25 अप्रैल, 2018 को देहरादून, उत्तराखंड में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी के दीक्षांत समारोह 2018 के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

देहरादून, उत्तराखंड | अप्रैल 25, 2018

"मैं आज भारतीय वन सेवा अधिकारियों के 2016 बैच के दीक्षांत समारोह में आपके बीच आकर अत्यधिक हर्ष की अनुभूति कर रहा हूँ। मुझे यह भी खुशी है कि हमारे पड़ोसी देश भूटान के दो प्रशिक्षु अधिकारी भी आज उतीर्ण होने पर यहां से जा रहे हैं। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इन विदेशी प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षित करने में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी का योगदान दोनों देशों के बीच संबंधों को और प्रगाढ़ करेगा और वन्य जीव संबंधी अपराधों, जो प्राय: सीमा पार अपराध होते हैं, का मुकाबला करने में संयुक्त सहयोग को बढ़ावा देगा।

आप ऐसे निर्णायक दौर में वन सेवा में प्रवेश कर रहे हैं, जब भारत दुनिया में एक महत्वपूर्ण और यथोचित स्थान प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है।

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। यह अब पहले की अपेक्षा पर्यावरण पर अधिक ध्यान दे रहा है।

यद्यपि, 1980 से पूर्व प्रत्येक वर्ष लगभग 150,000 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वानिकी गतिविधियों में परिवर्तित किया जा रहा था, परंतु यह प्रशंसनीय है कि 1980 के बाद परिवर्तन की यह दर घटकर 15,500 हेक्टेयर प्रति वर्ष रह गई है।

वनाच्छादित क्षेत्र के मामले में, भारत ने गत दशकों के दौरान वैश्विक स्तर पर वन क्षेत्र की घटती हुई प्रवृत्ति की तुलना में वृद्धि की प्रवृत्ति दर्शाई है। भारत सरकार की वन रिपोर्ट, 2017 के अनुसार, भारत का वन और वृक्ष आच्छादन के अधीन 24.4 प्रतिशत भूमि के साथ विश्व में दसवां स्थान है।

यह उत्साहजनक है कि भारत को वन क्षेत्र में सर्वाधिक वार्षिक निवल वृद्धि दर्शाने वाले शीर्ष दस देशों की सूची में आठवें स्थान पर रखा गया है। वर्ष 2015-17 के दौरान कुल वन और पेड़ क्षेत्र में 8,021 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है।

आपके पास भारतीय वन सेवा के अधिकारियों के तौर पर कुल भू-क्षेत्र के एक तिहाई क्षेत्र तक वन क्षेत्र को बढ़ाने, जैसा कि काफी पहले राष्ट्रीय वन नीति, 1952 में अभिकल्पना की गई थी, की आदर्श स्थिति तक पहुंचने का प्रयास करने और वहां तक पहुंचने का महान अवसर है।

आप सभी जानते हैं कि हम वैश्विक स्तर पर अपनी मानव विकास रैंकिंग को बढ़ाने के लिए तेजी से कदम उठा रहे हैं। इसके लिए त्वरित विकास कार्यकलापों की आवश्यकता है। हालांकि, लाखों गरीब लोगों को सहायता प्रदान करने वाले हमारे प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने के लिए उन विकास कार्यकलापों में अंतर्निहित सुरक्षित परिवेश बनाए जाने की आवश्यकता है।

वर्तमान संदर्भ में, भारतीय वन सेवा अधिकारियों के तौर पर, आपको देश की परिस्थितिकीय सुरक्षा का संरक्षण करने हेतु विकास कार्यों के विनियमन में मजिस्ट्रेट की भूमिका निभानी होगी।

हमारी सभ्यता का अनूठा पहलू यह है कि भारतीय संस्कृति ने प्राचीन काल से प्रकृति की महिमा का गुणगान किया है और मनुष्य, पशु और पौधों के जीवन के सह-अस्तित्व पर जोर दिया है। मनुष्य, पशु और पौधों के जीवन का यह प्राकृतिक संबंध हमारे धार्मिक ग्रंथों में, हमारे समृद्ध साहित्य और प्राचीन दर्शन में दर्शाया गया है।

इस धरती से विकसित होने वाले विश्व के कुछ महान धर्मों में अहिंसा का प्रचार किया था और पशुओं को भी इस सिद्धांत के दायरे में शामिल किया था। हमारी संस्कृति के ऐसे उत्कृष्ट तत्वों ने भारतीय सभ्यता को सार्वभौमिक मूल्यों और शाश्वत आदर्शों का निक्षेपागार बना दिया है।

मानव और वन का सहजीवी संबंध देशवासियों के धार्मिक और सामाजिक-सांस्कृतिक मन-मस्तिष्क में गहराई से अंत:स्थापित है और प्राचीन काल से ही इस पर बल दिया गया है, परंतु प्राकृतिक संसाधनों की बढ़ती हुई मांग के कारण हाल के दिनों में इसमें व्यवधान उत्पन्न हुआ है।

