21 फरवरी, 2017 को यूनिवर्सिटी ऑफ रवांडा, किगाली में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी द्वारा दिया गया भाषण

किगाली, रवांडा | फ़रवरी 21, 2017

रवांडा, भारत और अफ्रीका: सहयोग की अनिवार्यता

मैं इस मोहक भूमि पर आकर और युवाओं के साथ वार्तालाप का अवसर मिलने पर बहुत प्रसन्न हूं। ये युवा अपने तरीकों से विश्व को भावी आकार देंगे।

मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि आपकी पीढ़ी में विगत की गलतियों और सीमाओं से बचने का विवेक होगा और आप हमारे विश्व को इस प्रकार आगे ले जाएंगे जिसमें कार्य का सिद्धांत प्रतिद्वंदिता न होकर सहयोग का होगा और उसका ध्येय अपने लालच की पूर्ति करने के स्थान पर एक-दूसरे को लाभ पहुंचाना होगा।

मैं और मेरा प्रतिनिधिमंडल आपके लिए भारत के 1.3 बिलियन लोगों और 328 मिलियन युवाओं की शुभकामनाएं लेकर आया है जो विश्व में सबसे अधिक संख्या में हैं। हमारी जनसंख्या का 28 प्रतिशत हिस्सा युवा है जो विश्व के सभी युवाओं की तरह एक बेहतर विश्व के निर्माण के लिए उत्सुक है।

पिछले महीने हमें वाइब्रेंट गुजरात समारोह के अवसर पर महामहिम प्रेज़िडेंट पॉल कगामे का विशेष अतिथि के रूप में स्वागत करने का अवसर मिला। यह हमारे द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने की ओर एक और कदम था।

मैं प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहे चहुंमुखी विकास और प्रगति के लिए आपको बधाई देता हूं। मेरा मानना है कि यह नेतृत्व की दूरदर्शिता और विलक्षण दृष्टिकोण तथा लोगों के कठिन परिश्रम के कारण संभव हुआ है।

हम भारत को विकास के क्रम में रवांडा का सशक्त सहयोगी मानते हैं। हम सौर विद्युतीकरण, खाद्य प्रसंस्करण, कौशल विकास और पनविद्युत परियोजनाओं जैसे क्षेत्रों में पहले से ही सहयोग कर रहे हैं।

प्रेज़िडेंट कगामे के हाल ही के दौरे के दौरान एक सड़क परियोजना के लिए 80 मिलियन डॉलर मूल्य की एक नई क्रेडिट लाइन के लिए समझौता हुआ है। हम विभिन्न तकनीकी सहयोग और सांस्कृतिक सहयोग कार्यक्रमों के तहत रवांडा के नागरिकों और रक्षा कार्मिकों के प्रशिक्षण के लिए अध्येतावृत्तियों को जारी रखने और उनमें वृद्धि करने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं।

पिछले पांच वर्षों में हमारा द्विपक्षीय व्यापार दोगुना हो गया है, लेकिन 106 मिलियन अमरीकी डॉलर के साथ यह सामान्य बना हुआ है जो कि संभावना से बहुत कम है। रवांडा की अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत है और कारोबार करने की सुगमता की दृष्टि से उसकी रेटिंग बहुत उच्च है, जिसमें निवेशकों को अनेक प्रोत्साहन दिए जाते हैं। हम रवांडा की इस सशक्त इच्छा में भागीदार हैं कि हमारे लोगों को प्रगति और समृद्धि के लिए स्थायी लोकतांत्रिक शासन और अवसर प्रदान किये जाएं।

कल मुझे प्रधानमंत्री मुरकेज़ी के साथ संयुक्त रूप से रवांडा-इंडिया बिज़नेस फोरम का उद्घाटन करने का अवसर मिला जो दोनों देशों के व्यापार सहयोगियों को साथ लाएगा। हमनें एक प्रदर्शनी का उद्घाटन भी किया जिसमें भारतीय उद्योगजगत के कुछ अत्योपयोगी तथा कम खर्चीले नवाचारों को प्रदर्शित किया गया जिनका यहां पर उपयोग किया जा सकता है।

हमारी ओर से, हम भारतीय कंपनियों को रवांडा में उपलब्ध अवसरों का लाभ उठाने के लिए और भी साहसी और कल्पनाशील बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

II

भारत-अफ्रीका संबंधों में यह उन्नति एक ऐसे समय में हो रही है जब विश्व भारत की प्रगति की कहानी को स्वीकार कर रहा है। पिछले 25 वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था की तीव्र प्रगति ने, न केवल भारत को अपने विकासात्मक प्रयासों को आगे बढ़ाने, बल्कि विश्वभर, और विशेषकर अफ्रीका में हमारे सहयोगियों को उनके विकासपरक प्रयासों के लिए सहयोग देने के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराए हैं।

