17 जनवरी, 2019 को हैदराबाद में स्मार्ट और टिकाऊ कृषि के लिए एग्रो सॉल्यूशन की कल्पना पर आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन एग्रो विज़न-2019 के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | जनवरी 17, 2019

“मुझे 'एनविज़निंग एग्रो सॉल्यूशंस फॉर स्मार्ट एंड सस्टेनेबल एग्रीकल्चर' विषय पर एग्रो-विज़न 2019 नामक दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है।

जैसा कि आप सभी जानते हैं, कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है। अधिकांश भारतीय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं।

कृषि क्षेत्र को विकसित और सशक्त बनाने के लिए अनुकूल वातारण बनाने से न केवल गरीबी कम होगी, बल्कि इस महत्वपूर्ण क्षेत्र से जुड़े लाखों लोगों की आजीविका को बेहतर बनाने में भी मदद मिलेगी। यह समावेशी विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारतीय कृषि क्षेत्र का भारत के सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सा 18 प्रतिशत है और यह क्षेत्र देश के 50% श्रमबल को रोजगार प्रदान करता है। वित्तीय वर्ष 2018 में कृषि, वानिकी और मछली पालन द्वारा सकल मूल्य संवर्धन अनुमानित रूप से 17.67 ट्रिलियन रुपये (274.23 बिलियन अमेरिकी डॉलर) है। 2017-18 के फसल वर्ष के दौरान, खाद्य अनाज उत्पादन रिकॉर्ड 284.83 मिलियन टन होने का अनुमान है।

अधिक उपज देने वाली किस्मों, अतिरिक्त सिंचाई सुविधाओं, उर्वरकों और कीटनाशकों के माध्यम से संवर्धित इनपुट प्रवाह, कृषि यंत्रीकरण, बढ़ी हुई ऋण सुविधाओं, मूल्य समर्थन द्वारा सुदृढ़ीकरण और अन्य ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं की शुरुआत से पिछले कुछ दशकों में हरित क्रांति का सूत्रपात हुआ।

इससे बुनियादी ढांचे और ग्रामीण विकास को प्रोत्साहन मिला, गांवों की समृद्धि में वृद्धि हुई और जीवन की गुणवत्ता में एक हद तक सुधार हुआ। हरित क्रांति के बाद भारत में कृषि उत्पादन और उत्पादकता में स्वत: बहुत सुधार हुआ है।

भारत आज न केवल खाद्यान्न मांग के मामले में आत्मनिर्भर है, बल्कि कृषि उत्पादों के शुद्ध निर्यातक के रूप में वैश्विक स्तर पर सातवें स्थान पर काबिज भी है। भारत अनाजों (गेहूं और चावल), दालों, फलों, सब्जियों, दूध, मांस और समुद्री मछली के शीर्ष उत्पादकों में से एक है। हालाँकि, हम अभी भी दलहन और तिलहन की कमी का सामना कर रहे हैं। हालांकि, फलों, सब्जियों, दूध, मांस और मछली की उपलब्धता में वृद्धि हुई है, तथापि, किसानों सहित बहुसंख्यक भारतीयों को सस्ती दर पर इनकी उपलब्ध्यता सुनिश्चित कराना सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

प्रिय बहनों और भाइयों, भारतीय खाद्य उद्योग विश्व खाद्य व्यापार, विशेषकर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में अपने योगदान को बढ़ाकर तेजी से प्रगति करने के लिए तैयार है।

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में विशाल संभावनाओं को देखते हुए यह क्षेत्र कृषि अर्थव्यवस्था में सुधार लाने, कृषि आय बढ़ाने, बर्बादी को कम करने, मूल्य संवर्धन सुनिश्चित करने, फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और रोजगार के अवसरों के सृजन के साथ-साथ निर्यात आय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह क्षेत्र उन क्षेत्रों में से एक है जो अर्थव्यवस्था के कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है।

भारतीय खाद्य और किराना बाजार दुनिया का छठा सबसे बड़ा बाजार है, जिसमें खुदरा बिक्री का योगदान 70 प्रतिशत है। भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का देश के कुल खाद्य बाजार में 32 प्रतिशत हिस्सा है, जो भारत के सबसे बड़े उद्योगों में से एक है। यह विनिर्माण और कृषि में सकल मूल्य संवर्धन (जीवीए) का क्रमशः 8.80 और 8.39 प्रतिशत, भारत के निर्यात में 13 प्रतिशत और कुल औद्योगिक निवेश में 6 प्रतिशत का योगदान देता है।

भारत में जैविक खेती भी तेजी से बढ़ रही है। भारत जैविक कृषि अपनाने वाले 172 देशों में एक अद्वितीय स्थान रखता है। भारत का दुनिया के कुल जैविक उत्पादन में हिस्सा 30 प्रतिशत है, लेकिन भारत में जैविक खेती क्षेत्रफल 57.8 मिलियन हेक्टेयर के कुल जैविक खेती क्षेत्र में सिर्फ 2.59 प्रतिशत (1.5 मिलियन हेक्टेयर) है।

भारत 2017-18 के दौरान 306.82 मिलियन टन के कुल वार्षिक फल और सब्जी उत्पादन के साथ स्पष्ट रूप से दुनिया के एक अग्रणी बागवानी देश के रूप में उभरा है।

