19 सितम्बर, 2017 को नई दिल्ली में एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी पर प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का अभिभाषण

नई दिल्ली | सितम्बर 19, 2017

भारत समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की भूमि है जहाँ शास्त्रीय संगीत - कर्णाटकी और हिन्दुस्तानी - के दो मुख्य स्रोतों से लेकर देश के कोने-कोने में सूफी संगीत, कव्वाली, रविन्द्र संगीत, लोकप्रिय फिल्म संगीत, विविध लोक संगीत तक संगीत की कतिपय विधाएं है जो बहुलता की संस्कृति के सच्चे मेल को दर्शाती हैं।

संगीत की यह समृद्ध विरासत और धर्म, क्षेत्र, जाति और समुदाओं से परे जाकर लोगों को साथ लाने में इसकी एकता स्थापित करने की भूमिका ही भारत को परिभाषित करती है।

साथियों! भारतीय संगीत की जड़ें वैदिक साहित्य विशेषत: सामवेद में निहित हैं और इस प्रकार हमारी प्राचीन संगीत प्रणाली से जुड़े प्रत्येक सुर और ताल का संरक्षण कर इसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए। यह हमारा परम कर्तव्य है कि हम अपने पूर्वजों की ऐसी सांस्कृतिक विरासत को संजो कर रखें। हमें इसे संरक्षित रखना है और भावी पीढ़ी को सौंपना है। मुझे प्रसन्नता है कि इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय सांस्कृतिक केन्द्र ने इस दायित्व को सँभाला है और संस्कृति मंत्रालय इसमें सहयोग कर रहा है। मैं इस देश की सुपुत्री की जन्म शताब्दी मनाने की पहल करने के लिए संस्कृति मंत्री, श्री महेश शर्मा का अभिवादन करता हूँ। उनका संगीत अमर है। इस देश में सभी उनके संगीत से प्रभावित और रोमहर्षित है। जब महात्मा गाँधी ने भी उनका 'वैष्णव जनतो' गीत सुना था, तब वह भी मंत्रमुग्ध हो गए थे।

भारत के प्रथम प्रधान मंत्री, पंडित जवाहरलाल नेहरु ने एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी के बारे में कहा था कि ' संगीत की इस मल्लिका के सामने मैं एक साधारण प्रधान मंत्री हूँ'। उन दिनों दो विपरीत पक्षों के महान व्यक्तित्व - एक ओर पंडित जवाहरलाल नेहरु और दूसरी ओर राजाजी की विचारधारा थी - उन दोनों ने ही उनके महान गुणों की प्रशंसा की और जब उनके संगीत की सराहना की बात आई, तो वे एक साथ खड़े हुए।

संगीत का कोई वेश या सीमा नहीं होती है। संस्कृत की यह लोकोक्ति कि शिशुर्वेत्ति पशुर्वेत्ति वेत्ति गान रसं फणि: (बालक, पशु और सर्प भी संगीत समझता है) सम्यक् रूप से संगीत की जादुई शक्ति का सार प्रस्तुत करती है। त्यागराज या अन्नामाचार्य के कीर्तनों, मीरा या तुलसीदास के भजनों, हमारी साहित्यिक और संगीत परंपरा के अनेक सधे हुए संतों और ऋषियों में पारलौकिक और आध्यात्मिक प्रेम की उदात्त अभिव्यक्ति है। जैसा कि संत त्यागराज ने कहा था: "संगीत ज्ञानमु भक्ति वीणा सन्मार्गम कलाधे", जिसका मोटे तौर पर अनुवाद है कि "यदि आप भक्ति को संगीत से नहीं जोड़ते हैं, तो इससे आपको परम सुख प्राप्त नहीं हो सकता है।"

जब स्वर्गीया एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी जैसी प्रख्यात कर्णाटकी गायिका विविध गीतों को अपनी आवाज देती थीं, तो संगीत रुहानी लगता था।

शायद यह कहना कम बयान करना होगा कि एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी भारत में ही नहीं, अपितु विश्व भर में एक जानी मानी हस्ती है।

वह ऐसी व्यक्तित्व थीं जिन्होंने महात्मा गांधी से लेकर आम आदमी तक सभी को अपनी मधुर वाणी से मंत्र मुग्ध कर दिया था। 1947 में गाँधी जी के आग्रह पर उन्होंने उनके प्रिय मीरा भजन 'हरि तुम हरो' रातोंरात रिकार्ड कर उनके जन्म दिन पर उन्हें भेज दिया।

वह भारत का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान, भारत रत्न प्राप्त करने वाली प्रथम गायिका थीं। वह संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाली प्रथम भारतीय गायिका और जन सेवा के लिए मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त करने वाली प्रथम भारतीय संगीतकार थीं।

सरोजिनी नायडु ने उन्हें 'भारत कोकिला' और लता मंगेशकर ने उन्हें "तपस्विनी" कहा जबकि उस्ताद बड़े गुलाम अली खान ने उन्हें "सुस्वरलक्ष्मी सुब्बुलक्ष्मी" के रूप में वर्णित किया। संयुक्त राष्ट्र संघ के अतिरिक्त उन्होंने एडिनबर्ग अंतर्राष्ट्रीय समारोह में और रानी एलिजाबेथ - II के लिए रॉयल अल्बर्ट हॉल, लंदन में कार्यक्रम प्रस्तुत किया। वह अधिकांशत: तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और हिन्दी में मीरा भजन गाती थीं।

कई दशकों से दक्षिण भारतीय घरों में लोगों के लिए यह सामान्य प्रचलन है कि वे एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी द्वारा गाई गई जगदगुरू आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित लोकप्रिय स्तोत्र भजगोविन्दम्, विष्णु सहस्त्रनाम और श्री वेंकटेश्वर सुप्रभातम् और अन्य स्तोत्र से अपनी सुबह की शुरूआत करते हैं। उनका वेंकटेश्वर सुप्रभातम् पूजा पद्धति के अंश के रूप में तिरूमाला मंदिर में प्रतिदिन बजाया जाता है।

उन्होंने अन्नानमाचार्य कृतियों को लोकप्रिय बनाने में भी महान योगदान दिया।

उन्होंने 200 से अधिक धर्मार्थ संगीत कार्यक्रम भी किए और संगीत से अर्जित रॉयल्टी तिरुमाला मंदिर में दान कर दी।

मैं प्रतिष्ठित एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी जो अपने संगीत की अमर विरासत के द्वारा जीवित हैं, के संबंध में प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए सम्मानित महसूस करता हूँ।

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