20 नवंबर, 2017 को हैदराबाद में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अधिवक्ता संघो के सदस्यों के साथ बैठक के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण।

हैदराबाद | नवम्बर 20, 2017

"मैं आज की शाम आप सबका सानिध्य पाकर प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूं क्योंकि आज मुझे आंध्र विश्वविद्यालय से अपनी कानून की डिग्री की शिक्षा पूरी करने से पहले और बाद में कानूनी बिरादरी के साथ जुड़े संबंध की बहुत सी सुखद स्मृतियां याद हो आई हैं। यद्यपि मैंने यहां बहुत समय पूर्व एक अधिवक्ता के रूप में अपना पंजीकरण कराया था, परंतु मुझे लम्बे समय तक इस कानूनी पेशे में रहने का अवसर नहीं मिला। मैं 'कानून बनाने वालों' की बिरादरी में शामिल हो गया।

मुझे अपने बहुत से पुराने मित्रों और उन नए लोगों से मिलकर बहुत खुशी हुई है जो इस उच्च न्यायालय में इस नेक पेशे में प्रैक्टिस कर रहे हैं।

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय, जिसने वर्ष 2006 में अपनी स्वर्ण जयंती मनाई थी, न केवल राज्य के न्यायिक इतिहास में बल्कि अपने सार्वजनिक जीवन में भी अपने लिए एक विशिष्ट स्थान बनाता हुआ अपने विकास के एक सोपान से गुजरता हुआ दूसरे सोपान तक पहुंच गया है।

इस उच्च न्यायालय को यह विशिष्ट गौरव प्राप्त है कि इसने भारत के उच्च न्यायालय को बहुत से न्यायविद और न्यायाधीश दिए हैं जिनके नाम हैं :

न्यायमूर्ति चिन्नपा रेड्डी, न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी, न्यायमूर्ति रामास्वामी, न्यायमूर्ति जगन्नाथ राव, न्यायमूति सुदर्शन रेड्डी, न्यायमूर्ति जस्ती चलमेश्वर, न्यायमूर्ति एन.वी. रमणा और न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव, इनमें से बाद वाले तीन मानीय न्यायाधीश अभी सेवारत हैं।

इस न्यायालय को उच्च न्यायालय के स्तर पर भी प्रख्यात वकीलों और न्यायाधीशों की विद्वत समूह तैयार करने का गौरव प्राप्त है। हम न्यायमूर्ति पी.ए. चौधरी को याद करते हैं जिन्हें सरिता के मामले में दिए गए उस निर्णय की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत सराहना प्राप्त है जिसमें उन्होंने स्वतंत्रता के इस हितकर सिद्धांत की "अपने शरीर और मन पर अधिकार को लेकर व्यक्ति संप्रभु होता है" की पुष्टि करते हुए कहा था कि 'मौलिक अधिकार' के सिद्धांत तो व्यक्ति के शयनकक्ष में भी प्रभावी होंगे।

हम मोटर वाहन दुर्घटनाओं के शिकार व्यक्तियों के लिए मुआवजे की गणना करने हेतु एक नया पैमाना परिभाषित करने क लिए न्यायमूर्ति जगन्नाथ राव का भी स्मरण करते हैं।

इस उच्च न्यायालय में कुछ रोचक ऐतिहासिक दस्तावेज भी रखे हुए हैं जैसे कि श्री किशन की इस न्यायालय में पहली जनहित याचिका जो उन्होंने 1957 में आंध्र प्रदेश राज्य के गठन का विरोध करते हुए दायर की थी।

मुझे बताया गया है कि इस याचिका की हस्तलिखित प्रतियां, मूल रूप में, अब भी इस न्यायालय की रजिस्ट्री में उपलब्ध हैं और इसका निर्णय वर्ष 1957 में ऑल रेडियो रिपोर्टर में श्री किशन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के मामले के रूप में दर्ज है।

इस विधिज्ञ परिषद ने बहुत सी महान हस्तियां हमें दी हैं। श्री धुव्वुरी नरसा राजू, श्री के प्रताप रेड्डी और श्री पद्मनाभ रेड्डी, श्री वेंकट रेड्डी, श्री मोव्वा चन्द्रशेखर राव, श्री अनन्त बाबू, श्री बी.वी. सुब्बैया, इनमें ऐसे कुछ नाम हैं।