यह एक ऐसे समय में हो रहा है जब अफ्रीका अपनी वंचित और लाचार छवि से मुक्ति पा रहा है और अपने संसाधनों और किस्मत का नियंत्रण स्वयं अपने हाथ में ले रहा है और इस महान महाद्वीप में प्रगति, शांति और भागीदारी की हवा बह रही है। इस नये जगे विश्वास और विकास के प्रति उत्साह का सर्वोत्तम प्रदर्शन स्वयं आपके देश ने किया है जिसके आर्थिक निष्पादन को अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 'उल्लेखनीय' बताया है।

अफ्रीका के साथ भारत के संबंधों की अपनी ही अनूठी कहानी है जिसके आधार पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे औपनिवेशवाद के विरूद्ध संघर्ष के हमारे साझा इतिहास तथा अपनी जनता की समृद्धि के लिए हमारी आकांक्षा के रूप में परिभाषित करते हुए 'एक मजबूत भावनात्मक सम्पर्क' कहा है।

III

अफ्रीकी-भारतीय संबंधों का संचालन करने वाली अनिवार्यताएं हमारी साझी चुनौतियों, साझे हितों और पारस्परिक फायदे की अवधारणाओं पर आधारित है।

प्रथम अनिवार्यता हमारे साझे अतीत और सांस्कृतिक संबंधों से उत्पन्न होती है। भारत राष्ट्रीय स्वतंत्रता हेतु हमारे संघर्ष को प्रेरित करने में अफ्रीका की भूमिका के लिए उसके प्रति अविस्मरणीय रूप से आभारी है। इसी महाद्वीप पर महात्मा गांधी ने अहिंसा एवं शांतिपूर्ण ढंग से प्रतिरोध की धारणा को विकसित किया और इसका पहली बार उपयोग किया जिसने भारत को आजादी दिलाई।

हमारी मौजूदा पसन्दों की जानकारी शोषण और जातीय भेदभाव के विरूद्ध औपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के हमारे साझा अनुभव से मिलती है। भारत, अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था में आने वाले अवरोधों के बावजूद अफ्रीकी देशों सहित अन्य विकासशील देशों के हितों का, 1955 की बांडुंग घोषणा, ग्रुप ऑफ 77 और गुट निरपेक्ष आन्दोलन जैसी पहलों के माध्यम से, समर्थन करने में अग्रणी रहा है।

इसके अलावा, भारतीय मूल के लोगों का एक बहुत बड़ा तबका अफ्रीका को अपना देश मानता है, इनमें से अनेक लोग अफ्रीका के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में बसे हुए हैं। वे स्थानीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि में योगदान देते हैं और अपने अपनाए गए देशों और एवं अपने मूल देश के बीच सम्पर्क प्रदान करते हैं।

द्वितीय अनिवार्यता हमारी अनुपूरक शक्तियों एवं क्षमताओं से उत्पन्न होती है जो हमें प्राकृतिक रूप से आर्थिक एवं वाणिज्यिक भागीदार बनाते हैं। भारत, अफ्रीका में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए एक दीर्घकालिक, स्थायी और लाभप्रद बाजार प्रदान करता है। भारत के लिए, अफ्रीका में हमारी ऊर्जा सुरक्षा एवं खाद्य सुरक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए प्रमुख सहयोगी बनने की सम्भावना है। यह दोनों के लिए लाभदायक स्थिति है।

भारत, अफ्रीका में परियोजनाओं में निवेश का महत्वपूर्ण स्रोत बनता जा रहा है जिसका विस्तार औषधि, सूचना प्रौद्योगिकी एवं दूरसंचार, इंजीनियरिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कृषि जैसे विविध क्षेत्रों तक है। भारतीय निजी क्षेत्र अफ्रीका में निवेश करने में अग्रगामी रहा है और इस प्रकार के निवेश प्राप्त करने वाले देशों में रोजगार सृजन और वृद्धि में योगदान दे रहा है।

हाल के वर्षों में अफ्रीका में भारतीय निवेश की मात्रा में वृद्धि हुई है और वर्तमान में यह लगभग 35 बिलियन डालर होने का अनुमान है जिसका अधिकांश हिस्सा दक्षिणी एवं पूर्वी अफ्रीका में केन्द्रित है।

