18 जनवरी, 2017 को आई.आई.सी. नई दिल्ली में ईरान और भारतीय उप-महाद्वीप के बीच सांस्कृतिक समानताएं: वैश्वीकरण के युग में स्वदेशी सांस्कृतिक विखण्डन संबंधी संगोष्ठी के शुभारम्भ पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री मो. हामिद अंसारी द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | जनवरी 18, 2017

वैश्वीकरण के युग में ईरान और भारत

मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मैं आज की संगोष्ठी के विषय के अभिप्राय और जटिलता से किंचित हैरान हूँ। इसका प्रथम अंश विशेषज्ञों एवं विद्वानों की किसी भी सभा के लिए अधिक व्यापक होना चाहिए; इसमें वैश्वीकरण जोड़ देने से यह विषय इसमें भाग लेने वालों के लिए ज्यादा जटिल बन जाता है। हालांकि इससे इसकी प्रासंगिकता से इंकार नहीं किया जा सकता।

मैं अपनी बात वैश्वीकरण से आरंभ करता हूँ चूंकि इसने अधिकांश उद्यमों तक अपना विस्तार करने के अलावा समस्त संसार की सांस्कृतिक धाराओं के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों को उजागर किया है।

वैश्वीकरण को दो अलग-अलग तरीकों से देखा जाता है: सकारात्मक अर्थ में इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था में एकीकरण की प्रक्रिया कहा जा सकता है, तथा मानदण्डों के तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के तेजी से एकीकृत होने के आधार पर विकास की रणनीति का निर्धारण करना है। इस परिघटना के राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम भी हैं। अध्ययनों ने यह दर्शाया है कि इससे "विश्व में असंतुलन की स्थिति पैदा होते है जो नैतिक रूप से अस्वीकार्य हैं और जिनसे व्यावहारिक रूप से सतत विकास नहीं हो पाता" और असंगत विकास से समकालीन वैश्विक व्यवस्था में केवल असमानता ही पैदा होगी।" सार्वभौमिक रूप से साझा मूल्यों (मानव अधिकारों एवं व्यक्तिगत गरिमा सहित) की वांछनीयता एवं वास्तविकता को इस संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।

वैश्वीकरण के अन्य आयाम भी समान रूप से प्रासंगिक हैं। समाजशास्त्रियों के लिए यह आधुनिकता से, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विचारकों के लिए वैश्विक शासन से, तथा वैज्ञानिकों के लिए उन प्रौद्योगिकियों एवं माध्यमों से जुड़ा हुआ है जिन्होंने मानवीय सम्प्रेषण और सम्पर्क को गुणात्मक रूप से बदल दिया है। इसने, लोगों और संस्कृतियों के बीच परस्पर संवाद की पेचीदा श्रृंखला को भी उत्पन्न किया है जिसने सीमाओं को तोड़ कर रख दिया है तथा सांस्कृतिक अपमिश्रण', न कि परिशुद्धता का मार्ग प्रशस्त किया है।

राष्ट्र-राज्य, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं और राष्ट्रीय संस्कृतियों की पारम्परिक अवधारणाओं के क्षरण के साथ-साथ यह प्रक्रिया चलती रहती है। इसका तात्पर्य उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण, व्यापार हेतु अवसर प्रदान करने की क्षमता एवं व्यापारिक क्रियाकलापों को नियंत्रित करना, व्यापारिक क्रिया कलापों पर कर एवं शुल्क लगाने की शक्ति, संचार माध्यमों पर नियंत्रण, सांस्कृतिक पहचान एवं जन संस्कृति विकसित करने का सामर्थ्य, तथा नियम निर्धारण की क्षमता और अन्य राष्ट्र राज्यों द्वारा बनाए गए नियमों के ढ़ांचे से बाहर रहने की शक्ति से है।

सामान्यत: संस्कृति का अर्थ व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयासों द्वारा कई पीढियों तक लोगों के समूह द्वारा संचित ज्ञान निधि, अनुभवों, मान्यताओं, मूल्यों, मनोभावों, अर्थों, पदक्रमों, धर्म, समय संबंधी धारणाओं, भूमिकाओं, स्थान विषयक संबंधों, ब्रह्माण्ड की अवधारणाओं, और अधिग्रहित की गई मूर्त वस्तुओं एवं सम्पत्तियों से समझा जाता है।