इस विधिज्ञ परिषद में से कुछ वकील भारत के उच्चतम न्यायालय तक भी पहुंचे हैं। उनमें से कुछ महान हस्तियां याद आ रही हैं - श्री पी.पी. राव (पद्मभूषण विजेता), श्री वी.आर. रेड्डी जिन्होंने सॉलिसिटर जनरल और भारतीय विधिज्ञ परिषद के अध्यक्ष के रूप में भी सेवाएं दी थी, श्री एल. नागेश्वर राव को विभिन्न दलों के शासनकाल में तीन कार्यकाल के लिए एडीशनल सॉलिसिटर जनरल के रूप में सेवाएं देने का गौरव प्राप्त है और वे अंतत: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बने। श्री पी.एस. नरसिम्हा वर्तमान में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के रूप में सेवारत हैं।

इस विधिज्ञ परिषद की महान हस्तियों की सूची डा. पी.सी. राव (पद्मभूषण विजेता) का नाम लिए बिना पूरी नहीं होगी जिन्होंने भारत संघ के विधि सचिव के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं और जो बाद में समुद्री कानून के लिए अंतर्राष्ट्रीय अधिकरण में एक लम्बे कार्यकाल तक न्यायाधीश के पद पर रहे थे।

इन प्रख्यात वकीलों का उल्लेख करना ही इस न्यायालय में वकालत के पेशे से जुड़े लोगों की समृद्धि और विविधता को दर्शाने के लिए पर्याप्त है। इस न्यायालय ने यहां के वकीलों की उच्च गुणवत्ता के कारण ही इतनी ख्याति और मान सम्मान प्राप्त किया है।

मैं उन महान हस्तियों में से प्रत्येक का अभिनंदन करता हूँ जिन्होंने अधिवक्ताओं, न्यायाधीशों और विधिवेत्ताओं के रूप में इस महती संस्था की सेवा की है।

प्रिय भाइयों और बहनों, जैसा कि आप भली-भांति जानते हैं, हमने अपने संविधान के माध्यम से अपने सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय दिलाने का दृढ़ संकल्प लिया है।

वास्तव में, भारत ने "धर्म" को शासन के केन्द्र में रखा है।

मैं आपको महाभारत में कही गई बात का स्मरण कराना चाहूंगा:

"धर्म समाज की मजबूती, सामाजिक व्यवस्था के अनुसरण और मानवता की भलाई तथा प्रगति के लिए है। जिस चीज से इन उद्देश्यों की पूर्ति में सहायता मिलती हो वही धर्म है।"

धर्म को धारण करने का अर्थ अपनी सभ्यता को बनाए रखना है। यदि हम विधि के शासन के नियम का पालन करेंगे तो मानव समाज का अस्तित्व बना रहेगा।

इसलिए हम "धर्मो रक्षति रक्षित:" कहते हैं।

जैसा कि चाणक्य ने भी कहा था "कानून और नैतिकता विश्व को पोषित करते हैं।"

इसे अपने जीवन में चरितार्थ करने में हम सब को भूमिका अदा करनी होगी।

नागरिक विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका जैसी शासन की संस्थाओं की ओर उम्मीद की नजर से देख रहे हैं। इन संस्थाओं से यह उम्मीद है कि ये 'सुराज्य' स्थापित करें और लोगों के जीवनस्तर में सुधार करने में योगदान दें। एक आम भारतीय इन संस्थाओं में जो भरोसा और विश्वास रखता है वह कम होता जा रहा है।

कानूनों के लागू किए जाने और न्याय प्रदान करने के कार्य को ज्यादा प्रभावी बनाने तथा उसमें तेजी लाने की जरूरत है और ऐसा दिखाई भी देनी चाहिए कि यह कार्य न्यायोचित तथा निष्पक्ष ढंग से हो रहा है।

वकीलों, न्यायाधीशों और न्यायालयों के आचरण का इस देश के असैनिक नागरिकों के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वकीलों की गतिशीलता "न्यायिक सक्रियता" का आधार है।

हमने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाया है जिसके मूल सिद्धांत "विधि का शासन" और "शक्तियों का पृथक्करण" हैं। इन संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए इस देश के वकीलों द्वारा निभायी जाने वाली भूमिका का स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से आज तक इस देश के कानूनी इतिहास में प्रमुख स्थान रहा है।

विधिज्ञ परिषद (बार) और न्यायपीठ, जो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, की बड़ी जिम्मेदारी होती है और इन्हें अपने काम को महज एक अन्य पेशे के रूप में नहीं बल्कि एक नैतिक और सदाचारी काम के रूप में लेना चाहिए जो हमारे राष्ट्र को एकजुट रखता है।

अदालतें न्याय करती हैं लेकिन वे ऐसा वकीलों की सक्षम सहायता से ही करने में सफल हो पाती हैं।

वकीलों द्वारा वादियों को प्रदान की जाने वाली सेवा एक जनसेवा है। वादी अपने वकील पर इस तरह विश्वास करते हैं जैसे कोई शिशु अपनी माता पर अंध विश्वास करता है। वकीलों को हमेशा वादियों के इस विश्वास पर खरा उतरना चाहिए।

