भ में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर प्रशासन की विफलता परिलक्षित हुई।

और यह संकट सामरिक और वित्तीय मामलों तक ही सीमित नहीं रहा। जलवायुगत आपदाएं और महामारियों ने दिखा दिया कि व्यापक वैज्ञानिक प्रगति होने के बावजूद मानव नियंत्रण से बाहर की ताकतों के समक्ष कितना कमजोर है।

अवश्यंभावी निष्कर्ष यही है कि व्यक्तियों, समुदायों और वैश्विक समुदाय को सामूहिक रूप से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है कि उनके भविष्य के मानदंड क्या हैं। इस कोशिश में, आवश्यक रूप से पहला कदम है संभावित चुनौतियों की पहचान करना; दूसरा है यह अनुमान लगाना कि उन चुनौतियों के समाधान में वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय विकास का कितना प्रभाव पड़ेगा; और तीसरा यह मूल्यांकन करना कि उनका हमारे जीवन में और व्यवहारगत तौर-तरीकों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। हमें संभव और संभाव्य पर ध्यान केंद्रित करना है; तथापि संभावना की दृष्टि से क्या वांछनीय है और क्या अवांछनीय, इस पर भी विचार करना आवश्यक है।

मैं यहां पर यह भी कहना चाहूंगा कि विचार और चिंतन के ऐसे प्रयासों में कुछ भी अनोखी बात नहीं है। समग्र लिखित इतिहास में, मानव मस्तिष्क आदर्श स्थितियों (उच्चतम आदर्शवाद) और खराब से खराब हालात दोनों की परिकल्पना करता रहा है। इसके बावजूद मैं आज एक बेहतर विश्व का स्वप्न देखने को आतुर युवा दर्शकों के समक्ष इस मार्ग पर चलने की कोशिश करने का साहस जुटा पा रहा हूं।

III

हमारी आज की दुनिया के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों का सामान्य वर्गीकरण जीवन जीने, अच्छे से जीवन जीने, शांतिपूर्ण जीवन जीने, मानवीय अथवा प्राकृतिक खतरों के बगैर जीवन जीने की इच्छा पर आधारित है। बुराई हमेशा की तरह व्यापक है। जीने का अधिकार, जिसे सार्वभौमिक रूप से मूलभूत मानव अधिकार माना जाता है, का अर्थ है सांस लेने, भोजन, जल और स्वास्थ्य का अधिकार। सामूहिक रूप से इन सबके लिए सतत विकास तथा जलवायु परिवर्तन की व्यापक चुनौतियों का समाधान आवश्यक है। इनके साथ-साथ जनसंख्या, बीमारी, ऊर्जा और संसाधनों से जुड़ी समस्याएं भी मौजूद हैं।

इनके अलावा, लेकिन इनसे जुड़ी, वे सभी जरूरते हैं जो मानवजाति को सामाजिक एवं राजनीतिक प्राणी होने के नाते समाज में रहने के लिए चाहिए, फिर चाहे वह समाज स्थानीय, राष्ट्रीय अथवा वैश्विक स्तर का है। इसके साथ-साथ यह अहसास भी बढ़ रहा है कि ये चुनौतियां राष्ट्रीय सीमाओं से बंधी हुई नहीं है, और उनसे केवल ऐसे वैश्विक सहयोग के द्वारा ही निपटा जा सकता है, जिसमें जिम्मेदारी का विभाजन समतापूर्ण हो। इसके परिणामस्वरूप राष्ट्र की निर्णय शक्ति तथा संप्रभुता की पुरानी विचारधाराओं और सिद्धांतों का महत्व कम हुआ है।

इन उभरती आवश्यकताओं के दोहरे निहितार्थ हैं: प्रौद्योगिकी संबंधी और समाज-राजनीति संबंधी।

आज हमेशा से ज्यादा, सभी समुदाय यह मानते हैं कि समाधान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के माध्यम से लाए जाने होंगे। ये संभावनाएं कुछ संदर्भों में आकर्षक हैं, तो अन्य संदर्भों में बेचैन करने वाली हैं।

