19 दिसंबर, 2017 को नई दिल्ली में राष्ट्र निर्माण में अल्पसंख्यक विषय पर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के दसवें वार्षिक व्याख्यान में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

नई दिल्ली | दिसम्बर 19, 2017

"राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के 'राष्ट्र निर्माण में अल्पसंख्यक' विषय पर दसवां वार्षिक व्याख्यान देते हुए मुझे खुशी हो रही है।'

हमने सत्तर साल पहले अपने राष्ट्र की नींव रखी है और अपने संविधान द्वारा प्रदत्त चार महत्वपूर्ण स्तंभों - न्याय, स्वतंत्रता, समता और बहुता की बुनियाद पर भारत का निरंतर निर्माण कर रहे हैं। इन स्तंभों की मजबूती ही हमारे द्वारा बनाए जा रहे भव्य भारत जैसी महारचना की शक्ति को सुनिश्चित करती है।

जैसा कि डा. अम्बेडकर ने 1949 में प्रथम संविधान सभा के अपने समापन भाषण में उल्लेख किया है, "राजनैतिक लोकतंत्र तब तक नहीं बनी रह सकती है, जब तक कि उसकी बुनियाद में सामाजिक लोकतंत्र न हो। इसका आशय ऐसी जीवनशैली से है, जो स्वाधीनता, समानता और भाईचारे को जीवन शैली मानता है।"

डा. अम्बेडकर ने हमें "राष्ट्र के रूप में विकसित होने की आवश्यकता को महसूस करने और उस लक्ष्य की प्राप्ति के निहित साधनों पर गंभीरता के साथ विचार करने" का आह्वान किया था। यह विगत सात दशकों से भी ज्यादा समय तक के लिए सरकारों के लिए प्रेरणा रहा है। हमने इन चारों स्तंभों को मजबूत करने के प्रयास किए हैं और एक 'समावेशी' राष्ट्र निर्मित करने का प्रयास करके सामाजिक लोकतंत्र के रूप में उभरे हैं। हम मानते हैं कि हमारे देश की विविध धर्म, विविध भाषाएं, विविध जातियां, विविध आदिवासी समूह हैं। तथापि, सहस्राब्दियों से हमारी साझी समृद्ध विरासत, राजनैतिक स्वधीनता के लिए एक साझा संघर्ष रहा है और 1947 से हमने एक साझी नियति का अनुगमन करने का फैसला किया है।

हमने माना है कि हमें एक राष्ट्र के रूप में बहुलवाद, समावेशन और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का अवधारणा को अपने शासन की आधारशिला बनानी होगी। हमारी संविधान निर्माताओं ने हमें यह व्यापक दृष्टिकोण प्रदान किया है कि हमारे राष्ट्र का स्वरूप कैसा होना चाहिए। इसे मूर्तरूप प्रदान करने के क्रम में हमने विगत सत्तर वर्षों के दौरान कानून बनाए हैं, संस्थाओं का गठन किया है और सामाजिक लोकतंत्र के स्वरूप में और ज्यादा सुधार लाने के लिए लगातार प्रयास किए हैं।

इन प्रयासों का एक पहलू अपने देश की विविधता को सम्मान, सुरक्षा, संरक्षा प्रदान करना और इसका आनंद उठाना है।

हमारे संविधान में ऐसे अनेक अनुच्छेद हैं, जो आधारभूत स्वाधीनता की गारंटी देते हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को सार्वजनिक शांति व्यवस्था और नैतिकता के दायरे में रहते हुए धर्म का पालन करने और मानने का अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 29 और 30 में ऐसे उपबंध निहित हैं जो शिक्षा, भाषा और संस्कृति के संबंध में अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा करते हैं।

1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना संवैधानिक सुरक्षा-उपायों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए एक संस्थागत तंत्र के रूप में की गई थी। आयोग को यह अधिदेशित है कि वह अल्पसंख्यकों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए समुचित उपाय सुझाए और उनकी रूपरेखा तैयार करे। इस अंतर्निहित विचार का लक्ष्य जनसंख्या के उन समूहों तक पहुंचना है या जिनकी बात, हो सकता है कि इसलिए न सुनी जा पाती हो क्योंकि उस समूह विशेष के सदस्यों की संख्या काफी कम है। राष्ट्रीय विकास की दिशा में यह आवश्यक माना गया कि इन समूहों की आवश्यकताओं और अभिलाषाओं के साथ-साथ उनके अधिकार और स्वाधीनता राष्ट्रीय चर्चा का विषय होना चाहिए। आयोग का समावेशी विकास संबंधी मूलभूत सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि राजनैतिक लोकतंत्र के लाभ उन लोगों तक भी पहुंचे जिनके मुख्यधारा से छूट जाने की संभावना है। सबसे दुर्बल, सबसे दूर वाले और सबसे साधारण व्यक्ति का सशक्तिकरण ही 'अंत्योदय' का सिद्धांत है।