न्याय प्रदान करने की व्यवस्था एक संस्था के रूप में अब चौराहे पर खड़ी है और इसके समक्ष अनेक चुनौतियां हैं। जनता का विश्वास न्याय प्रदान करने की व्यवस्था की आधारशिला है। यह संस्था जनता द्वारा इस पर किए जाने वाले विश्वास को तोड़ नहीं सकती है।

नैतिक और आदर्श मूल्यों में सामान्य गिरावट से न्याय प्रदान करने की व्यवस्था पर भी असर पड़ा है। आशावादी होने के कारण मैं विधिज्ञ-वर्ग पर विश्वास रखता हूँ ताकि उन सर्वोच्च नैतिक और आचार संबंधी मूल्यों को पुन: प्राप्त किया जा सके। अत्यधिक संख्या में मामले लंबित हैं जिसका आंशिक कारण रिक्तियों को नहीं भरा जाना है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो द्वारा जारी भारत में कारागार आंकड़े, 2015 की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय जेलों में 67 प्रतिशत विचाराधीन कैदी बंद हैं। विधि मंत्रालय के अनुसार प्रति दस लाख की आबादी पर 18 न्यायाधीश हैं जबकि विधि आयोग ने प्रति मिलियन आबादी पर 50 न्यायाधीशों की सिफारिश की है।

ऐसी शिकायतें भी आती रहती हैं कि वकील मामलों के निपटान में विलम्ब करने की कोशिश करते हैं। इस प्रवृत्ति से बचा जाना चाहिए ताकि न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास बहाल किया जा सके। आखिरकार हम जानते हैं कि न्याय का विलंब से मिलना न्याय नहीं मिलने के समान ही होता है। वकीलों को हड़ताल पर नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे वादियों के अधिकार प्रभावित होते हैं। वकीलों द्वारा हड़ताल पर चले जाना भी मामलों के निपटान में विलंब का एक कारण है। समाज में पथभ्रष्टता और अपराध ने नये और जटिल रूप धारण कर लिए हैं। यद्यपि विज्ञान और प्रौद्योगिकी की तरक्की के सामाजिक लाभों की अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन इससे अपराधों और आर्थिक उल्लंघनों के मामलों को और ज्यादा जटिल तरीके से अंजाम देने का रास्ता भी खुल गया है जिनसे हमारे परंपरागत अपराध अन्वेषण ब्यूरों और अभियोजकों को निपटना चाहिए। वकीलों को बदलती हुई प्रवृत्तियों के अनुरूप स्वयं को तैयार करना चाहिए और उचित जानकारी से न्यायपालिका की सहायता करनी चाहिए।

जहां सशस्त्र सेनाएं हमारी सीमाओं की रक्षा करती हैं और हमें सुरक्षित रखती हैं वहीं वकील मानवाधिकार, नागरिक स्वतंत्रता, प्रशासन में पारदर्शिता, विधि के शासन के संरक्षक हैं और वे राज्य के तीनों अंगों के मध्य संतुलन कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिसे 'शक्तियों के पृथक्करण' की संकल्पना के तौर पर जाना जाता है। हमारे पर्यावरण का संरक्षण करने और प्रदूषण पर अंकुश लगाने में वकीलों ने उल्लेखनीय भूमिका अदा की है। मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि आप जन-कल्याण और जनहित के लिए इसी तरह से बढ़-चढ़कर कार्य करते रहें।

हममें से जो लोग महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं और जिनके पास शक्तियां प्राप्त हैं इनकी एक अलग प्रकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है।

उदाहरण के लिए न्यायाधीशों और अधिवक्तताओं को अच्छे आचरण का आदर्श स्थापित करना होगा। शुद्ध विचार, शालीन भाषा और हमारे महान देश के संविधान के प्रति निष्ठा से हमारे युवाओं को प्रेरणा मिल सकती है। कोई चूक या गैर-जिम्मेदाराना कथन हानिकारक साबित हो सकता है। किसी भी भ्रष्ट विचार या कृत्य से हमारे देश की सामूहिक चेतना पर प्रहार होता है। हमें इन परिहार्य चीजों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए।

मित्रों, जैसा कि आप सभी जानते हैं, कानून लोगों के जीवन में सुधार लाने के लिए और उन्हें सम्मानित जीवन जीने में सक्षम बनाने के लिए है। भारतीय न्यायपालिका हमेशा स्वतंत्र रही है और इसने लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने और आम आदमी के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