संस्कृतियों को उन समाजों से अलग नहीं किया जा सकता जहां वे उत्पन्न हुई है भले ही उनका उत्थान और कभी-कभी पतन हुआ हो तथा अन्य संस्कृतियों द्वारा समावेशित अथवा पूर्णत: मिट गई हो।

इनमें विविधता को देखते हुए, सांस्कृतिक वैश्वीकरण को सांस्कृतिक बहुलता के रूप में देखा जाना चाहिए। इसे और बेहतर तरीके से समझने के लिए, हमें "विभिन्न संदर्भों में ही वैश्विक और स्थानीय रूप में विभेद करने पर ध्यान" केन्द्रित करना होगा।1

वैश्विक सांस्कृतिक प्रवाह के कई रूप हो सकते हैं, जैसे लोगों का प्रवाह (लोगों का एक से दूसरे स्थान पर आवागमन), तकनीकी प्रवाह (प्रौद्योगिकी और उसके उत्पादों का राष्ट्रीय सीमाओं के पार प्रवाह) वित्तीय प्रवाह (धन का प्रवाह), मीडिया प्रवाह (मीडिया, टेलीविजन, फिल्मों के माध्यम से सूचनाओं का प्रवाह) और विचार प्रवाह (विचारों और विचारधाराओं का प्रवाह)।2

इनकी सामूहिक प्रभावकारिता का कुछ प्रमाण बड़ी आईटी कंपनियों जैसे फेसबुक, ट्विटर, अमेजॉन के मामले में देखा जा सकता है। ये कंपनियां तेजी से ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रही हैं जहां उन्होंने बाजार के लिए अपने मंच उपलब्ध कराने की क्षमता और उत्पादन को नियंत्रित करने के साधन विकसित कर लिए है। अब वे व्यवसाय के लिए यथार्थ में अपने मंच उपलब्ध कराने के एवज में विभिन्न व्यावसायिक इकाइयों से शुल्क या लेवी लेने लगे हैं। वे लोकप्रिय संस्कृतियों को आकार दे रहे हैं और भौगोलिक सीमाओं से बंधे नहीं है। उनका संचार पर नियंत्रण है और विशिष्ट विचारों, सूचनाओं और विश्लेषणों को बढ़ावा देने के लिए उनके पास संभावनाएं और प्रौद्योगिकी मौजूद है। इन कंपनियों की पहुंच विभिन्न देशों की सीमाओं के पार है। वे हर स्थान पर फैल चुकी है, इसके बावजूद प्राय: स्थानीय कानूनों से शासित नहीं होती।

यही बात संगीत के संबंध में भी कही जा सकती है। कहा जा चुका है कि कला की कोई और विद्या वैश्वीकरण को उतना स्वयं में समेटे नहीं है जितना कि एकमात्र संगीत विद्या। पूर्ववर्ती युग में, संगीत ने जहां औपनिवेशिक विस्तार के एक साधन के रूप में भी काम किया, वहीं प्रभावित समाजों के विरोध और सांस्कृतिक पहचान को भी एक आकार देने का भी कार्य किया। एक प्रेक्षक ने टिप्पणी की है कि व्यापक रूप से यह पाया गया है "पूरबी संगीत के पश्चिमीकरण' के साथ-साथ 'पश्चिमी संगीत का पूरबीकरण भी हुआ है।”

फिल्मों के संबंध में भी ये अनिवार्यताएं कुछ अलग नहीं है। मनोरंजन के वैश्वीकरण पर आई मैक्स कॉरपोरेशन के प्रमुख की पिछले वर्ष आई रिपोर्ट में निष्कर्ष था कि चूंकि फिल्मों को वैश्विक वाणिज्यिक सफलता का 70 प्रतिशत सं. रा. अमरीका के बाहर से प्राप्त होता है, इसलिए अभिव्यक्ति की शैली ऐसी हो जो विश्व भर के दर्शकों को पसंद आए, इसमें आशंका व्यक्त की गई थी कि "वैश्वीकरण से होने वाले परिवर्तनों से हॉलीवुड द्वारा परंपरागत रूप से प्रबंधित 'सॉफ्ट पावर' पर नकारात्मक असर पड़ा है"।