एक ओर जहां राज्य अल्पसंख्यक समूहों की समस्याओं और चिंताओं का निराकरण करने और सामाजिक-आर्थिक विकास के क्षेत्र में उनके प्रयासों को समर्थन देने की दिशा में प्रयासरत है, वहीं अल्पसंख्यक समूह भी भारत के निर्माण की दिशा में अग्रणी रहे हैं। वास्तव में, उन्होंने एक सशक्त, उद्योगीकृत भारत, सुदृढ़ और सुरक्षित भारत तथा कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में असाधारण योगदान दिया है।

जैसा कि मैंने उल्लेख किया कि हमारा स्वाधीनता संग्राम का साझा इतिहास रहा है और उस संघर्ष के दौरान हमने एक नई भारतीय पहचान गढ़ी थी। इस स्वाधीनता गाथा में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हकीम अजमल खान और रफी अहमद किदवई, खान अब्दुल गफ्फार खान और बरकतुल्लाह जैसे महान व्यक्तियों के नाम शामिल हैं। हमारे पास शहीद भगत सिंह और भीकाजी कामा, डा. दादाभाई नौरोजी और सर फिरोजशाह मेहता जैसे प्रेरक व्यक्तित्व हैं।

हम सर सैयद अहमद खान जैसे प्रतिष्ठित शिक्षाविदों द्वारा किए गए भावी पीढ़ियों को रास्ता दिखाने वाले कार्यों को भी स्मरण करते हैं, जिन्हें गांधीजी महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की स्थापना के संदर्भ में "शिक्षा का पैगंबर" कहा करते थे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, हमदर्द विश्वविद्यालय,सेंट स्टीफेंस कॉलेज, सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज, लोयोला कॉलेज और स्टेला मेरिस कॉलेज जैसे अनेक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के उदाहरण हमारे समक्ष मौजूद हैं।

भारत के 14 राष्ट्रपतियों में से पांच राष्ट्रपति अर्थात् डा. ज़ाकिर हुसैन, मोहम्मद हिदायतुल्लाह, फख़रुद्दीन अली अहमद, ज्ञानी जैल सिंह और डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम अल्पसंख्यक समुदाय से थे। भारत के तेरह में से तीन उपराष्ट्रपति अर्थात् डा. ज़ाकिर हुसैन, मोहम्मद हिदायतुल्ला, मोहम्मद हामिद अंसारी अल्पसंख्यक समुदायों से थे।

भारत के 'मिसाइल पुरुष' और 'जनता के राष्ट्रपति' के रूप में विख्यात डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भारत के अति सम्मानित वैज्ञानिकों में से हैं और भारत के इंटीग्रेटेड गाइडिड मिसाइल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के जनक हैं।

चिकित्सा का क्षेत्र एक ऐसा दूसरा क्षेत्र हैं, जिसमें अल्पसंख्यक समूहों ने भारत की आम जनता के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अनेक अंतर्राष्ट्रीय मान्यताप्राप्त संस्थाओं में जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय, 1893 में डा. एडिथ ब्राउन द्वारा स्थापित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल, लुधियाना, 1895 में डा. इडा स्कडर के रोड़साइड क्लीनिक से विकसित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल, वेल्लोर शामिल है।

भारत में श्वेत क्रांति के जनक डा. वर्गीश कुरियन और जमशेदजी टाटा, जो कई तरह से भारतीय औद्योगिक विकास के जनक थे, का संबंध अल्पसंख्यक समूहों से था। सबसे पहले पारसियों ने ही बॉम्बे में आधुनिक थियेटर की स्थापना की थी। भारत के जहाज निर्माण और इस्पात उद्योग के तीव्र विकास का श्रेय मुख्यतया 'वाडिया' और 'टाटा' परिवार को ही जाता है।

सिख समुदाय ने भारत की रक्षा क्षमता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, क्योंकि भारतीय सुरक्षा बलों में 20 प्रतिशत सिख हैं। यही वह समूह है जिसने हरित क्रांति को संभव बनाया और अंतत: भारत को खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया।

विभिन्न क्षेत्रों के महान पथप्रदर्शकों में भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक होमी जहांगीर भाभा और 1971 में पाकिस्तान के विरुद्ध भारतीय बलों का नेतृत्व करेन वाले फील्ड मार्शल सैम मानकेशॅ का नाम शुमार है। नानी पालकीवाला, सोली सारोजबी, नरीमन जैसी कानून के क्षेत्र में प्रसद्धि कई विभूतियां भी अल्पसंख्यक समुदायों से हैं।

हमारा देश विभिन्न समूहों द्वारा कला और वास्तुकला, संगीत और नृत्य के क्षेत्र में योगदान के कारण ही सम्पन्न है। मंदिरों, मस्जिदों, गिरिजाघरों, विहारों, स्तूपों, गुरुद्वारों और मठों से सुसज्जित हमारी विरासत मानवीय सर्वेाच्चता की मनमोहन छवि प्रस्तुत करती है।