हमारे वाणिज्यिक विनिमय में कृषि व्यापार संबंधी पहल महत्वपूर्ण घटक रहें हैं। कृषि क्षेत्र में भारतीय सफलताएं कम पूंजी प्रधान खेती और विविध मौसमी परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में प्राप्त हुई हैं जो अफ्रीका के लिए प्रासंगिक हो सकती हैं। इसके अलावा, शहरी भारत में बढ़ता मध्य-वर्ग अफ्रीका के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए भरोसेमंद उपभोक्ता बन सकता है।

व्यापार असंतुलन को समाप्त करने और व्यापार की मदों के विविधीकरण के उद्देश्य से भारत ने पहले ही अफ्रीका के सभी कम विकसित देशों, कुछ को अपवाद स्वरूप छोड़ कर, के लिए भारतीय बाजारों तक शुल्क-मुक्त पहुंच की पेशकश कर दी है।

तीसरी अनिवार्यता हमारी अपनी आबादी के लिए संपोषणीय भविष्य का निर्माण करने की दिशा में विकास संबंधी चुनौतियों से निपटने में हमारे साझा दृष्टिकोण से उत्पन्न होती है। अफ्रीकी नेतृत्व समाज के स्तर पर समावेशन को प्रोत्साहन देते हुए व्यवसायिक विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र को विकसित करने में भारत के घरेलू अनुभव और सफलता से अवगत है।

यद्यपि प्रत्येक देश के विकास की अपनी एक अनूठी कहानी होती है, फिर भी हमारे समक्ष स्वास्थ्य एवं सेहत, खाद्य सुरक्षा एवं पोषण, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन, जल एवं स्वच्छता से संबंधित अनेक मुद्दों के समाधान शायद उस दर्पण प्रतिबिम्ब में उपलब्ध है जिसे भारत और अफ्रीका जनसांख्यिकी, रोगों की व्याप्ति और संसाधनों के दबाव के रूप में पेश करते हैं तथा प्रगतिशील समाधानों के द्वारा हमने इन चुनौतियों का जिस प्रकार सामना किया है।

इस प्रकार अफ्रीका और भारत क्षमता-निर्माण, कार्यक्रम क्रियान्वयन और नवीन प्रक्रिया के संबंध में एक-दूसरे से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

अफ्रीका के साथ हमारा विकासपरक सहयोग संबंध अनूठा है जो परामर्शी प्रक्रिया द्वारा अफ्रीका के विकास लक्ष्यों की पूर्ति में योगदान करते हुए परस्पर लाभ पर आधारित है। हमारा नजरिया सुविधाएं या परियोजनाओं का अधिकार मांगने का नहीं रहा है, बल्कि हमारी यही इच्छा रही है कि हम अफ्रीका के लोगों द्वारा स्वयं निर्धारित किए गए अफ्रीका के विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान करें।

कृषि, लघु और मध्यम उद्यम, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति, अवसंरचना, ऊर्जा, संचार, सोसाइटी और प्रशासन समेत कई क्षेत्रों में हमारे सहयोगपूर्ण संबंध हैं। हमारा साझेदारी मॉडल साझेदार देशों में मानव संसाधन विकास और संस्था निर्माण पर आधारित है। परिणामत: इससे अफ्रीका में विशेषत: कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्र और लघु उद्योग क्षेत्रों में कौशल विकास और क्षमता निर्माण संभव हुआ है व भारत तथा अन्य देशों को होने वाले निर्यात में वृद्धि हुई है।

भारत ने इन पहलों को अमलीजामा पहनाने हेतु नई प्रणाली विकसित करने का भी प्रयास किया है जैसे रियायती दर पर उधार की व्यवस्था जो अफ्रीका में हमारे साझेदारों की आवश्यकताओं और क्षमताओं के अनुरूप विकसित की गई है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ऐसी पहल उन्हें कर्ज के जाल में फंसाने का एक और माध्यम न बन जाए।

अफ्रीका में हमारे विकास सहयोग को बढ़ावा देने हेतु भारत की सरकार ने वर्तमान ऋण सीमा के अतिरिक्त आगामी पांच वर्षों के लिए 10 बिलियन डॉलर का रियायती ऋण देने की भी घोषणा की है। भारत-अफ्रीका विकास निधि के लिए 100 मिलियन डॉलर और भारत अफ्रीका स्वास्थ्य निधि के लिए 10 मिलियन डॉलर समेत 600 मिलियन डॉलर की अनुदान सहायता की भी घोषणा की गयी है।

इस अनुदान सहायता में आगामी पांच वर्षों के लिए भारत में अफ्रीकी छात्रों के लिए 50,000 से अधिक छात्रवृत्तियां भी शामिल होंगी।