भारतीय संस्कृति में परम्परागत तौर पर पेड़ों को दिव्यता के पवित्र प्रतीकों के रूप में सम्मान प्रदान किया गया है। पीपल, जिसे 'फिकस रिलिओसिया' कहा जाता है, जैसे पेड़ों को काटना पाप माना जाता था।

वस्तुत: भगवान कृष्ण स्वयं को अश्वत्थ, अथवा सभी पेड़ों में पीपल का पेड़, के रूप में बताया है।

हाल ही में, वन संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए कई आंदोलन हुए, जैसे कि 'चिपको' आन्दोलन, जो उत्तराखंड क्षेत्र में 1973 में आरंभ हुआ और इसकी अगुवाई गौरा देवी, सुदेश देवी, बचनी देवी, चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा ने की।

इस संदर्भ में, मैं हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा कही गई बात को स्मरण करना चाहता हूँ, जो अनवरत हमें याद दिलाती है कि वनों को नष्ट करना खुद को नष्ट करना है। उन्होंने कहा था :

"हम विश्व के वनों के साथ जो कर रहे हैं, वह स्वयं और एक-दूसरे के साथ किए जा रहे व्यवहार का दर्पण प्रतिबिंब है।"

इसलिए, विश्व भर में अब इस बात को मान्यता प्रदान की गई है कि वन प्रबंधन का मौलिक सिद्धांत इसकी उत्पादकता और पारिस्थितिकीय कार्यों को प्रभवित किए बिना प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और दीर्घकालिक उपयोग पर आधारित होना चाहिए।

यहीं पर आज उतीर्ण होकर जाने वाले वन अधिकारियों की सबसे युवा पीढ़ी के रूप में आपके पास एक तरफ लोगों की वन आवश्यकताओं को पूरा करने और दूसरी तरफ वन क्षेत्र को बढ़ाने का विशिष्ट अवसर और उत्तरदायित्व है।

पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास एक साथ होना चाहिए।

वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण जन आन्दोलन बनना चाहिए।

बहनों और भाईयों,

मुझे बताया गया है कि भारत में वैज्ञानिक वन प्रबंधन एक शताब्दी से भी अधिक पुराना है।

वनों के संरक्षण के प्रयोजनार्थ लोगों को वनों से दूर रखने हेतु प्रबंधन रणनीतियों मंन परिवर्तन से लेकर संयुक्त वन प्रबंधन के तौर पर लोगों के सहयोग से वन प्रबंधन तक हमने एक लंबा सफर तय किया है।

इसलिए एक वन अधिकारी के तौर पर आपका प्रबंधन दृष्टिकोण राष्ट्रीय हितों और लोगों, विशेष तौर पर अपनी आजीविका के लिए वनों पर निर्भर रहने वाले जनजातीय समूहों के हितों से समझौता किए बिना विकास सहायक और संवृद्धि समर्थकारी के जैसा होना चाहिए।

अतिचारण, स्थानान्तरण कृषि और आग लगने के परिणामस्वरूप कई प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं। हमें हासिल वनों के पुनर्वास के लिए स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर कार्य करने और किसानों को परिस्थितिकीय तौर पर चिरस्थायी प्रक्रियाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। यह आसान कार्य नहीं है और यह सही संतुलन बनाने के लिए सर्वोत्तम दिमाग और दिल की आवश्यकता है।

मुझे विश्वास है कि आपके द्वारा दो वर्ष के व्यावसायिक प्रशिक्षण, ज्ञान और अपने क्षेत्रीय अनुभवों में आत्मसात् कौशल आपके लिए चुनौतीपूर्ण कार्य को पूरा करने में सहायक होगा।

इस अवसर पर, मैं कर्णाटक वन विभाग के बहादुर आई. एफ. एस. अधिकारी स्वर्गीय मणिकनंदन के अभी हाल ही में 3 मार्च, 2018 जो विश्व वन्यजीव दिवस है को अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए दिए गए सर्वोच्च बलिदान का स्मरण करता हूँ। कई अन्य ऐसे भारतीय वन सेवा के अधिकारी और वन विभाग के कर्मचारी हैं, जिन्होंने वन संसाधनों के संरक्षण हेतु अपने जोखिम भरे कर्तव्य का निर्वहन करते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया है। निस्सन्देह, देश उन्हें हमेशा याद रखेगा।

हमारे देश में मानव-पशु का संघर्ष बढ़ रहा है और यह जंगलों के आस-पास रहने वाले गरीब लोगों के लिए चिंता का कारण है। आपको लोगों के जीवन और संपत्ति तथा पशुओं के जीवन की सुरक्षा हेतु इस संघर्ष को दूर करने के लिए अभिनव समाधान तैयार करने का प्रयास करना चाहिए।

