20 सितंबर, 2017 को नई दिल्ली में राष्ट्रीय अ.जा./अ.ज.जा. केन्द्र संगम में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का अभिभाषण।

नई दिल्ली | सितम्बर 20, 2017

मैं राष्ट्रीय अ.जा./अ.ज.जा. केन्द्र संगम के हितधारकों के साथ संवाद करने के लिए केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने पर अत्यंत प्रसन्न हूं। देश के दलित और वंचित वर्गों का उत्थान किये जाने से देश का विकास होगा। तभी महात्मा गांधी, डॉ बाबा साहब अंबेडकर, पंडित दीन दयाल उपाध्याय के सपनों और सरकार की 'सबका साथ - सबका विकास' महत्वाकांक्षा को पूरा किया जा सकेगा। जब तक समाज के सभी वर्ग विकसित नहीं होते, तब हम हम एक विकसित देश को आकार नहीं दे सकते। विकास का तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक कि ये सभी तक न पहुंच जाए। हर किसी को यह महसूस होना चाहिए कि वह देश के विकास में योगदान दे रहा है। हमें देश के विकास के लिए एक एकीकृत, बहु-आयामी विकास एजेंडा तैयार करना होगा।

हमारे देश के विकास के लिए उद्योगों की स्थापना करना महत्वपूर्ण है। इससे बेरोज़गारी की समस्या का समाधान होगा और आय में वृद्धि होगी। उद्योग और कृषि लोगों की दो आँखें हैं। दोनों ही देश के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। 'सबका साथ - सबका विकास' का सपना पूरा करने के लिए बड़े उद्योगों के साथ छोटे उद्योगों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि हमारे देश में लगभग 22 लाख लघु उद्योग हैं और हर साल इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। वर्ष 2007 में देश में लगभग 2 लाख लघु उद्योगों को स्थापित किया गया था। यह संख्या साल दर साल बढ़ती रही है और वर्तमान में हमारे देश में करीब 4 लाख लघु और मध्यम उद्योग चल रहे हैं। मुख्य रूप से लघु और सूक्ष्म उद्योग सामने आ रहे हैं। यदि हम इसमें अ.जा. और अ.ज.जा. की संख्या को देखते हैं, तो वह केवल 4 लाख है। इस संख्या को बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्हें प्रोत्साहित करना और तैयार उत्पादों को बेचने के लिए तकनीकी ज्ञान और बाजार प्रदान करना महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य के साथ सरकार ने अ.जा./अ.ज.जा. केन्द्र आरंभ किया है।

सरकार ने एक नीति बनायी है कि वह जो भी सामान खरीदती है, उसमें से कम-से-कम 4 प्रतिशत अ.जा./अ.ज.जा. इकाइयों से होना चाहिए। लेकिन आज अ.जा./अ.ज.जा. इकाइयों से की जाने वाली खरीद आधे प्रतिशत से भी कम है।

वर्तमान में राष्ट्रीय चर्चाओं में बदलाव आया है। हम स्टैंड-अप, स्टार्ट-अप, इनक्यूबेशन और इनोवेशन की बात करते हैं। कौशल, उद्यमशीलता विकास पर जो विशेष ध्यान दिया जा रहा है, उसे और गति दी जानी चाहिए। भारत में बनाओ, कौशल भारत, डिजिटल भारत, स्वच्छ भारत - इन सभी कार्यक्रमों को हमारे समाज के प्रत्येक भाग तक पहुंचना चाहिए और सभी को अपना यथोचित हिस्सा मिलना चाहिए। तभी विकास सार्थक होगा। यदि आप समाज के कुछ हिस्सों तक नहीं पहुंचते है तो विकास अधूरा है। क्षमता निर्माण महत्वपूर्ण है; ऋण उपलब्धता महत्वपूर्ण है, प्रौद्योगिकी उन्नयन भी महत्वपूर्ण है।

महिलाओं को सशक्त बनाना संपूर्ण मानवता को सशक्त बनाना है, क्योंकि महिलाएं जनसंख्या का 50 प्रतिशत हिस्सा हैं। जब तक हम महिलाओं को समान अवसर प्रदान नहीं कर देते, तब तक हम एक विकसित देश होने का दावा नहीं कर सकते। इसी प्रकार, हम अपने देश के विकसित होने का दावा नहीं कर सकते हैं जब तक ऐसे वर्ग मौजूद हैं जो वंचित हैं और जिन्हें विकास की धारा से जुड़ने का अवसर नहीं दिया गया है। इसलिए प्रत्येक सरकार का यह कर्तव्य है कि वह उन वर्गों का उत्थान करे।

भारत के समग्र विकास के लिए यह प्रयास किया जा रहा है। सभी को इस में भाग लेना होगा और यह एक पवित्र जिम्मेदारी के रूप में लिया जाना चाहिए। तभी अ.जा./अ.ज.जा. का विकास होगा।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र (एमएसएमई) भारतीय अर्थव्यवस्था का परकोटा है और यह कृषि के बाद सबसे बड़ा नियोक्ता है। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिए भी प्रमुख योगदानकर्ताओं में से एक है।

उतार-चढ़ाव के बावजूद, एमएसएमई क्षेत्र ने लचीलापन दिखाया और वर्ष 2007-08 में 11.77 प्रतिशत से 2015 में बढ़कर 17 प्रतिशत रहकर अच्छी विकास दर बनाए रखी। इसने अप्रैल-सितंबर 2015 से 18.74 प्रतिशत की शानदार वृद्धि देखी।