हमारे सहयोग की चौथी अनिवार्यता है शांति और सुरक्षा संबंधी मुद्दों के समाधान हेतु साझा दृष्टिकोण और वैश्विक मामलों पर विचारों की समरूपता। आतंकवाद और समुद्री डकैती से लड़ने से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार, विश्व व्यापार और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर वैश्विक मंचों पर अपने दृष्टिकोण में समन्वय स्थापित करने तक विविध वैश्विक चिंताओं पर हमारे विचार मिलते-जुलते हैं। वैश्विक प्रशासन की राजनीतिक, सुरक्षा संबंधी और आर्थिक संस्थाओं में सुधार सहयोग का महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है, अफ्रीका और भारत दोनों संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अर्थपूर्ण विस्तार समेत ऐसे सुधार किए जाने की आवश्यकता को रेखांकित करते रहे हैं।

अपनी जनता के लिए शांति और समृद्धि का लक्ष्य हासिल करने में आतंकवाद का खतरा बड़ी बाधा के रूप में उभरा है। आतंकवाद और उग्रवाद का बढ़ता ज्वार ऐसा खतरा है जिसका सामना आज सभी सभ्य समाज कर रहे हैं। भारत में हम अपनी सीमा पार से इस खतरे का सामना कर रहे हैं। आतंकवादी कार्रवाई और हिंसा को किसी आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है। हम आतंकवाद के सभी रूपों की भर्त्सना करते हैं और इस खतरे से व्यापक रूप से निपटने हेतु कड़े और एकजुट अन्तरराष्ट्रीय प्रयास किए जाने का आह्वान करते हैं।

भारत संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में किए गए वास्तविक बहुपक्षीय प्रयास के अंतर्गत अफ्रीका में स्थिरता और शांति सुनिश्चित किए जाने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं। इस प्रतिबद्धता का निर्वाह करते हुए भारत के 6000 से अधिक कार्मिक अफ्रीका में शांति बनाए रखने के संयुक्त राष्ट्र के दायित्वों के निर्वाह हेतु कार्यरत है। इसके अतिरिक्त हमने सुरक्षा क्षेत्रों में रक्षा संबंधी प्रशिक्षण में वृद्धि और क्षमता निर्माण हेतु अपने अफ्रीकी साझेदारों के साथ द्विपक्षीय स्तर पर भी कार्य किया है।

ऐसे समय में, जब विश्व स्तर पर राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में अनिश्चितता का वातावरण है और उठापटक से वैश्विक व्यवस्था की स्थिरता को खतरा है, जो विकासशील देश अपने नागरिकों के लिए स्थिरता, शांति और समृद्धि चाहते हैं, उनके लिए एकता की नई भावना के साथ एक दूसरे का सहयोग करने और परामर्श करने की आवश्यकता का महत्व बढ़ जाता है।

IV

अफ्रीका के साथ मजबूत साझेदारी विकसित करने की भारत की प्रतिबद्धता हमारी नई पहलों विशेषत: भारत अफ्रीका शिखर मंच से परिलक्षित होती है जिसकी तीसरी बैठक 2015 में नई दिल्ली में हुई। इसमें 54 देशों ने भाग लिया।

इस मंच ने अफ्रीकी नेताओं को यह विचार करने का अवसर प्रदान किया कि भारत उन्हें क्या दे रहा है। इस शिखर सम्मेलन के परिणामी दस्तावेज "दिल्ली घोषणापत्र" और "फ्रेमवर्क फॉर स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप" - विविध राजनीतिक और आर्थिक मसलों पर हमारे समान दृष्टिकोण और हमारे परस्पर सहयोग को बढ़ाने की हमारी संयुक्त प्रतिबद्धता को प्रतिबिम्बित करते हैं।

इस बैठक ने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विकास में सहयोग के व्यापक क्षेत्रों की पहचान करने के साथ-साथ समानता, परस्पर सम्मान और साझे लाभ पर आधारित अफ्रीकी-भारतीय संबंधों को नई दिशा प्रदान की।

लेकिन ऐसी पहलें तो शुरूआत मात्र हैं। हमारे संबंधों को मुकाम तक पहुंचाने के लिए लंबी दूरी तय करना अभी शेष है। हमारे संबंधों में विस्तार की व्यापक संभावनाएं हैं और भारत व हमारे अफ्रीकी साझेदारों दोनों को इस विस्तार से पर्याप्त लाभ मिलेगा।

भारत-अफ्रीकी सौहार्द चिरस्थायी रहे।
भारत-रवांडा मैत्री चिरस्थायी रहे।
धन्यवाद।