20 दिसंबर, 2017 को मुंबई में योग संस्थान, मुंबई के शताब्दी समारोह का उद्घाटन करने के उपरांत भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

मुंबई | दिसम्बर 24, 2017

"मैं विश्व के प्राचीनतम योग विद्यालयों में से एक योग संस्थान, मुंबई के शताब्दी वर्ष के उद्घाटन के अवसर पर आप सभी के बीच प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूं।

यह एक महान और उत्सव मनाने का अवसर है। यह योग के प्राचीन भारतीय विज्ञान के प्रति समर्पण की शताब्दी का उत्सव है।

योग का स्वास्थ्य के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण है। इसमें शारीरिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक आयाम शामिल हैं।

योग शब्द दो मूल शब्दों से प्राप्त किया गया है - एक "संपर्क" का द्योतक है और दूसरा "एकाग्रता" का। यह शारीरिक स्वास्थ्य को मानसिक संतुलन और भावनात्मक शांति के साथ जोड़ता है। यह एकाग्रता और ध्यान केंद्रित करने को बढ़ावा देता है।

प्राचीन भारतीय चिंतन ने जीवन को एक एकीकृत समष्टि के रूप मे देखा। इसने अनुभव किया कि शारीरिक स्वास्थ्य और भावनात्मक कल्याण के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध है। प्राचीन संतों ने कहा है कि 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' जिसका अर्थ है कि अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने और अपने धर्म का पालन करने के लिए आपका शरीर स्वस्थ होना चाहिए। शारीरिक स्वास्थ्य के बिना कोई भी अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को नहीं निभा सकता है। साथ ही, भारतीयों का मानना था कि केवल शारीरिक व्यायाम पर ध्यान केंद्रित करने से मानव प्रयास और उत्कृष्टता की विशाल क्षमता सीमित हो जाएगी। भौतिक से ऊपर, एक आध्यात्मिक धरातल है। इसलिए योग विज्ञान के समर्थकों ने मानव जीवन के आंतरिक जुड़ाव का गहराई से चिंतन किया है। उन्होंने 'एकाग्रता' तथा हमारे चारों ओर होने वाली घटनाओं के बारे में सोचने, चिंतन करने और शांतिपूर्वक मनन करने की योग्यता के महत्व पर बल दिया है। उनका मानना था कि उन शांत क्षणों में हम सभी अच्छे नैतिक निर्णय ले सकते हैं।

पहले योग दर्शन को संकलित करने वाले ऋषि पतंजलि ने, योग को अपने यादृच्छिक विचारों को नियंत्रित करने और आंतरिक सद्भाव सृजित करने वाली एक स्थिरता, एक शांति को प्राप्त करने की क्षमता के रूप में परिभाषित किया है। इस दर्शन को आमतौर पर अष्टांग योग के रूप में जाना जाता है।

इस वैश्विक दृष्टिकोण में 'नैतिकता' एक सामंजस्यपूर्ण, टिकाऊ जीवनशैली का अंतर्निहित आधार है। इस योग दर्शन के घटक ऐसे नैतिक सिद्धांतों का निर्माण करते हैं जो सार्वभौमिक हैं, जैसे: अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, अपने साथी के प्रति निष्ठा बरतना और लालच न करना। यह मन, भाषण और देह की शुद्धता, संतोष, दूसरों की स्वीकृति, अध्यवसाय, स्वाध्याय, आत्मचिंतन, परमात्मा का ध्यान करने का समर्थन करता है। इसके अन्य पहलुओं में आसन, श्वास व्यायाम, अमूर्तता, एकाग्रता, ध्यान और मुक्ति शामिल हैं। स्पष्ट रूप से योग दर्शन के इन पहलुओं में भौतिक के साथ ही तात्त्विक और आध्यात्मिक पहलू शामिल हैं और यह दृष्टि विशिष्टत: व्यापक और उत्कृष्ट रूप से व्यावहारिक है।

योग बौद्ध धर्म और जैन धर्म के कई रूपों के लिए भी मार्गदर्शक रहा है।

योग की एक शाखा में 11 वीं शताब्दी ईस्वी के आस-पास शारीरिक व्यायाम पर जोर दिया गया था जिसे हठ योग कहा जाता है। समय बीतने के साथ-साथ इन व्यायामों ने विश्वव्यापी महत्व और प्रसिद्धि हासिल कर ली है। भारत में हमने महसूस किया कि ज्ञान के इस कोश को पूरे विश्व के साथ साझा किया जाना चाहिए। हमें प्रसन्नता है कि 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में स्थापित किया है। इस संकल्प ने इस प्राचीन विज्ञान के लोकप्रिय बनाने के लिए एक नया प्रोत्साहन दिया है।

विशुद्ध रूप से भौतिक पहलुओं से देखा जाए, तो योग एक बहुत ही शक्तिशाली वर्गीकृत व्यायाम का समुच्चय साबित हुआ है जो बच्चों से लेकर युवाओं और वयस्कों और यहां तक कि प्रौढ़ व्यक्तियों - सभी के द्वारा किए जा सकते हैं। अध्ययनों से पता चला है कि कई मनोदैहिक विकार योग के माध्यम से ठीक हो सकते हैं।

मैं योग संस्थान को बधाई देता हूं जो प्रशिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान कर रहा है और मानवता की उत्कृष्ट सेवा कर रहा है। वास्तव में योग संस्थान के योगदान ने योग को एक सच्ची वैश्विक अवधारणा बना दिया है। मैं प्रबंधन, विशेषकर श्रीमती हंसाजी जयदेव योगेंद्र और श्री ऋषि जयदेव योगेंद्र को उनके निरंतर समर्पण के लिए बधाई देता हूं और आशा करता हूं कि आने वाले कई वर्षों तक इस उत्कृष्ट परंपरा को बनाए रखा जाएगा।

भगवद् गीता में भगवान कृष्ण तीन योगों की चर्चा करते हैं - कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग। ये तीन आयाम - क्रिया, ज्ञान और समर्पण - जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रासंगिक हैं। हमें सदैव सक्रिय होना चाहिए तथा पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ काम करना चाहिए। साथ ही, जब हम अपना काम कर रहे हों तो हमें सीखते रहना चाहिए और ज्ञान का प्रसार करते रहना चाहिए।

यदि काम, ज्ञान और समर्पण को जोड़ दिया जाए, तो हम जो काम करते हैं वह असाधारण रूप में बदल जाता है। योग संस्थान जैसी संस्थाओं ने इन तीनों पहलुओं को जोड़ा है और इस दिशा में अग्रणी हैं। उन्होंने योग संस्थान को "जीवन विद्यालय" के रूप में डिज़ाइन किया है और विश्व में "गृहस्थ के लिए योग" आंदोलन का प्रसार किया है। मुझे आशा है कि कई संस्थान इस संस्थान द्वारा निर्धारित किए गए उदाहरण का अनुसरण करेंगे और हमारे जीवन को स्वस्थकर तथा और भी संपूर्ण बनाते रहेंगे।

जय हिन्द!"