25 मार्च, 2017 को चंडीगढ़ में पंजाब विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति मो. हामिद अंसारी द्वारा दिया गया भाषण

चंडीगढ़ | मार्च 25, 2017

हमारे युग का एक विश्वविद्यालय

मेरे लिए यह गौरव की बात है कि मैं इस विश्वविद्यालय का लगभग एक दशक से भी ज्यादा समय से कुलाधिपति हूं, जो अपने कार्य और अपने पूर्व छात्रों के लिए विख्यात है। मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने इस सूक्ति का पालन किया है कि एक कुलाधिपति को कभी-कभार दिखाई देना चाहिए और शायद ही सुना जाना चाहिए।

दीक्षांत समारोह का अवसर उन दुर्लभ अवसरों में से एक है जब मुझे मौका मिलता है कि मैं यहां पर निष्पादित होने वाले अच्छे काम के लिए कुलपति, अध्यापकवर्ग, कर्मचारीगण और छात्रों को बधाई दे सकूं।

मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि विश्वविद्यालय ने मानद डिग्रियां और रत्न सम्मान प्रदान करके कुछ व्यक्तियों की विलक्षण उपलब्धियों तथा सेवाओं का गुणगान करने का निर्णय किया है। मैं डा. मुरली मनोहर जोशी को डीलिट के लिए न्यायमूर्ति खेहर को डॉक्टरेट ऑफ लॉ के लिए, डा. एन.एस. कप्नी और प्रो. जी.एस. खुश को डॉक्टरेट ऑफ साइन्स के लिए बधाई देता हूं। मैं श्री अनुपम खेर को कला रत्न के लिए डा. दलीप कौर तिवाना को साहित्य रत्न के लिए और डा. पी.डी. गुप्ता को विज्ञान रत्न के लिए भी बधाई देता हूं।

दीक्षांत समारोह अकादमिक उपलब्धियों और उत्कृष्टता का पर्व मनाने के लिए विश्वविद्यालय समुदाय का समवेत होना है; इस अवसर को सार्वजनिक रूप से चिंतन के लिए इस अपेक्षा से प्रयोग किए जाने की प्रथा है कि दर्शक भी ऐसा ही करेंगे।

मैं इस अवसर पर हमारे समाज में विश्वविद्यालयों के महत्व पर और वह भूमिका निभाने के लिए विश्वविद्यालयों से अपेक्षाओं पर अपने कुछ विचार साझा करना चाहता हूं। विशेष रूप से मैं इनके बारे में बात करना चाहता हूं:

  • एक विश्वविद्यालय की संकल्पना और यह अन्य संस्थानों से किस प्रकार भिन्न होगा जहां पर अनुदेश दैनिक जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने पर ध्यान केन्द्रित करके प्रदान किए जाते हैं;
  • अपने सदस्यों को विचार करने, परीक्षा प्रयोजनों के लिए पढ़ाई करने के सामान्य पहलू से परे जाने की शिक्षा देने और प्रश्न पूछने की क्षमता और आदत हासिल करने की आवश्यकता;
  • शोध पर ध्यान केन्द्रित करने, समाज और अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी नया ज्ञान उत्पन्न करने की आवश्यकता;
  • तेजी से बदलते विश्व में सभी समुदायों की विविधता और जटिलता के मद्देनज़र विश्वविद्यालयों की सामाजिक शोध कार्य करने की आवश्यकता; और
  • अकादमिक स्वतंत्रता की अत्यंत आवश्यकता ताकि विचार प्रक्रिया एवं इसकी अभिव्यक्ति पर किसी प्रकार की कार्यालयी अथवा सामाजिक बाधा न हो।
II

मुझे एक धर्मद्रोही स्थिति प्रकट करके प्रारंभ करने दें: क्या हमें अभी भी विश्वविद्यालयों की आवश्यकता है?

व्यापार मनोविज्ञान के एक प्रोफेसर ने कहीं किसी विश्वविद्यालय में यह तर्क दिया है कि 'उच्च शिक्षा श्रेष्ठतम रूप में असंगत है और निकृष्टतम रूप में आत्मघातक क्योंकि छात्र अपनी करियर संबंधी संभावनाओं में वृद्धि करने के लिए अपना नाम लिखवाते हैं परंतु आखिर में वे बेरोजगार या रोजगार के लिए अयोग्य निकलते हैं, जैसा कि वे महाविद्यालय पूर्व जीवन में थे।' वह यह भी तर्क देते हैं कि विश्वविद्यालयों को ठीक करने का एकमात्र तरीका मांग (छात्र क्या चाहते हैं और नियोजक की क्या आवश्यकता है) को आपूर्ति के साथ (विश्वविद्यालय क्या पेश करते हैं) मिलाना है।