बागवानी का क्षेत्रफल पिछले एक दशक में बढ़कर लगभग 25.1 मिलियन हेक्टेयर तक हो गया है, जिसमें विभिन्न प्रकार की फसलें, सब्जियां, जड़ और कंद की फसलें, मशरूम, फूलों की खेती, औषधीय और सुगंधित पौधे, गिरियां, नारियल और तेल ताड़ सहित रोपण फसलें शामिल हैं, जो विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों में उगाए जाते हैं। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फल उत्पादक है।

पशुधन अनादि काल से भारत की कृषि खेती का एक अभिन्न अंग रहा है। भारत में पशुधन क्षेत्र हाल के दिनों में फसल क्षेत्र की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। कृषि क्षेत्र के कुल उत्पादन में पशुधन उत्पादन का योगदान 1981-82 के 15 प्रतिशत से बढ़कर 2015-16 में 29 प्रतिशत हो गया है। इसने न केवल कृषि विकास को सहारा दिया है बल्कि स्वयं कृषि विकास के एक वाहक के रूप में उभरने के लिए भी प्रयासरत है।

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा दूध उत्पादक भी है और अब एक प्रमुख निर्यातक के रूप में उभर रहा है। कुल कृषि सकल घरेलू उत्पाद में यह लगभग 26 प्रतिशत का योगदान दे रहा है।

हालाँकि, भारतीय कृषि के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियाँ कुल उत्पादकता में गिरावट, प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास होना और उनमें गिरावट, खाद्य पदार्थों की तेज़ी से बढ़ती माँग, खेती से होने वाली आय में गत्यावरोध, खंडित भूमि जोत और अभूतपूर्व जलवायु परिवर्तन हैं। कृषि को लचीला, टिकाऊ और लाभदायक बनाने के लिए इन सभी चुनौतियों से युद्धस्तर पर निपटने की जरूरत है। हमें केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से नीतिगत अंत:क्षेपों के माध्यम से कृषि में संरचनात्मक परिवर्तन लाने होंगे।

एक और बड़ी चुनौती यह है कि 85 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत किसान हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि जोत है। इन छोटे किसानों को बाजार से जोड़ना हमारी प्रणाली में एक और बड़ी चुनौती है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए, उन्हें विक्रेताओं, व्यापारियों और निर्यातकों के साथ जोड़ना आवश्यक है।

21 वीं सदी में खाद्य सुरक्षा के लिए प्रमुख चुनौतियों में से एक न केवल उत्पादकता में सुधार करना है, बल्कि ऐसी फसलों के विकास के माध्यम से स्थिरता लाना भी है जो रोग प्रतिरोधी, कीट-प्रतिरोधी हों और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल हों। इसलिए बीज से लेकर पश्च फसल कटाई प्रबंधन से लेकर विपणन तक के लिए सभी मोर्चों पर नवीनतम तकनीकों को अपनाना आवश्यक है, जिससे हमारी उत्पादकता में अन्य अग्रणी देशों के समकक्ष सुधार होगा और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।

कृषि क्षेत्र के महत्व को देखते हुए, भारत सरकार ने इसके सतत विकास के लिए कई कदम उठाए हैं।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के माध्यम से स्थायी आधार पर मिट्टी की उर्वरता में सुधार के लिए कदम उठाए हैं, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) के माध्यम से सिंचाई और उन्नत जल दक्षता तक अधिक पहुंच प्रदान की गई है, परम्परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) के माध्यम से जैविक खेती में सहायता करने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय कृषि बाजार का निर्माण करने में सहायता करने के लिए कदम उठाए गए हैं। इसके अलावा, कृषि क्षेत्र में जोखिम को कम करने के लिए “प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) को खरीफ 2016 से लागू करने के लिए शुरू किया गया है।

माननीय प्रधान मंत्री ने 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लिए देश के सामने एक लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, सरकार “प्रति बूंद अधिक फसल” जैसी योजनाओं के साथ सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य के आधार पर गुणवत्तायुक्त बीज और पोषक तत्वों के प्रावधान, फसल की कटाई के बाद के नुकसान को रोकने के लिए गोदामों और शीत भंडारण की स्थापना, खाद्य प्रसंस्करण के माध्यम से मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने, एक राष्ट्रीय कृषि बाजार का निर्माण करने, विकृतियों को दूर करने और 585 स्टेशनों पर ई-प्लेटफॉर्म पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों स्तरों पर खाद्य और पोषण सुरक्षा सहित कृषि में उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए कृषिगत अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना और कुशल संस्थागत सुधारों को लागू करना महत्वपूर्ण है। मैं हमेशा से भारत की अपनी घरेलू खाद्य सुरक्षा की आवश्यकता पर जोर देता रहा हूं क्योंकि देश आयातित खाद्य सुरक्षा पर निर्भर नहीं हो सकता है।

कृषि में डिजिटल प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरा है। सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, भू-सूचना विज्ञान, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), ब्लॉक चेन प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा एनालिटिक्स का उपयोग और किसानों को उनकी यथासंभव कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना खेती से आय में वृद्धि करने के लिए महत्वपूर्ण है। डिजिटल प्रौद्योगिकियों से खेती में अनिश्चितताओं का मुकाबला करने और संसाधनों के इष्टतम उपयोग में भी मदद मिल सकती है।

जय हिन्द!”