निर्धारित यह करना है इन पांच सांस्कृतिक प्रवाहों और मुख्यत: अंतिम दो प्रवाहों ने किस सीमा तक ईरान और भारतीय उपमहाद्वीप के देशों की सांस्कृतिक पहचान और उनके एक-दूसरे के साथ आपसी व्यवहार पर किस सीमा तक प्रभाव डाला है।

II

जवाहरलाल नेहरु ने ईरानियों और भारतीयों को बचपन में बिछड़े हुए ऐसे भाइयों के रूप में वर्णित किया जिन्होंने संगीत की समान धुन की स्मृति के माध्यम से एक-दूसरे को पहचान लिया। भाषाविदों ने इसे विश्वसनीयता प्रदान की उन्होंने इस बात के साक्ष्य प्रस्तुत किए कि अवेस्ता की भाषा और वैदिक संस्कृत की भाषा भगिनी भाषाएं हैं जिनकी उत्पत्ति भारत-यूरोपीय समूह की प्राचीन भारतीय-आर्य भाषा से हुई है।4

मैं न तो भाषाविद् हूँ और न ही ईरान के पठार से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी, मध्य और पूर्वी मैदानों तक फैले भौगोलिक क्षेत्र जहाँ भाषागत संबद्धताएं और समानताएं पायी गयी है तथा जो संस्कृति और साहित्य के विभिन्न पहलुओं में परिलक्षित होती है; के प्राचीन अतीत का इतिहासकार हूँ। विद्वानों द्वारा इनके संबंध में बहुत कुछ लिखा गया है और निसंदेह इस सेमिनार में इस पर चर्चा होगी।

ईरान और भारत दोनों देशों के पास ऐसी सभ्यताओं की विरासत है जिनका उद्भव अत्यंत प्राचीन है। भौगोलिक रूप से एक-दूसरे के समीप रहने के कारण इन दोनों देशों से लोग अनवरत आते-जाते रहे। अनिवार्य रूप से, इसकी परिणति आस्थाओं, सांस्कृतिक प्रथाओं के आदान-प्रदान और विभिन्न प्रकार की साझा जीवन शैलियों में हुई।

इतिहास भिन्न-भिन्न कालों में इन भौगोलिक क्षेत्रों के बीच हुए राजनीतिक आदान-प्रदान के लेखे-जोखे का अध्ययन भू-राजनीति और शासन कला की दृष्टि से रोचक है। तथापि अभी इस पर चर्चा करने का अवसर नहीं है।.

भारत के मामले में लोगों के आवागमन और विचारों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया को कवि रघुपति राय फिराक ने सार-गर्भित ढंग से यूं वर्णित किया है:

'सर जमीन-ए-हिंद पर अक्वाम-ए-आलम के फिराक़
कारवां आते गए हिन्दोस्तां बनता गया।'

Almost a century ago, Dr. Tara Chand had observed that “Indian culture is synthetic in character. It comprehends ideas of different orders. It embraces in its orbit beliefs, customs, rites, institutions, arts, religions and philosophies belonging to strata of society in different stages of development. It eternally seeks to find a unity for the heterogeneous elements which make up its totality. At worst its attempts end in mechanical juxtaposition, at best they succeed in evolving an organic system.”5

लगभग एक शताब्दी पूर्व, ताराचंद ने लिखा था कि "भारतीय संस्कृति की प्रकृति समन्वयकारी है। यह विभिन्न प्रकार के विचारों को स्वयं में समेटे हुए है। यह विकास के विभिन्न चरणों में समाज के विभिन्न वर्गों के विश्वासों, रिवाजों, रीतियों, संस्थाओं, कलाओं, धर्मों और दशनो को अपना लेती है। यह विषभां तत्वों की एकता स्थापित करने का सदैव प्रयास करती है जो इसे पूर्ण बनाते हैं। इन प्रयासों को सबसे बदतर परिणति कृत्रिम निकटता में होती है और अपने सर्वोत्कृष्ट रूप में ये एक संगठित चेतन तंत्र विकसित करने में सफल हो जाते हैं।"6

