11 अगस्त, 2017 को भारत के उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद माननीय सभापति, राज्यसभा के रूप में श्री एम.वेंकैया नायडु का प्रथम अभिभाषण

नई दिल्ली | अगस्त 11, 2017

माननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी जी, सभा के नेता, आदरणीय श्री अरुण जेटली, विपक्ष के नेता, आदरणीय श्री गुलाम नबी आजाद, माननीय उपसभापति, प्रो. पी. जे. कुरियन, माननीय मंत्रिगण और इस सभा के प्रतिष्ठित सदस्य!

मैंने एक सदस्य के रूप में जब पहली बार 1998 में इस महती सभा में प्रवेश किया था तब मैंने कभी भी यह नहीं सोचा था कि एक दिन मुझे सभापति के रूप में इस सभा की अध्यक्षता करने का गौरव प्राप्त होगा। यह हमारे संसदीय लोकतंत्र का सौंदर्य और महिमा है और यही इसकी ताकत भी है कि यहां मेरे जैसा कोई सामान्य व्यक्ति भी इतने ऊँचे पद पर पहुंच सकता है और इस पद की महती जिम्मेदारियों को निभाने का अवसर पा सकता है।

संसद सदस्यों ने मुझे भारत के उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित करके जो सम्मान दिया है, उससे मैं अभिभूत हूं। इसी के फलस्वरूप मुझे राज्यसभा के सभापति पद का दायित्व सौंपा गया है।

मुझमें भरोसा और विश्वास दिखाने तथा मुझे ऐसी जिम्मेदारी सौंपने के लिए मैं सभी संबद्ध व्यक्तियों का कृतज्ञ हूं। आरंभ में, मैं आप सभी को विश्वास दिलाना चाहूंगा कि मैं आप सभी की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का प्रयास करूंगा।

इस महती सभा के सभापति के रूप में विस्तारपूर्वक अपने विचार व्यक्त करने से पहले, मैं भारत की संसद के इस संघीय सदन के उद्भव और इसकी भूमिका के बारे में संक्षेप में कुछ कहना चाहूंगा, जिसकी जड़ें 1918 की मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में हैं। राज्य सभा, 1919 के भारत सरकार अधिनियम के फलस्वरूप, सीमित अधिकारों सहित तत्कालीन विधायिका के द्वितीय सदन के रूप में सबसे पहले 1921 में अस्तित्व में आयी।

उसके बाद, संविधान सभा में इस सभा की आवश्यकता के संबंध में व्यापक बहस हुई। यह समझा गया कि स्वतंत्र भारत के समक्ष मौजूद चुनौतियों का सामना करने के लिए एकल, प्रत्यक्षत: निर्वाचित सभा पर्याप्त नहीं होगी। तद्नुसार, एक संघीय सदन के रूप में राज्य सभा, अर्थात् निर्वाचित सदस्यों द्वारा निर्वाचित सभा का गठन किया गया। भारत के उपराष्ट्रपति को इस सभा का पदेन सभापति बनाकर इस सदन को गरिमा और प्रतिष्ठा प्रदान की गई।

संविधान सभा के विद्वान सदस्यों ने इस सदन की परिकल्पना 'विवेकशील और मूल्यपरक विचार करने वाली सभा' के रूप में की थी। स्वर्गीय श्री एन. गोपालस्वामी अयंगर ने इसे "क्षणिक भावावेशों पर नियंत्रण रखने वाली" सभा कहा था। स्वर्गीय श्री लोकनाथ मिश्रा जी ने इसे परिभाषित करते हुए कहा कि यह "गंभीर और समीक्षा करने वाली सभा है, यह एक ऐसी सभा है जो गुणवत्ता को बनाए रखेगी और इसके सदस्य अपनी गंभीर समझ और विशिष्ट समस्याओं के बारे में अपने ज्ञान के आधार पर कुछ कहेंगे और अपने विचारों को सुने जाने के अधिकार का प्रयोग करेंगे"।

वरिष्ठों की इस सभा का उद्देश्य संघीय संतुलन एवं विधान में समभाव सुनिश्चि त करना है। वाद-विवाद को अधिक समृद्ध बनाने के प्रयोजन से इस सभा में भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के विद्वान व्यक्तियों को नाम-निर्देशित करने का भी उपबंध किया गया है। इस सभा से संघीय संरचना के भीतर राज्यों के हितों की रक्षा की अपेक्षा भी की जाती है।

इस सबसे यह सिद्ध होता है कि अपना कार्य करने के लिए इस महती सभा के पास स्पष्ट अधिदेश है बशर्ते, माननीय सदस्य अनजाने में भी इसकी भूमिका को घटाकर निरर्थक और अप्रासंगिक बनाने की अपेक्षा न करें, जैसा कि कुछ क्षेत्रों में दबे स्वरों में कहा भी जाने लगा है। यह विकल्प माननीय सदस्यों के हाथ में ही है।

माननीय सदस्यों!