मानव के विकास को प्रभावित करने वाली कुछ नई प्रौद्योगिकी का संबंध ऊर्जा, सायबर प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स, मानवनिर्मित बुद्धि (आर्टिफिशयल इंटेलीजेन्स), क्वांटम मैकेनिक्स, जीन एडिटिंग तथा अंतरिक्ष अन्वेषण से है। भविष्य में इन सभी के भू-राजनैतिक परिणाम निकलेंगे।

मैं इनमें से कुछ के परिणामों के बारे में बताना चाहूंगा।

मानव सभ्यता का जिस प्रकार विकास हुआ है, वह ऊर्जा केन्द्रित रही है और नई प्रौद्योगिकी हमारी ऊर्जा की मांगों में और वृद्धि करेगी। 20वीं शताब्दी हाइड्रोकार्बन की शताब्दी थी। इस शताब्दी के अंतिम वर्षों में यह महसूस किया गया कि हाइड्रोकार्बन संसाधन असीमित नहीं हैं और वैश्विक संघर्ष के संदर्भ में इस जानकारी के राजनीतिक निहितार्थ थे।

ऊर्जा उद्योग को 'फ्रैकिंग' यानी भूमि के अंदर से अधिकाधिक हाइड्रोकार्बन का उत्खनन करने वाली नई तकनीकों और प्रौद्योगिकियों से बड़ा झटका लगा। यद्यपि पर्यावरणीय नुकसान की चिंताएं हैं, परन्तु इनसे तेल और गैस के उत्पादन में वृद्धि हुई, जिससे पुराने कोयला चालित विद्युत संयंत्रों की उपयोगिता समाप्त हो गई और कुछ देशों की विदेशी तेल पर निर्भरता पर भी प्रभावी कमी आई।

वैज्ञानिकों ने परमाणु जैसे अन्य संसाधनों का प्रयोग प्रारंभ किया।

स्वच्छ ऊर्जा की मांग बढ़ रही है। सौर और पवन ऊर्जा में बहुत तेजी से वृद्धि हो रही है। उदाहरणार्थ प्रत्येक दो वर्षों में सौर स्थापन की दर दोगुनी हो रही है और फोटो वोल्टेयिक मॉड्युल की कीमतें लगभग 20 प्रतिशत गिरी है। सरकारों द्वारा चरणबद्ध तरीके से समाप्त की जानेवाली सब्सिडी के बिना भी सौर प्रणाली स्थापित करने की मौजूदा कीमतें निवेशों पर रिटर्न को चार वर्षों से कम कर वर्ष 2022 तक आधी हो जाएंगी। वर्ष 2030 तक सौर ऊर्जा मौजूदा ऊर्जा जरूरतों को शत प्रतिशत पूरा कर सकेगी, वर्ष 2035 तक यह आपके सेल फोन की तरह लगभग मुफ्त हो जाएगी।

जब विज्ञान से जुड़े लोगों ने धरती से परे देखा, तो एक रोचक संभावना जगी। कई वर्ष पूर्व सोवियत खगोलविद नोकोलई कार्दाशेव ने ऊर्जा के संसाधनों के संदर्भ में सभ्यता के चरणों के सिद्धांत का प्रतिपादन किया और जीवाश्म संसाधनों पर आधारित वर्तमान को सब जीरो टाइप, इसके बाद टाइप I जो संपूर्ण ग्रह की ऊर्जा का उपयोग करेगा और तारों से टाइप II तथा आकाश गंगा से टाइप III के रूप वर्गीकृत किया।