विश्व न्याय प्रतिवेदन ने अपने सूचकांक नियम, 2016 में भारत को 66वें पायदान पर रखा है। डेनमार्क, नार्वे और फिनलैन्ड तीन शीर्ष देश हैं, जबकि अफगानिस्तान, कम्बोडिया और वेनेजुएला निचले पायदान पर हैं। यदि सभी हितार्थियों द्वारा एकीकृत प्रयास किए जाएं तो भारत के पास अपना दर्जा सुधारने का बहुत बड़ा अवसर होगा। हमारे जैसे विकासशील देश में, वकीलों और न्यायविदों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी और इसके लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि न्याय तक पहुंच से किसी को भी वंचित नहीं किया जाए तथा गरीब और विशेषकर अनपढ़ व्यक्ति को उनके उचित अधिकारों से वंचित नहीं किया जाए।

वकीलों को समाज की सच्चाई के रखवालों के रूप में कार्य करना चाहिए और जरूरतमंदों तथा गरीबों की सहायता के लिए जनहित याचिका (पीआईएल) जैसे तंत्र का लाभ उठाना चाहिए।

वकीलों को उन कानूनों के संबंध में अच्छी जानकारी होनी चाहिए जिसके वे विशेषज्ञ होते हैं और उन कानूनों की अद्यतन स्थिति के संबंध में जानकारी रखने के लिए लगातार ज्ञान अर्जन करते रहना चाहिए। एक मजबूत और पूर्ण जानकारी से लैस अधिवक्ता संघ से एक सशक्त न्यायपालिका की प्राप्ति होगी क्योंकि न्यायाधीशों का चयन उन्हीं के बीच से ही होता है। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि विधि विद्यालयों से आने वाले वकील दुनियां में सर्वोत्तम हों। यदि अधिवक्ता संघों के सदस्य अपनी प्रतिबद्धता दर्शाएं तो एक दशक में यह लक्ष्य हासिल करना कठिन नहीं है।

देश की विधिक प्रणाली देश के प्रशासन की अच्छी सूचक है। लोक हितैषी, लोक-केन्द्रित, वस्तुनिष्ठ, भ्रष्टाचार मुक्त, समावेशी न्याय प्रशासन सुगम जीवन स्तर को पर्याप्त रूप से बढ़ा सकता है। न्यायाधीशों की तरह, वकीलों को भी स्वयं लागू किए गए प्रतिबंधों का पालन करना चाहिए और अपनी व्यावसायिक और निजी जिंदगी में नैतिक और आचार संबंधी मूल्यों का पालन करना चाहिए। एक वकील को अदालत का अधिकारी' और समाज का भद्र व्यक्ति' होना चाहिए। बार के सदस्य हमेशा अदालत में और अदालत के बाहर अनैतिक व्यवहार से दूर रहें और जनता के समक्ष भद्र व्यक्ति होने का उदाहरण प्रस्तुत करें।

प्रत्येक वकील को गरीब वादियों के मामले नि:स्वार्थ स्वीकार कर लोक सेवा करनी चाहिए और जरूरतमंद वादियों को नि:शुल्क विधिक सहायता उपलब्ध करानी चाहिए। कृपया इस हितकारी सिद्धांत को दिमाग में रखिए कि कोई भी वादी वकील की फीस का भुगतान नहीं कर पाने की अक्षमता के कारण असहाय नहीं रह जाए।

मैं एक बार फिर यही अपेक्षा करता हूँ कि हम इस दिशा में आगे बढ़ेंगे क्योंकि हमने, एक देश के रूप में अपनी दृष्टि को महान लक्ष्य पर केंद्रित किया है।

अंत में चाहूंगा कि आप सभी उस महान विरासत को याद करें जो आपने बीते वर्षों में विधि क्षेत्र के दिग्गजों से प्राप्त की है। उनलोगों के लिए देश सबसे पहले था और "सभी को, विशेषकर जो वंचित हैं, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिले और जिसने इसे राष्ट्र निर्माण के लिए अपना पवित्र कर्तव्य माना था।

मुझे पूरा विश्वास है कि इस महान व्यवसाय का गौरव बढ़ाने के लिए आप अपनी ओर से सर्वोत्तम प्रयास करेंगे और महाभारत के इन शब्दों को ध्यान मे रखेंगे : "राज्य को केवल कानून के शासन के अंतर्गत धर्म द्वारा संरक्षित किया जा सकता है।" हम एक नए भारत का निर्माण करें जिसमें न केवल दुनिया के कुछ सर्वोत्तम समावेशी विचार हों, अपितु जिसके द्वारा हम यह भी प्रदर्शित करें कि उन विचारों के अनुसार हम अपना रोजमर्रा का जीवन जी सकते हैं और इनके अनुरूप कार्य कर सकते हैं।

आपके प्रयासों के लिए आपको मेरी शुभकामनाएं हैं।

जय हिंद!"