एक समकलीन इतिहासकार ने इस परिणति का विश्लेषण इस प्रकार किया है: "सांस्कृतिक सृजन - संगीत, नाटक, चित्रकला, स्थापत्य आदि और धर्म के लगभग सभी क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के प्रभावों ने अपना असर छोड़ा है और इन सभी को एक समावेशी चरित्र प्रदान किया है। परिणामस्वरूप, एतिहासिक रूप से भारत का विकास एक बहुरंगी कृति के रूप में हुआ, न कि एक ही स्रोत से प्रेरित सांस्कृतिक परंपराओं की अभिव्यक्ति के रूप में।" और यह प्रक्रिया राष्ट्रीय स्तर तक ही सीमित नहीं थी और इसे प्रत्येक क्षेत्र के भीतर भी देखा जा सकता है। इसे हमारे दैनंदिन जीवन के सभी पहलुओं में देखा जा सकता है। अत: ऐसा विश्वास करने के पर्याप्त कारण हैं कि भूमंडलीकरण का वर्तमान ज्वार भारत की सांस्कृतिक पहचान को मिटा नहीं पाएगा, अपितु भूमंडलीकृत संस्कृति को भारतीय आयाम भी प्रदान करेगा।

फारसी भाषा सहस्त्राब्दियों से विस्तृत भारतीय भाषाई क्षेत्र का अंग रही है। प्राचीन समय से चले आ रहे भाषाई अपनापन बाद तक बरकरार रहे और ऐसे संबंध गहन संपर्क से और प्रगाढ़ हुए। "शाहनामा" में संस्कृत मूल के शब्द पाये जाते हैं। मौलाना आज़ाद का मानना था कि कुरान में उल्लिखित धुल करनैन महान साइरस था। प्रोफेसर जुआन कोल का मत है कि मुगल-सफवी काल के चरमोत्कर्ष के समय ईरान की तुलना में भारत में फारसी पढ़ने वालों की संख्या सात गुनी अधिक थी। कंद-ए-फारसी सचमुच भारत के सभी भागों में पहुंची और इसने हमारी अनेक भाषाओं पर अपना प्रभाव डाला। विश्व भर में फारसी भाषा का प्रथम समाचार पत्र 1823 में कलकत्ता में ब्रह्म समाज के राजा राम मोहन राय द्वारा प्रकाशित किया गया।

ईरान के मामले में सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न पर अतीत में भिन्न-भिन्न समय पर विचार किया गया है। हाल में इस विषय पर दार्शनिक अब्दुल करीम सख्श ने अनेक स्रोतों के विषय पर अपने विचार व्यक्त किए और लिखा:

  • "तीन संस्कृतियां जो हमारी साझी विरासत हैं - वे राष्ट्रीय, धार्मिक और पाश्चात्य मूल की हैं।"
  • जब तक हम पहचान (सांस्कृतिक पहचान सहित) को गत्यात्मक और विकासशील विषय के रूप में नहीं देखते हैं, हमें प्रामाणिकता से संबंधित इनमें से किसी प्रश्न के उत्तर नहीं प्राप्त नहीं होंगे" क्योंकि "हम अपनी जातीय और इस्लामी संस्कृति को अंतिम पड़ाव नहीं मानते हैं बल्कि हम इसे प्रस्थान बिंदु मानते हैं।"
  • दृढ़ सांस्कृतिक आत्मसाती तंत्र के अभाव और इस गलत अवधारणा के कारण हमें अन्य संस्कृति का भय सताता है कि प्रत्येक संस्कृति एक अभाज्य एकाश्म है, जिसके एक हिस्से को स्वीकार करने का अर्थ है उसे पूर्ण रूप से स्वीकार करना"।7

ऐतिहासिक मायने में और विशेष रूप से इतिहास के मध्यकाल में "फारसी भाषा के प्रभाव ने मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में ईरान के प्रभाव के प्रसार में केन्द्रीय भूमिका निभायी। प्रोफेसर हामिद डाबशी ने उल्लेख किया है कि "फारसी साहित्यिक मानवतावाद ... संपूर्ण सभ्यता के आत्मकथात्मक सौंदर्यशास्त्रीय पाठ्य सामग्री के रूप में उभरा जिसकी सुनिश्चित ऐतिहासिकता इसकी व्यंजनापूर्ण भाषा में गुथी हुई थी।' उन्होंने मध्य एशिया और दक्षिणी एशिया में इस प्रभाव की प्रक्रिया का पता लगाया है।