बहनों और भाईयों,

मैं जानता हूँ कि वन सेवा एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण सेवा है और आपको जंगली जानवरों और दुर्दांत ताकतों तथा वन उत्पादों को लूटने का प्रयास करने वाले अनैतिक तस्करों के साथ हर रोज जंगल के कठिन भू-भागों में कार्य करते हुए जीवन के लिए खतरा पैदा करने वाली परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

आप हमारे सामूहिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए हमारी समृद्ध प्राकृतिक विरासत को बचाए रखने के लिए प्रतिबद्ध 'ग्रीन सोल्जर' की एक सेना है। मैं इस पेशे के साथ जुड़ी कठिनाईयों को जानने के बावजूद, इस मुश्किल और प्रतिष्ठित पेशे को चुनने के लिए आपके साहस और जुनून से वास्तव में प्रभावित हूँ।

आपके सामने एक बहुत ही मुश्किल कार्य है, एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण और नाजुक संतुलन स्थापित करने का कार्य।

आपको विकास को बढ़ावा देना है, इसे बाधित नहीं करना।

इसके साथ ही, आपको यह सुनिश्चित करना है कि प्राकृतिक संसाधनों और जैव-विविधता का संरक्षण हो।

आपको कठिन निर्णय लेने होंगे क्योंकि आपको लोगों और इस ग्रह के बारे में एक एकीकृत पारिस्थितिकी प्रणाली के तौर पर सोचना होगा। निस्सन्देह, आपके पास वैज्ञानिक और चिरकालिक तरीके से वानिकी के प्रबंधन हेतु अद्यतन ज्ञान प्राप्त करने के कई अवसर होंगे।

आप पर्यावरण के संरक्षण और सुधार के साथ लोगों की आर्थिक जरूरतों को समझने में अपने कौशलों को बढ़ाने में भी सक्षम होंगे।

भारत में हम कहते हैं - "धर्मो रक्षति रक्षित:" (यदि आप धर्म की रक्षा करते हैं, तो धर्म आपकी रक्षा करेगा)।

इसी प्रकार वन और वृक्ष आवरण के बारे में भी एक कहावत है, जिसमें कहा गया है "वृक्षो रक्षति रक्षित:" (यदि आप धर्म की रक्षा करते है, तो धर्म आपकी रक्षा करेगा)।

इसी प्रकार वन और वृक्ष आवरण के बारे में भी एक कहावत है, जिसमें कहा गया है "वृक्षो रक्षति रक्षित:" (यदि आप पेड़ों की रक्षा करते हैं, तो वे आपकी रक्षा करेंगे)।

प्रकृति और मानव के बीच इस सहजीवी संबंध को ध्यान में रखते हुए सरकार ने कृषि-वानिकी प्रारंभ करने और किसानों को वानिकी के माध्यम से अपनी आय बढ़ाने के लिए सहायता प्रदान करने हेतु योजनाएं बनाई हैं। आज आप वन क्षेत्र के प्रबंधन हेतु तकनीकी प्रबंधकीय और प्रशासनिक कौशल प्राप्त करने के बाद इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी में उतीर्ण होकर जा रहे हैं।

आपके प्रशिक्षण के दौरान आपने जो ज्ञान और कौशल हासिल किया है, वह एक संतोषजनक व्यावसायिक करियर प्रारंभ करते समय आपके लिए एक सुदृढ़ नींव होना चाहिए।

आपको सतत् तौर पर सीखना होगा और ज्ञान अर्जन तथा उसे अद्यतन करते हुए व्यावसायिक तौर पर स्वयं का विकास करना होगा क्योंकि सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती।

ज्ञान और पेशेवर उत्कृष्टता के साथ कृपया नैतिक आचरण का हमेशा पालन करें।

मजबूत नैतिक झुकाव आपके द्वारा किए गए कार्यों को अधिक विश्वसनीयता और सम्मान प्रदान करता है।

मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

मुझे यकीन है कि आप अपने करियर को यथा संभव श्रेष्ठतम आकार देंगे, प्रकृति 'मां' और उसके बच्चों की सेवा इस तरह करेंगे कि लोग फलें-फूलें और ग्रह का पुनरुत्थान होता रहे।

मैं एक बार पुन: 2016 बैच के सभी प्रशिक्षु अधिकारियों और भूटान के प्रशिक्षुओं को शुभकामनाएं देता हूँ और विशेष तौर पर उन प्रशिक्षुओं की सराहना करता हूँ जिन्होंने अपनी योग्यता और उपलब्धि के लिए पुरस्कार प्राप्त किए हैं। वास्तव में यह आपकी कड़ी मेहनत का सम्मान है।

मैं राष्ट्र की सेवा हेतु श्रेष्ठ अधिकारियों के एक और समूह को प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए डा. शशि कुमार और संकाय सदस्यों को भी बधाई देता हूँ। मैं आपको आपके करियर में और इस महान देश की वन संपदा को संरक्षित और विकसित करने के आपके प्रयास में आपकी सफलता की कामना करता हूँ।

जय हिन्द!"