जैसा कि भविष्यवादी रे कुर्जवेल कहते हैं, जब एक्सपोनेंशियल टेक्नॉलॉजी एक प्रतिशत है, आप 100 प्रतिशत से आधी दूरी पर हैं और सौर तथा पवन ऊर्जा के मामले में भी यही स्थिति है। विकास के दूसरे दौर में जीवाश्म ईंधन उद्योग निकट भविष्य में समाप्त हो जाएगा और इसके साथ हाइड्रोकार्बन संपन्न राज्यों का भूसामरिक महत्व भी समाप्त हो जाएगा। विश्व के अनेक भागों में क्षेत्रीय सुरक्षा स्थापत्यों पर इसका क्रमिक प्रभाव होगा तथा इसका पूरे विश्व पर भी प्रभाव पड़ेगा।

साइबर तकनीकी ने हमें अभिभूत कर दिया है और मानव संगठन के प्रत्येक स्तर पर इसका प्रभाव स्पष्ट है। यह अपने आपमें खतरनाक नहीं है बल्कि अधिकतर समाज ने पहले ही इससे उत्पन्न हो रहे जोखिम से निपटना प्रारंभ कर दिया है। जैसा कि एक प्रमुख विचारक ने कहा है कि सामाजिक, वित्तीय, औद्योगिक और सैन्य क्षेत्रों में इसका प्रयोग 'क्रांतिकारी रूप से संवेदनशील है'।

रोबोटिक्स और डिजिटल विनिर्माण अब दूरस्थ क्षितिज पर नहीं है और देशों तथा अर्थव्यवस्थाओं के लिए इसके अपने निहितार्थ हैं। जब रोबोटिक कारखानें और 3-डी प्रिंटिंग जैसी अन्य क्रांतिकारी विनिर्माण तकनीकी सस्ती तथा व्यापक रूप से उपलब्ध होगी, तो एशिया में विश्व के अन्य भागों से आउटसोर्स किये हुए विनिर्माण जिससे एशिया में आर्थिक पुनरूद्धार को बल मिला तथा ऊर्जा और अन्य भौतिक संसाधनों की मांगें वृहद पैमाने पर बढ़ीं, के घटने की संभावना है। फॉक्सकॉन ने पहले ही घोषणा की है कि इसके अधिकतर कामगार रोबोट द्वारा प्रतिस्थापित कर दिये जाएंगे। एबीबी के युमी और रिथिंक रोबोटिक्स सॉयर जैसे रोबोट की नई पीढ़ी सूई में धागा डालने में दक्ष है और इनकी कीमतें लगभग एक कार के बराबर है। रोबोट सर्वत्र समान रूप उत्पादक होते हैं। जब विनिर्माण केन्द्र उपभोग केंद्रों के अधिक समीप आ जाएंगे, व्यापार मार्गों का भूसामरिक महत्व तथा परिवहन की मांग भी घट जाएंगी।

ऐसे परिवर्तन मौजूदा विनिर्माण आधारित अर्थव्यवस्थाओं पर दीर्घकालिक तौर पर पारिश्रमिकता के नीचे गिरने का दवाब बनेगा। इससे आवश्यक सामग्रियों और ऊर्जा की कीमतें घटेंगी और कुछ अर्थव्यवस्थाएं अस्थिर हो सकती हैं। इसके क्रमिक प्रभाव हो सकते हैं क्योंकि मजबूत वैश्विक अवमूल्यनकारी ताकतें सभी अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करेंगी। कुछ सरकारें प्रतिक्रिया रूप में संरक्षणवाद थोपने का प्रयास कर सकती हैं। वे पारिश्रमिक बढ़ा सकती हैं जिससे अंतत: अधिक सस्ती मशीनों द्वारा स्थायी रूप से कामगारों को प्रतिस्थापित किये जाने की गति बढ़ सकती है।