राष्ट्र निर्माण में अल्पसंख्यक समूहों की भूमिका अभूतपूर्व रही है। वे ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि उन्होंने भारतीयों के रूप में अपनी पहचान को ज्यादा महत्व दिया। धर्म, भाषा, जाति, पंथ, लिंग और अन्य अनेक पहलुओं पर आधारित हमारी विविध पहचान हैं। यदि हम इन्हें हाशिए पर धकेलकर गर्व से यह कह सकें कि हम सर्वप्रथम भारतीय हैं, तब जाकर सही अर्थों में राष्ट्रीय विकास होगा। यदि अन्य पहचान विद्यमान हैं, तो हमारे बीच एक मजबूत अवरोध निर्मित हो चुका है। इन संकीर्ण घरेलू दीवारों को ध्वस्त किए जाने की आवश्कयता है, जैसा कि गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने हमें स्मरण कराया है। जाति, पंथ, धर्म और भाषा के बावजूद हम सर्वप्रथम भारतीय हैं।

तथापि, इसका यह आशय नहीं है कि हमें अपनी जड़ों, अपनी व्यक्तिगत भाषा और आस्थाओं का परित्याग कर देना चाहिए। हमें उनका पालन-पोषण करना चाहिए, क्योंकि वे हमारा पालन-पोषण करती हैं। भारतीयों की नजर में विविधता के प्रति एक स्वाभाविक सम्मान की भावना विद्यमान है। हम मानते हैं कि एक राष्ट्र हैं, क्योंकि जो बंधन हमें बांधे हुए हैं वह हमारी विभिन्नताओं से कहीं ज्यादा मजबूत है। तथापि इन विभिन्नताओं को हम कभी-कभी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, जिससे सामाजिक एकजुटता और राष्ट्रीय विकास की धारा क्षीण होती है। राष्ट्रीय हितों को एक बार विकास एजेंडे के शीर्ष पर रखते ही अन्य कारक कम महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जैसा कि मैंने उल्लेख किया कि स्वप्नदृष्टा और निष्ठावान व्यक्तियों ने बिल्कुल ऐसा ही किया है। उनमें अपने देश के लिए कुछ बड़ा स्वप्न देखने का साहस था। जिस देश से वे प्यार करते थे उसके लिए उन्होंने अमिट छाप छोड़ी। यही वह भावनात्मक बंधन है, जिसे और प्रगाढ़ किए जाने की आवश्यकता है।

हमारा लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और हमारे संविधान में हमारे राष्ट्र का अविश्वसनीय रूप से समावेशी दृष्टिकोण निहित है।

इस सर्वहितकारी और सहभाजनकारी दृष्टिकोण को सभी समूहों, भले ही कुछ समूह छोटे ही क्यों न हों, को राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगाकर साकार करना हमारा कर्तव्य है।

सभी को शिक्षण, धनार्जन और सक्रिय नागरिकों के रूप में उभरने के लिए समान अवसर प्रदान किया जाना अति महत्वपूर्ण है।

हमें आत्म-परीक्षण करना चाहिए और विभेदकारी, विध्वंसक, अधोगति की ओर ले जाने वाली प्रवृत्तियों और विपथनों को पहचानना होगा। हमें धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ मिलकर इन पर विजय प्राप्त करनी होगी। आंतरिक तनाव उत्पादक नहीं होते हैं।

हमारे पास सौहार्दपूर्ण तरीके से एक साथ रहने और एक साथ विकास करने की समझ होनी चाहिए।

हमें अपने समृद्ध मानव संसाधनों को उत्पादनकारी लक्ष्य प्राप्ति के उद्देश्य की ओर अर्थात् राष्ट्र निर्माण की दिशा में लगाना होगा।

गरिमापूर्ण विकास हमारे राष्ट्र का एजेंडा होना चाहिए। संसद में केवल विधेयक ला देने मात्र से बहुत सारी चीजें नहीं बदल सकती हैं। हमें राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक कौशल की आवश्यकता है।

ऐसा कोई भी व्यक्ति जो आतंक का रास्ता अपना रहा है, वह कतई इंसान नहीं है। आतंक का कोई भी स्वरूप स्वीकार्य नहीं है।

हम निर्धनतम व्यक्ति के विकास की दृष्टि से सोचते हैं।

भारत में धर्मनिरपेक्षता महज संविधान के कारण सुरक्षित नहीं है। यह तो हमारे डीएनए का हिस्सा है। यह हमें वैदिक काल से ही विरासत के रूप में मिला है।

हमारे देश द्वारा किसी दूसरे देश पर आक्रमण का इतिहास नहीं है। भारत पूरे विश्व का ज्ञान केन्द्र था। हम समरसता के दर्शन पर विश्वास करते हैं। हमें अपनी युवाओं को अपने अतीत के बारे में बताना चाहिए। जब तक कि प्रत्येक व्यक्ति योगदान नहीं करता है, देश समृद्ध नहीं हो सकता है।

मैं राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को उनके प्रशंसनीय कार्य के लिए बधाई देता हूं और उसे समस्त अल्पसंख्यक समूहों तक अपनी पहुंच बनाने और राष्ट्रहित में उनकी सक्रिय संलग्नता, सहभागिता और योगदान संबंधी अनुकूल माहौल बनाने के अविरल प्रयास में सफलता की कामना करता हूं।

जयहिंद।"