विमर्श की यह धारा, जो कि एक संकीर्ण अर्थ में आवश्यक रूप से उपयोगितावादी है, हमारे समय में अनोखी बात नहीं है। और इस सबके बावजूद, समस्त मानवीय कार्यकलाप को इसके केवल उपयोगितावादी आयाम तक सीमित कर देना मानव मस्तिष्क और आत्मा के प्रयास जिसने सदियों से मानव प्रगति को चिन्ह्ति किया है, को खारिज करना है।

भिन्न-भिन्न कालों के दौरान सभ्यताओं ने विश्वविद्यालयों को जन्म दिया है। चौथी सदी ईसा पूर्व में एथेंस में प्लेटो का एकेडीमिया और अरस्तू का लायसियम, 5वीं सदी ईसवी में भारत में नालंदा, 952 में मिस्र में अल अज़हर तथा 1088 में इटली में बोलोग्ना भिन्न-भिन्न अर्थों में आधुनिक विश्वविद्यालयों के अग्रदूत थे।

कार्डिनल न्यूमैन ने 1852 में विश्वविद्यालय को 'एक ज्ञानपीठ, विश्व के लिए प्रकाश, आस्था का मंत्री, उदीयमान पीढ़ी की मातृ संस्था कहा। यह ऐसा है और इससे कहीं ज्यादा है।'

उन्होंने यह भी कहा है कि, 'विश्वविद्यालयी प्रशिक्षण का उद्देश्य समाज के बौद्धिक स्तर को ऊंचा करना, जनता के मस्तिष्क में नए विचार विकसित करना, राष्ट्रीय रूचि में शुद्धता लाना, लोक सम्मत उत्साह को सच्चे सिद्धांतों और लोक सम्मत इच्छाओं को सुनिश्चित लक्ष्यों की आपूर्ति करना, युग के विचारों को अभिवृद्ध करना और उनमें गांभीर्य लाना, राजनैतिक शक्तियों के प्रयोग को सुकर बनाना तथा निजी जिंदगी के मेलमिलाप को परिष्कृत करना है।'

हमारे समय में, विश्वविद्यालय न केवल वैज्ञानिक एवं आर्थिक परिवर्तन के उत्प्रेरक हैं अपितु अवसरों की बराबरी एवं लोगों के लिए समान अवसर मुमकिन बनाकर समाज का लोकतंत्रीकरण करना भी है-जो न केवल आर्थिक विकास में बल्कि सामाजिक समता अथवा, कम-से-कम, असमानता को कम करने में सहयोग देते हैं। कुछ वर्ष पूर्व कोपेनहेगन बिजनेस स्कूल के प्रेसिडेंट पर हॉल्टन-एंडरसन ने इसका संक्षेपण किया जिन्होंने किसी विश्वविद्यालय के चार शास्त्रीय और एक आधुनिक कार्य अभिनिर्धारित किया।

  • मानवता के ज्ञान के भंडार के रूप में कार्य करना;
  • शोध द्वारा नए ज्ञान की उत्पत्ति करना; research;
  • शिक्षा द्वारा अगली पीढ़ी को ज्ञानांतरण करना;education;
  • प्रसार द्वारा समाज को ज्ञानांतरण करना; और
  • विकास और आर्थिक उन्नति करना।

मैं स्वीकार करता हूं कि अंतिम बिंदु ने आज अत्यधिक महत्व प्राप्त कर लिया है परंतु इसकी प्रभावकारिता नया ज्ञान उत्पन्न करने वाले संस्थानों से गहराई से जुड़ी है और उस पर निर्भर है।1

III

आज विश्वविद्यालयी अनुसंधान को उत्पादों और सेवाओं में उपयोग किए जाने के बारे में काफी आवाजें उठ रही हैं एवं इसकी जरूरत भी है। हालांकि आनुप्रयोगिक अनुसंधान के विरूद्ध कोई तर्क विद्यमान नहीं है; और ऐसे अनुसंधान के व्यावसायीकरण की आवश्यकता के लिए, हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि हमारे समक्ष विद्यमान अनेक चुनौतियों के रूप-विस्थापन और उनके विघटनकारी अभिसरण नवप्रवर्तन की आवश्यकता है। आखिरकार, संक्षेप में केवल यह कहा जा सकता है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। लंबे समय से आविष्कार की जननी आवश्यकता - केवल इस रूप में परिवर्तन नहीं ला रही है कि क्या संभव है, अपितु वहां भी जिसे हम अत्यावश्यक मानते हैं। हमें यह पहचानने की आवश्यकता है कि 'जोखिम, नुकसान और विफलता सभी इस प्रक्रिया के आवश्यक भाग हैं'। हितकारी विज्ञान, अच्छी कला की तरह रचनात्मक उद्यम है।2