प्रौद्योगिकी के विकास का समाज के सामाजिक-आर्थिक ढांचे पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। अधिक स्वचालित प्रणाली अधिक लोगों को बार-बार किये जाने वाले कार्यों की नीरसता से मुक्त कर सकती है और उन्हें अधिक फुर्सत प्रदान कर सकती है। सार्वभौम मूल आय (युनिवर्सल बेसिक इनकम) और मशीनों पर कर लगाये जाने जैसे उपायों के लिए मौजूदा मौद्रिक प्रणाली से काफी भिन्न प्रणाली की आवश्यकता हो सकती है। सकारात्मक रूप से विचार करने पर फुर्सत के अधिक क्षण अधिकतर लोगों के लिए रचनात्मक कार्यों, नये ज्ञान की तलाश और ब्रह्मांड की हमारी समझ में वृद्धि की संभावना बना सकती है। दूसरी ओर, अधिक अवकाश से सुखवाद और अधिक स्वार्थपूर्ण लक्ष्यों के पीछे भागने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो सकती है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि मानवता सकारात्मक मार्ग पर आगे बढ़े, हमें सार्वभौमिक मूल्यों और विचारों की आवश्यकता होगी।

इन परिवर्तनों के दूरगामी भू-राजनीतिक निहितार्थ हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका की अर्थव्यवस्था पुनर्नवीकृत हो जाएगी जैसा कि हर 30-40 वर्षों में होता है; आखिरकार, वह प्रौद्योगिकीय विकास का प्रणेता है। फिर दूसरे देश भी बहुत पीछे नहीं हैं। इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने पिछले माह बताया कि क्वांटम कंप्युटिंग और क्वांटम क्रिप्टोग्राफी के क्षेत्र में पेटेंट के लंबित आवेदनों की सूची में चीन अग्रणी है, न कि संयुक्त राज्य अमेरिका। आर्थिक इतिहासकारों ने इस तथ्य की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया है कि विश्व इतिहास के दायरे में औद्योगीकृत तथा विकासशील देशों अथवा अमीर और गरीब देशों के बीच का अंतर अपेक्षाकृत हालिया ही है। यह सतत नहीं है और हाल के दशकों में इसमें परिवर्तन आ रहा है।

IV

प्रौद्योगिकी और इसके अनुप्रयोग इस मामले का एक पहलू है और मानव प्रतिक्रिया दूसरा पहलू है। सरपट भागने वाला नया विश्व पहले ही दर्शा चुका है कि विचार और कार्य की परंपरागत सीमाएं अब अलंघनीय नहीं है। साथ ही, यह स्पष्ट है कि नई तकनीकों और प्रौद्योगिकियों का प्रभाव सभी समाजों पर एक समान नहीं होगा क्योंकि वे विकास के अलग-अलग स्तर पर हैं और उनके पास समावेश की समान क्षमताएं नहीं हैं।

तब समाज और उनकी संरचनाएं इन तकनीकों और प्रौद्योगिकी के प्रति किस प्रकार का व्यवहार करते हैं?

यह स्पष्ट है कि ऐसे देश जिन्होंने अपनी आबादी को शिक्षित करने में निवेश किया है, ने मजबूत उपभोक्ता आधारित अर्थव्यवस्थाएं बनायी हैं, और जिनके पास ऐसी लोकतांत्रिक संस्थाएं है जो सामाजिक परिवर्तन के साथ सामंजस्य बिठा सकती है, लाभान्वित होंगे-क्योंकि ऐसे देशों के नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हो जाएंगी और वे यह समझ सकते हैं कि वे प्रोद्योगिकी के विकास का लाभ कैसे ले सकते हैं।

साथ ही, घरेलू सुधारों के अत्यधिक लाभ हो सकते हैं यदि ये वास्तविक रूप से सुधरे विश्व जिसका स्वरूप वैश्विक, ढांचागत और न्यायिक है, में ऐसी व्यवस्था जो किसी क्षेत्र या राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य और आवश्यकताओं से परे हैं, को अपनाया जाए। तभी देशों के कार्यों का सामंजस्य समान लक्ष्यों के साथ स्थापित होगा।

यह एक दूरस्थ क्षितिज है जिसकी ओर हमें अवश्य आगे बढ़ते रहना चाहिए। युवा शक्ति के रूप में आपके पास अपनी तथा व्यापक रूप से मानवता की भलाई के लिए ऐसा करने की इच्छा शक्ति और क्षमता है।

धन्यवाद।