21 दिसंबर, 2017 को नई दिल्ली में श्री प्रेम नारायण द्वारा रचित काव्य संग्रह सामीप्य के विमोचन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

नई दिल्ली | दिसम्बर 22, 2017

1) एक उत्तम काव्य संग्रह के प्रकाशन के लिए मैं प्रेम नारायण जी और राजपथ प्रकाशन को बधाई देना चाहता हूँ।

2) इस बात में कोई संदेह नहीं है कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान से ही हिन्दी कविता का दौर शुरू हो चुका था। 19वीं सदी में, भारतेन्दु हरिश्चंद्र हिन्दी के आधुनिक रूप के पितामह रहे।

3) आज हिन्दी का कद बहुत ऊंचा हो चुका है। ये सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। आज यह अनेक देशों में बोली जाती है और यह अंतरराष्ट्रीय स्तर की भाषा बन चुकी है।

4) प्रेम नारायण जी ने हिन्दी कविता में एक नवीन और गहरा प्रयोग किया है। उनके काव्य संग्रह “सामीप्य”, पुस्तक के शीर्षक से ही प्रकट होता है कि लेखक, पाठक को स्वतःअपने करीब लाना चाहता है। प्रेम नारायण जी की यह रचना अद्भुत है। इनकी पुस्तक की प्रस्तावना ही स्वयं एक बेजोड़ कविता है। यह देखकर अच्छा लगा कि प्रेम जी ने पुस्तक में कविता-रूप में मंगलाचरण भी सम्पादित किया है।

पुस्तक का प्रथम शब्द नव और अंतिम शब्द श्रद्धांजलि है। इस रूप में शायद कवि, साहित्य में इस पुस्तक के रूप में, अपने भावों को ही अर्पित कर रहे हैं। ये उनकी नवश्रद्धांजलि ही लगती है।

“कविता” नाम से उनके संकलन की पहली कविता ठीक ही कहती है कि आदमी और कुछ नहीं, सदा अपनी ही खोज में लीन रहता है। इनकी “स्मृति” नाम की कविता आदमी को अपने कर्मों की समीक्षा की दृष्टि देती है। खुद का मूल्यांकन करना सिखाती है। इनकी कविता “कश्ती”,

मुझे लगता है किसी रामभजन से कम नहीं है -
तुम ही मांझी, तुम ही किनारा,
तुम ही कश्ती, तुम ही सहारा,
एक बार मिल जाओ मुझको
मिट जाए सारा अंधियारा।

इनकी सामीप्य कविता सच में बहुत गहरी कविता है। वहां हर पंक्ति में दर्शन झलकता है।

सामीप्य मिटा देता कटुता
वह सबल विचारों में लाता है, सदा सदाशयता।

ये सच ही है, पास रहने, मिलने-जुलने से ही मिठास आता है। रिश्ते बनते हैं। हम यात्रा में किसी अनजाने के बगल में घंटे भर में अच्छे मित्र बन जाते हैं। यहाँ दर्शन में जाएं तो ईश्वर का सामीप्य भक्ति को जगाता है। हम और कुछ न करें सिर्फ मंदिर जाने लगें तो कुछ दिनों में कोई बिल्कुल अनजान या नास्तिक आदमी भी आस्तिक और श्रद्धावान हो जाएगा।

महाकवि भर्तृहरि ने कहा ही है, जो श्रद्धा रखता है उसे ही ज्ञान मिलता है। नारायण जी के इस संकलन की सभी कविताएं बेजोड़ हैं। “अदृश्य रिश्ता” नाम की कविता ठीक ही कहती है, कि हम सब साथ रहते हैं, हमारा सभी का कुछ खास रिश्ता है जो सदा अदृश्य रहता है। हमें उसी रिश्ते को ही तो ढूंढना है। और वो है मानवता का रिश्ता। मानवता की जीत ही बड़े उद्देश्य की प्राप्ति है और मेरे विचार से नारायण जी भी उसी मानवीय चरम विकास की बात कर रहे हैं। आपकी “प्रतिक्रिया” नाम से कविता भी आदमी को नवीन दिशा, नवीन उमंग ही तो दे रही है।

मेरी शुभकामनाएँ हैं, नारायण जी भविष्य में भी ऐसी ही गहरी कविताएं और साहित्य रचना करें। आदमी का लक्ष्य ऐसा ही होना चाहिए, जैसा नारायण जी कहते हैं -

मैं उड़ चला गगन छूने
मन में तेरा सामीप्य लिए
जो पाना है उसको पाऊँ
ऐसा उर में संकल्प लिए।

प्रत्येक मानव को सदा प्रगतिशील एवं यत्नशील होना ही चाहिए, तभी वास्तविक लक्ष्य और वास्तविक विकास की प्राप्ति होगी।

नारायण जी को मेरा विशेष साधुवाद।