आजकल की चिंताएं प्राय: अदूरदर्शी अथवा अल्पकालिक हैं जो कल के लिए न्यून विचारणा ही प्रस्तुत करती हैं। इतिहास सर्वाधिक ज्ञानप्रद तब होता है जब वह लोगों द्वारा की गई गलत अपेक्षाओं के पूर्ण बोध के साथ लिखा गया हो। यहां तक कि तकनीकी के क्षेत्र में, भविष्य संबंधी विकास जो केवल कुछ ही वर्ष दूर हैं, वे समसामयिक दृष्टि से छिपे हुए हैं। अनेक, सम्भावित रूप से अधिकांश, अन्य लक्ष्यों के साथ अनपेक्षित रूप से अनुसंधानों से उपजे हैं और तकनीकी संभावना के मूल्यांकन सदा ही लक्ष्य से चूके हैं। इस प्रकार विश्वविद्यालय की एक भूमिका 'अप्रत्याशित भविष्य की संभावित आवश्यकता के अनुरूप ज्ञान तैयार करना' भी है। 3

किसी विश्वविद्यालय को मात्र बहुकला संबंधी विश्वविद्यालय से बढ़कर होना ही चाहिए। विश्वविद्यालयी शिक्षा और बौद्धिक समृद्धि को केवल रोज़गार प्राप्ति के मार्ग के रूप में या केवल उसी अर्थ में नहीं लेना चाहिए। यहां तक कि प्रत्यक्ष व्यावसायिक संयोजनों की विधाओं में, विश्वविद्यालय का प्रथम लक्ष्य उस विधा की गहरी समझ विकसित करना होना चाहिए। उदाहरण के लिए एक विश्वविद्यालयी विधि शिक्षा का प्रथम लक्ष्य ऐसे स्नातकों का निर्माण होना चाहिए जिनमें वास्तव में वकील बनने के बजाय कानून की गहरी समझ हो।4

IV

विश्वविद्यालय का बौद्धिक महत्व के विषयों की शिक्षा प्रदान करने और उन विषयों पर शोध करने का दोहरा दायित्व होता है। इन दोनों कार्यों को एक-दूसरे से बल मिलता है। आजकल, विशुद्ध और सामाजिक विज्ञान के बजाए प्रौद्योगिकीय शोध की धुन है। वर्तमान आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सामाजिक शोध के महत्व और लाभ के संबंध में अक्सर सवाल उठाये जाते हैं।

समकालीन सामाजिक गवेषणा की प्रासंगिकता स्थापित करना जटिल और बहुआयामी है। विशेषत: ऐसे समाज, जो हमारी तरह संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं, के लिए इसका सर्वाधिक महत्व है। इससे अन्तरजातीय संबंधों, अल्पसंख्यकों का संरक्षण, राष्ट्र-निर्माण और सुशासन जैसे अस्तित्व संबंधी मुद्दों समेत संक्रमण के दौर से गुजर रहे समाज की राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक आर्थिक विकास के लिए जरूरी क्षेत्रों में चुनौतियों का समाधान करने और संभव समाधान की पहचान करने में मदद मिलती है।

राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की गति और दिशा की गवेषणा करने वाला सामाजिक अनुसंधान ऐसी प्रक्रियाओं की हमारी समझ को बढ़ाता है और असंतोष तथा क्षोभ के क्षेत्रों की पहचान करने में मदद कर सकता है जिससे इनके सामाजिक समरसता में बाधक होने से पूर्व इनका समाधान किए जाने का अवसर प्राप्त होता है।

सामाजिक अनुसंधान की अन्य महत्वपूर्ण भूमिका 'सामाजिक और सांस्कृतिक पौराणिक कथाओं' जो किसी समाज में परिचालित होते हैं और प्रचुर मात्रा में हैं, पर विशेषकर परिवर्तन और अनिश्चितता के दौरान प्रश्न करना और विखंडन करना है। विशेषत: पिछले 25 वर्षों के दौरान भारत में तेजी से संक्रमण की अवधि ऐसी पौराणिक कथाओं, जो अक्सर उदार मूल्यों और लोकतंत्र की कवायद के लिए हानिकारक होती हैं, के लिए उर्वर वातावरण प्रदान करती है। यहां, 'बौद्धिक मानदंड में मजबूत आधार, सामाजिक घटनाओं के प्रति उनके समालोचनात्मक दृष्टिकोण और उनके द्वारा अपनाए गये परिष्कृत विश्लेषणात्मक तरीकों के साथ सामाजिक विज्ञान समुचित प्रतिकार हो सकते हैं।5

