19 अप्रैल, 2017 को कांस्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में पी.एच.डी. चैम्बर ऑफ कामर्स एण्ड इंडस्ट्रीज द्वारा वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए भारत को कौशल युक्त बनाना विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी

नई दिल्ली | अप्रैल 19, 2017

वर्ष 2020 तक भारत की 1.3 बिलियन जनसंख्या का लगभग 60 प्रतिशत 15-59 वर्ष के कार्यबल आयु समूह में होगा। इनमें से, 144 मिलियन लोग 18-23 वर्ष के आयु समूह के होंगे। यह भी पूर्वानुमान है कि विकसित देशों में लोगों की आयु बढ़ने से वर्ष 2030 तक लगभग 56 मिलियन कामगारों की कमी होगी।

हम अपनी इस जनसांख्यिकीय बढ़त का फायदा अपनी आबादी को पर्याप्त रूप से कौशल युक्त बनाकर ही ले सकते हैं। हमें यह बात दिमाग में रखने की जरूरत है कि वर्तमान में, भारत में कृतिक बल के 2.3 प्रतिशत को ही औपचारिक कौशल प्रशिक्षण प्राप्त हुआ है जबकि इंग्लैंड में 68% और अमेरिका में 52% को औपचारिक कौशल प्रशिक्षण प्राप्त ही है।

अगर हम अपनी आबादी को गुणवत्ता पूर्ण कौशल प्रदान कर पाने में समर्थ हो पाए तो हम भारत को विश्व का मानव संसाधन शक्ति केंद्र बना सकते हैं। अगर हम इस कार्य में विफल हो जाते हैं तो हमें बेरोजगारी की अभूतपूर्व उच्च दर और इससे जुड़ी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।

मेरे विचार से अपनी आबादी के लिए कौशल सृजन के पर्याप्त अवसर प्रदान करने के कार्य में, हमारे समक्ष तीन प्रमुख चुनौतियां हैं।

प्रथम,गुणवत्ता की चुनौती।.

ऐसा कहा जाता है कि "जो समाज नलसाज़ी जैसे उत्कृष्ट कौशलपूर्ण कार्य को निचले दर्जे का कार्य मानकर हेय दृष्टि से देखता है और दर्शनशास्त्र से संबंधित किसी विषय की सतही जानकारी को भी उत्कृष्ट क्रियाकलाप मानकर झेल लेता है वहां न तो अच्छी नलसाज़ी का कार्य हो पाएगा और न ही सारगर्भित दर्शन का लाभ होगा: न तो इसके पाइपों से जलनिकासी संभव हो पाएगी और न ही यहां विश्वसनीय सिद्धांत पनप पाएंगे।"

अगर भारत को वैश्विक नेता बनना है और वैश्विक घटनाक्रम एवं अर्थव्यवस्था में मुख्य भूमिका निभानी है तो हमें सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता को बढ़ावा देना होगा। हमारे सभी प्रयासों में चाहे वे हमारे प्राथमिक विद्यालय हों अथवा उच्च शिक्षण संस्थाएं, गुणवत्ता को केन्द्रीय स्थान दिया जाना चाहिए । निम्नस्तरीय प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद इन्हीं छात्रों में से कई छात्र विभिन्न विषयों के ऐसे स्नातक बनते हैं जिनके पास अपेक्षित प्रतिभा स्तर और कौशल नहीं होता। इसलिए व्यावसायिक प्रशिक्षण अथवा उच्च शिक्षा में अपनी क्षमताओं एवं गुणवत्ता के स्तर को बढ़ाने से पहले हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने वाली हो।

द्वितीय,चुनौती संख्याबल की है।.

यद्यपि कौशल प्राप्ति के इच्छुक व्यक्तियों की संख्या अत्यधिक बढ़ चुकी है, लेकिन प्रशिक्षकों की भारी कमी है। 24 फरवरी, 2016 को लोकसभा में दिए गए उत्तर में, सरकार ने कहा था कि देश भर में कौशल-विकास कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के लिए 100,000 प्रशिक्षकों की कमी है। ये कमियां कौशल प्रसार में बाधा बनती हैं।

इसके अलावा, अपेक्षित कौशल समुच्चय का स्वरूप अति गतिशील है क्योंकि उद्योग एवं विनिर्माण क्षेत्र के स्वरूप के साथ-साथ सेवा क्षेत्र की मांगों में भी बदलाव आता रहता है। बढ़ते स्वचालन, जो विभिन्न प्रकार के रोजगारों को अप्रासंगिक बना देगा, को देखते हुए, नये एवं उदीयमान कौशल समुच्चयों हेतु नए कामगारों को प्रशिक्षण प्रदान करने के अलावा मौजूदा कागमारों को भी निरंतर नव कौशल प्रदान किए जाने की आवश्यकता है। इससे प्रशिक्षकों के कौशल समुच्चय अप्रचलित हो जायेंगे जब तक कि प्रशिक्षक स्वयं नव कौशल को पुन:सीखने के लिए अग्रसर न हों। प्रतिस्पर्धी बनने और इस दौड़ में बने रहने के लिए हमें न केवल आज की आवश्यकताओं के अनुरूप अपितु कल की आवश्यकताओं के अनुरूप भी कौशल सीखने की जरूरत है।

तृतीय चुनौती दृष्टिकोण की है।.