मेक इन इंडिया में 2022 तक सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान 25 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है, और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए एमएसएमई क्षेत्र को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।

यह क्षेत्र न केवल पिछड़े और ग्रामीण क्षेत्रों के औद्योगिकीकरण में योगदान देता है, बल्कि क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने में भी मदद करता है। अपनी इसी विशिष्टता के साथ , यह क्षेत्र एक तुल्यकारक के रूप में कार्य करता है और समाज के सभी क्षेत्रों के लोगों के लिए सफल उद्यमी बनने और अपने सपनों को पूरा करने के लिए व्यापक अवसर प्रदान करता है।

परिणामस्वरूप, सीमान्त समुदायों से अनेक उद्यमी आगे आए हैं। परन्तु उचित मार्गदर्शन और संसाधनों का अभाव उनकी आर्थिक सफलता को बाधित कर रहा है जिसके कारण सरकार द्वारा नीतिगत हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त हुआ।

जैसा कि आप सभी जानते हैं, सरकारी खरीद नीति को इस अनुमान के साथ शुरू किया गया था कि केन्द्रीय मंत्रालयों, विभागों और केन्द्रीय सरकारी क्षेत्र के उद्यमों द्वारा वस्तुओं और सेवाओं की कुल खरीद में से 20 प्रतिशत खरीद एमएसई से ही की जाए और ऐसी खरीद का 20 प्रतिशत (कुल का चार प्रतिशत) अ.जा./अ.ज.जा. के व्यक्ति के स्वामित्व वाले एमएसई से किया जाए।

यद्यपि, अ.जा./अ.ज.जा. से चार प्रतिशत की खरीद करने की खरीद नीति 2012 में शुरू की गई, तथापि इसकी प्रतिक्रिया कुछ खास उत्साहजनक नहीं रही और 0.5 प्रतिशत से भी कम वस्तुएं खरीदीं गईं। परिणामस्वरूप, सरकार ने ऐसे समुदायों से आने वाले उद्यमियों को पेशेवर सहायता प्रदान करने और अ.जा./अ.ज.जा. जनसंख्या के बीच "उद्यम संस्कृति" को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय अ.जा./अ.ज.जा. केन्द्र स्थापित किया।

मुझे बताया गया है कि इस केन्द्र को अ.जा./अ.ज.जा. उद्यमियों के लिए ऋण संपर्कों को सुकर बनाने, अ.जा./अ.ज.जा. एमएसई को नए बाजारों तक पंहुच उपलब्ध कराने और अ.जा./अ.ज.जा. उद्यमों के बारे में आकड़े जुटाने, केन्द्रीय सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों, उद्योग एसोसिएशनों और अ.जा./अ.ज.जा. उद्यमों के साथ कार्य करने का कार्य दिया गया है ताकि वे खरीद में प्रभावी ढ़ंग से भागीदारी कर सकें।

अ.जा./अ.ज.जा. उद्यमों के समग्र विकास के लिए कौशल उन्नयन पर सर्वाधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। मुझे खुशी है कि आज राष्ट्रीय अ.जा./अ.ज.जा. केन्द्र 2,000 से अधिक उद्यमियों को कुशल बनाने के लिए क्षेत्रीय कौशल परिषदों के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू)पर हस्ताक्षर करेगा।

आज, हमारे बीच उद्योग जगत की शीर्ष एसोसिएशनें और नई व सटार्टअप कंपनियों को सहायता देने वाली कंपनियां मौजूद हैं, जो मिलकर देश के पिछड़े समुदायों के सशक्तिकरण के लिए कार्य करती रही हैं। यह हमारे देश का वास्तविक सत्व और परम्परा हैं जिसमें हर कोई वंचित वर्गों की सहायतार्थ एकजुट होकर कार्य करता है।

एसोसिएशनों और सहायता देने वाली कंपनियों की राष्ट्रीय अ.जा. अ.ज.जा केन्द्र के उद्देश्यों में सहायता करने में बहुत बड़ी भूमिका है। प्रत्येक एसोसिएशन को उसके संबंधित क्षेत्र में क्षमता निर्माण और उद्यमियों का मार्गदर्शन करने में सहायता देनी चाहिए, जबकि सहायता देने वाली कंपनियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उभरते उद्यमियों के सपनों को साकार किया जाए।

मुझे विश्वास है कि एसोसिएशनें और सहायता देने वाली कंपनियां इस अवसर पर सामने आएंगे और नवोन्मेषी कार्यनीतियों के साथ आगे आएंगे ताकि सरकारी खरीद नीति को न केवल सफलतापूर्वक कार्यान्वित किया जाए बल्कि अ.जा./अ.ज.जा. उद्यमियों के लिए आगे बढ़ने और अर्थव्यवस्था के विकास में पर्याप्त योगदान देने के लिए एक प्रभावी परितंत्र सृजित किया जाए।

मैं समझता हूँ कि राज्य सरकारों को भी सामान्य वर्ग और विशेष रूप से अ.जा./अ.ज.जा.वर्ग के उद्यमों में एमएसएमई क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए केन्द्रीय सरकार की स्कीमों की तर्ज पर खरीद नीतियां तैयार करनी चाहिएं।

मैं एक बार फिर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय को इस अतिमहत्वपूर्ण संवाद को आरंभ करने के लिए धन्यवाद देता हूँ और आशा करता हूं कि इसके परिणास्वरूप अ.जा. और अ.ज.जा. उद्यमियों को नए और अपेक्षाकृत बड़े उद्यमों को शुरू करने के लिए आवश्यक बल देने के लिए एक समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाएगी।
जय हिन्द!

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