V

उच्चतर शिक्षा का महत्वपूर्ण लक्ष्य यह होता है कि लोगों में इस बात की जानकारी हो सके कि प्रश्न किस प्रकार पूछा जाना चाहिए तथा उनमें तर्कपूर्ण बहस की क्षमता विकसित हो सके। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसी बात का संकेत दिया था जब उन्होंने गाया

जहां मन भयमुक्त है ---- जहां ज्ञान स्वच्छद है ----- जहां शब्द सत्य की गहराई से निकलते हैं -----

असहमति और प्रदर्शन करने का अधिकार हमारे संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार में अन्तर्निहित है जो बहुलतावादी दृष्टिकोण प्रदान करता है तथा देश को सांप्रदायिक, वैचारिक और धार्मिक संकीर्णता के संदर्भ में परिभाषित करने से इन्कार करता है। इस रूपरेखा में 'राष्ट्र हित' से आशय संवैधानिक शासन का होना है। डा. अम्बेडकर के मन में यही बात थी जब उन्होंने कहा कि

"संवैधानिक नैतिकता को ही सरकार का पथप्रदर्शक होना चाहिए, न कि संकीर्ण विचारों और पौराणिक चरित्रों की मनमानी स्तुति को आधार बनाया जाना चाहिए।" 6

यह अम्बेडकर से 100 वर्ष पूर्व कार्डिनल न्यूमैन द्वारा विश्वविद्यालय की भूमिका के संबंध में की गयी परिकल्पना से मिलता-जुलता है कि 'विश्वविद्यालय की अवधारणा किसी सत्ता की अधीनता के बिना निर्धारित होनी चाहिए और मानवीय बुद्धिमता पर आधारित होना चाहिए'। इसमें ज्ञान के प्रसार और विस्तार का स्थान होना चाहिए।

बौद्धिक असहमति में मत भिन्नताओं को स्पष्ट करने और प्रतिस्पर्धी धारणाओं की व्याख्या करने की शक्ति होती है। यह हममें से प्रत्येक को हमारी सोच की शक्तियों और कमजोरियों को पहचानने योग्य बनाता है। सशक्त बौद्धिक कार्यों को ऐसे ही वातावरण में अंजाम दिया जा सकता है जहां विद्वान जोखिम उठाने, परंपराओं को चुनौती देने और लोगों के विचार बदलने में स्वतंत्रता महसूस करता हो। विश्वविद्यालय को ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए जो बौद्धिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देता हो। विश्वविद्यालय को गैर-कानूनी व्यवहार या हिंसा के मामलों को छोड़कर किसी विशेष पद को पाने या त्यागने के लिए संकाय सदस्यों या छात्रों की आवाज दबाने या उन्हें प्रभावित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। वस्तुत: विश्वविद्यालयों को अपनी शैक्षणिक निष्ठा और स्वतंत्रता की रक्षा करने हेतु सभी आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए।7

शैक्षणिक स्वतंत्रता ज्ञान का पता लगाने, विकास करने और प्रसार करने संबंधी विश्वविद्यालय के मिशन की नींव है। ऐसे वातावरण जो स्वतंत्र और विचारपूर्ण बहस को प्रश्रय देता है, में विभिन्न विचारों की समीक्षा कर ऐसा किया जाना चाहिए। चाहे कोई विचार स्वीकृत यथास्थिति के लिए कितना भी असहज या क्षोभजनक हो, इसे इसके मूल्य के आधार पर चुनौती दी जा सकती है या दी जानी चाहिए, परिवर्तित की जा सकती है या की जानी चाहिए और त्याग दिया जाना चाहिए परंतु इसे कभी चुप नहीं कराया जाना चाहिए या दबाया नहीं जाना चाहिए।

विश्वविद्यालय का यह दायित्व है कि वह अपने कर्तव्यपालन में विरोध और धमकी की चिंता किए बिना और दूसरे की नाराजगी की परवाह किए बिना अपने विचार रखे। ऐसा नहीं करना तार्किक गवेषणा के पथ से भटकना और कुपरिभाषित पुरातन पंथ जो ज्ञान की हमारी खोज को प्रभावित करता है, को अपनाकर विश्व के संबंध में जानने की अपनी उत्सुकता को कम करना है।