व्यवसायिक प्रशिक्षण के बारे में हम लोगों की आमतौर पर समझ बहुत कम है। व्यावसायिक कौशल की प्राप्ति को अभी भी अन्तिम साधन माना जाता है अथवा इसे उन लोगों का विकल्प माना जाता है जो औपचारिक शैक्षणिक व्यवस्था में आगे नहीं बढ़ पाए हों। यह मानसिक बाधा उद्योगों की आवश्यकता और वर्तमान में कौशल उपलब्धता के बीच के अन्तर को और अधिक बढ़ा देती है।

किसी भी समाज को विविध कौशलों की जरूरत होती है। समाज को इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और डाक्टरों की जरूरत के साथ-साथ सफाई कर्मचारियों या नलसाज़ो अथवा इलेक्ट्रिशियनों की भी जरूरत होती है। हमें बड़ी संख्या में मौजूद अपनी युवा प्रतिभाओं को निखारने की जरूरत है जो शिक्षित और ज्ञान के क्षेत्र में नई-नई महत्वपूर्ण खोजों की जानकारी रखती हों। किन्तु, हमें उन लाखों-करोड़ों लोगों को जो अभी भी औपचारिक उच्च शिक्षा की सीमा से बाहर हैं, को भी समर्थ बनाने की जरूरत है। यथोचित रूप से उन्हें कौशल प्रदान करके हम उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध करवा कर उनको रचनात्मक कार्यों में लगा सकते हैं। इसलिए, अपने युवा वर्ग को श्रम की गरिमा से शिक्षित करना महत्वपूर्ण है तथा व्यवसायिक शिक्षा प्राप्ति के इच्छुकों की आकांक्षाओं और उद्योगों की अपेक्षाओं के बीच वेतन के साथ-साथ कार्य संबंधी रूपरेखा की दृष्टि से तालमेल बिठाना आवश्यक है।

डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया और स्मार्ट सिटिज आदि जैसी सरकार की पहलों के सफलतापूर्वक कार्यान्वयन के लिए कुशल कामगार आवश्यक हैं, क्योंकि केवल कुशल कामगार ही इन योजनाओं द्वारा सृजित हो रहे अधिकांश अवसरों का लाभ उठा सकते हैं। हमें नियोक्ताओं को सस्ते, अकुशल या निम्नस्तरीय कौशल प्राप्त कामगारों से काम करवाने के बजाय कुशल कृतिक बल को नियुक्त करने के लिए भी राजी करने की जरूरत है, वह भी उस स्थिति में जब 75 प्रतिशत भारतीय व्यवसायों के समक्ष सबसे पहली चुनौती तकनीकी या विशिष्ट कौशल प्राप्त कामगारों की कमी है। हमारा दृष्टिकोण कौशल अन्तरों को पाटने और युवा वर्ग की बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने का होना चाहिए।

II

भारत सरकार अपने लोगों को कौशल प्रशिक्षण दिए जाने की आवश्यकता के प्रति सचेत है। प्रधान मंत्री ने 15 अगस्त, 2014 को लाल किले से दिए गए संदेश में कहा था कि "कौशल प्रदान करना एक बेहतर भारत का निर्माण करना है। यदि हमें भारत को विकास की ओर ले जाना है, तो कौशल विकास हमारा मिशन होना चाहिए।"”

वर्ष 2009 से लेकर वर्ष 2014 के बीच अन्य के साथ-साथ, क्षेत्र कौशल परिषदों का गठन तथा राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढांचे के निर्माण जैसी पहलें की गईं। राष्ट्रीय कौशल विकास और उद्यमिता योजना संबंधी राष्ट्रीय नीति, 2015 में इन पहलों को आगे बढ़ाया गया। नई पहलों जैसे प्रधान मंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) तथा अति महत्वाकांक्षी 'स्किल इंडिया' पहल, जिसका उद्देश्य 2020 तक 30 करोड़ो लोगों को प्रशिक्षित किया जाना है, की शुरूआत ऐसे प्रयास हैं जिनकी अत्यधिक आवश्यकता थी। हालांकि इन पहलों में सफल होने के लिए एक समावेशी दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी, जिसमें उन लगभग 800 मिलियन लोगों पर विशेष ध्यान देना होगा, जो विकास क्रम के निचले स्तर पर ही बने हुए हैं।

औद्योगिक क्षेत्र की आवश्यकताओं के गतिशील स्वरूप के मद्देनजर हमारे लोगों को समान गति और गुणवत्ता के साथ कौशल संपन्न बनाने की दृष्टि से प्रासंगिक और प्रभावी बनाए रखने के लिए नीतियों की लगातार समीक्षा करने की आवश्यकता पड़ेगी।

देश में कौशल की कमी को दूर करने के लिए पीएचडी चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्रीज कौशल विकास संबंधी अवसंरचना को बढ़ावा देने में सक्रिय रहा है। इसने बुनियादी स्तर पर कार्य किया है और अपने मजबूत राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का लाभ उठाते हुए इस दिशा में महत्वपूर्ण पैरवीकार की भूमिका निभाई है।

मौजूदा संगोष्ठी भारत को कौशल संपन्न बनाने की दिशा में उठाया गया एक सकारात्मक कदम है। मैं आपको सफल विचार मंथन के लिए शुभकामानाएं देता हूँ।
जय हिंद।