साहित्य, फिल्म और कला सभी जगह अपने समय की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को प्रतिबिम्बित करते हैं। ईरान के संबंध में सामाजिक उथल-पुथल ने सीमित रूप से सांस्कृतिक भाव विरेचन का प्रयास किया। कुछ वर्ष पूर्व दो भारतीय विद्वानों ने इनका आकलन किया और यह पाया कि "क्रांति के उपरांत ईरान लेखक, कवि और कलाकार ऐसी विधाओं और अभिव्यक्तियों जिनमें मात्र 'वैयक्तिक', पूर्णत: व्यक्तिनिष्ठता को मानवतावाद में रूपांतरित कर दिया गया है, के माध्यम से राजनीतिक परिस्थितियों की बारीकियों को संप्रेषित करने में समर्थ रहे हैं।" उन्होंने यह भी कहा कि "शायद ईरान के इतिहास में साहित्यक/कलात्मक अभिव्यक्ति देश में सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों से इतनी जुड़ी हुई कभी नहीं रही है जितना कि पिछले पच्चीस वर्षों में रही है। प्रारंभ में तुलनात्मक निष्क्रयता की अवधि के पश्चात् ईरान के लोग कलात्मक और साहित्यिक गतिविधियों में विपुल रूप से संलग्न रहे हैं। राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के प्रत्येक चरण के साथ उनकी अभिव्यक्ति, तकनीक और शैली बदलती गई है, उनकी कार्य-रचनाओं में इंद्रधनुष के सभी रंगों का प्रतिनिधित्व है।"10

III

अंतत: यह कहना उचित होगा कि ईरान और भारत दोनों देशों ने आधुनिकता की चुनौतियों के प्रति अपने-अपने तरीके से व्यवहार किया है। हमारे भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहे विश्व में उनके भाषा वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संबंध क्या रूप लेंगे? प्रथम दृष्टया भारतीय प्रवृत्ति निर्बाध सामंजस्य की लगती है जबकि ईरान का दृष्टिकोण चुनिंदा स्वीकार्यता पर आधारित है। दोनों ही विविध और तकनीकी कौशल सूचनाओं और विचारों के हमले का सामना कर रहे हैं।

कल इन दोनों देशों को आधुनिकता-आर्थिक, प्रोद्योगिकी और राजनीतिक साधनों का रचनात्मक तरीके से उपयोग करने की आवश्यकता है। दोनों देशों के हित स्थायित्व और समृद्धि में हैं।

आशा करता हूँ कि इस सेमिनार के प्रतिभागी इन रोचक विषयों पर प्रकाश डालेंगे।

जय हिंद।


1Hopper, Paul. Understanding Cultural Globalization (Cambridge 2007) p 3.
2King, Anthony D. Culture, Globalization an the World-Culture: Contemporary Conditions for the Representation of Identity (University of Minnisota 2007) pp 10-11, citing Arjun Appadorai.
3Irving, D.R.M. The Globalization of Music: Origin, Development, & Consequences, c1500-1815 (Lecture Series, Christ’s College, Cambridge)
4Baldi, Philip. An Introduction to Indo-European Languages (Illinois 1983) p 51
5Tara Chand. The Influence of Islam on Indian Culture (Allahabad 1922) p i.
6Pannikar, K.N. Colonialism, Culture, and Resistance (New Delhi 2007) p 95.
7Soroush, Abdolkarim. ‘The Three Cultures’ in Reason, Freedom and Democracy in Islam (New York 2000) pp 156-170.
8Ahmad Ashraf. ‘Perspectives on Iranian Identity’ - Encyclopaedia Iranica – March 30, 2012.
9Dabashi, Hamid. The world of Persian Literary Humanism (Harvard 2012) p 16.
10Safavi, Azarmi Dukht & Azhar Dehlavi, A.W.. Revolution and Creativity (New Delhi 2006) pp 3-4.