शैक्षणिक स्वतंत्रता के लिए असहमति और समालोचना के लिए दृढ़ सहिष्णुता का होना अपनी धारणाओं को चुनौती दिए जाने को स्वीकार करने की इच्छा रखना तथा नये विचारों जो अप्रिय साबित हो सकते है, के प्रति खुली सोच का होना आवश्यक है। इस सहिष्णुता में हमेशा दूसरे की अच्छाइयों और तर्कों की विवेचना करने की क्षमता होती है, अत: इसे सतर्कतापूर्वक बार-बार बचा कर रखने की आवश्यकता है।

आज हमें इन प्रतिबद्धताओं पर पुन: विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि हम पुन: ऐसे वातावरण में है जो शैक्षणिक स्वतंत्रता के मूल्य और दायरे पर सवाल करता है। हमारे देश की हाल की घटनाओं ने यह दर्शाया है कि विश्वविद्यालय को क्या होना चाहिए या क्या नहीं होना चाहिए, के संबंध में बहुत अधिक भ्रांति है। हमारे विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता को संकीर्ण विचारों द्वारा चुनौती दी गयी है जिन्हें 'लोक हित' में समझा जा रहा है।

VI

बौद्धिक विषयों के प्रति व्याप्त अविश्वास के दौर में स्वतंत्र संख्या, ज्ञान के स्वतंत्र भंडार, उदार मूल्यों जो लोगों को सामाजिक गतिशीलता और समानता के अवसर प्रदान करते हैं, के नवीकरण के स्रोतों के रूप में विश्वविद्यालयों की अनिवार्य रूप से रक्षा किए जाने की जरूरत है। हमें यह स्मरण करते हुए कि हमारे सर्वोत्तम विश्वविद्यालय राष्ट्र के रूप में हमारे सर्वोत्तम सपनों को साकार करने में मदद करते हैं" स्वयं को व्यवहारवादी उदार शिक्षा की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के तौर पर याद रखने की आवश्यकता है।8

नवम्बर, 2005 में एक प्रख्यात वैज्ञानिक ने विश्व को खतरनाक समय जो बाह्य संसार की वास्तविकताओं में निहित हैं और उन्होंने स्वतंत्र, खुले, पूर्वाग्रह रहित, अबांधित प्रश्न और गवेषणा जिन पर पाश्चात्य और पूरब के उपद्रवी कट्टरवाद के गंभीर खतरे मौजूद हैं, के बजाय कट्टरवादी सोच के अंधकार को अपनाकर जटिलता और कठिनता की ओर लौटने के विरुद्ध भी चेताया।9

यह कथन सार्वभौमिक के रूप में वैध है।

देश के अग्रणी संस्थानों में से एक संस्थान के रूप में पंजाब विश्वविद्यालय को प्रतिभा के तटस्थ रूप से एकत्र करने, विचारों के बेमिसाल कारखाने जहां नवयुवकों के आवेग, सृजनात्मकता और आदर्शवाद का उपयोग हमारे समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था की परिवर्तनशील जरूरतों को पूरा करने में किया जा सकता है, में अपनी भूमिका अदा करनी है।

इस विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के रूप में, मैं इस दिशा में उद्देश्यपूर्ण तरीके से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता हूं।
जय हिन्द


1Boulton, G. Vice-Principal of the University of Edinburgh, talk given at the European University Association convention held in Prague , March 2009
2Gertler, Meric S. ‘Role of Universities in the 21st Century’ – 9th Annual Meeting of the Science and Technology in Society Forum, October 8, 2012.
3Boulton, op cit
4Pettigrew, Todd. ‘What is a university?’, Macleans , March 17, 2011
5Zedania, G. ‘Social sciences hold up a mirror to society’, How social sciences can contribute to changing a society, Academic Swiss Caucasus Net (ASCN), October 2012, p. 13
6Ambedkar, B.R. ‘Speech on 25 November 1949’ in The Constitution and Constituent Assembly Debates, p. 174
7Boyer, John W. ‘Academic Freedom and the Modern University; The Experience of the University of Chicago’, The College of the University of Chicago , 2016, p. 1-5
8Roth, Michael. ’What Is a University For?’, The Wall Street Journal, March 4, 2016
9May, Pofessor Robert M. ‘Threats to Tomorrow’s World’ – Address of the President, The Royal Society, London, given at the Anniversary Meeting, November 30, 2005