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में हमारे देश को प्रक्रियाओं की व्यवस्था करने, संसाधन जुटाने, भागीदारी निर्मित करने और सामाजिक-आर्थिक समानता सुनिश्चित करने के लिए कुशल और प्रभावी विधान की आवश्यकता है।

माननीय सदस्यों, समय हमारे अनुकूल नहीं है। स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 वर्षों के बाद भी हम गरीबी, निरक्षरता, असमानता, कृषि एवं ग्रामीण विकास की चुनौतियों, सत्ता के दुरुपयोग आदि जैसे मूलभूत मुद्दों से जूझ रहे हैं, जबकि जब हमें स्वतंत्रता मिली तो कई ऐसे देश थे जहां के हालात हमारे ही जैसे थे और अब वे कहीं अधिक संकेन्द्रित होकर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और अपनी शक्ति का कहीं अधिक बेहतर ढंग से इस्तेमाल कर रहे हैं।

किसी व्यक्ति, संस्था या राष्ट्र की सफलता के लिए समय का प्रबंधन बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। हमारे पास फुर्सत का समय नहीं है। यदि हमारे देश की पूर्ण क्षमता को साधित करना है तो पर्याप्त मानव और प्राकृतिक संसाधन और अन्य सुविधाएं होने के बावजूद पिछले सात दशकों में हमने जो अवसर गंवा दिए, हमें उनकी भी पूर्ति करनी है।

इस महती सभा की हर वर्ष 100 दिन से भी कम बैठकें होती हैं। क्या माननीय सदस्यों को इस उपलब्ध्ास समय का सदुपयोग देश और जनता के हितों को आगे बढ़ाने में नहीं करना चाहिए? इसका निर्णय विद्वान सदस्यों को करना है।

हमें अपनी विविधता और अंतर्निहित एकता पर गर्व है। यदि ऐसी बात है तो क्या हमें साझा राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति और युवा भारत की आकांक्षाओं को साकार करने के लिए एकजुट नहीं होना चाहिए? हमारी लोकतांत्रिक राजव्यवस्था में विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर भिन्न-भिन्न विचारों और विचारधाराओं को समृद्ध बनाने का अवसर प्राप्त है। लेकिन संसद के कामकाज पर प्रतिकूल राजनीति का प्रभाव नहीं पड़ने देना चाहिए क्योंकि इसका असर हमारे राष्ट्र की प्रगति पर पड़ता है।

राजनीतिक लोकतंत्र राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए प्रयुक्त एक पवित्र साधन है। लेकिन हमारी विधायिका में प्रतिध्वनित विभाजनकारी राजनीति हमारे देश और जनता की प्रगति में बाधक है। हमारे संसदीय लोकतंत्र की किसी भी सभा को ऐसी विभाजनकारी राजनीति करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

प्रत्येक चुनाव, जीतने वाले को एक जनादेश देता है और विपक्ष को यह जिम्मेदारी देता है कि वह कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करे। संसदीय लोकतंत्र संख्या बल पर आधारित है। लेकिन अनिवार्य रूप से इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी विधायिका का कामकाज केवल संख्याबल का ही खेल बनकर रह जाए। आंकड़ों का खेल सरकारें बनाने तक ही रहने देना चाहिए और इसके बाद संख्याबल का प्रयोग विरलतम मामलों में ही किया जाना चाहिए। हमारी जैसी उभरती अर्थव्यवस्था में विधायी कामकाज साझा नियति द्वारा निर्देशित होना चाहिए।

माननीय सदस्यों!

हमारे देश की जनता यही चाहती है कि संसद में उनकी चिंताओं पर विवेकपूर्ण चर्चा हो और उनकी समस्याओं का सर्वोत्तम ढंग से समाधान किया जाए। पिछले वर्षों में, संसद की दोनों सभाओं ने पर्याप्त अच्छे ढंग से काम किया है। लेकिन फिर भी, हमारे कार्यकरण को लेकर लोगों में चिंता और असंतोष है। हमें इस सुस्पष्ट असंतोष के संदर्भ में आत्मावलोकन करने की आवश्यकता है, जहां लोग यह कहने लगे हैं कि हम पर्याप्त कार्य नहीं कर रहे हैं। हमें सभा में अपनी वाणी और आचरण में समुचित सुधार करके राज्य की विधायिकाओं के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।

सभा का प्रभावी कार्यकरण समय और स्थान के प्रबंधन पर निर्भर करता है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के लिए समय और स्थान निर्धारित है। हमें बेहतर परिणामों के लिए समय और स्थान की इन सीमाओं के भीतर स्वयं को समायोजित करना होगा। आवश्यकता केवल इस बात की है कि दोनों ही पक्षों की ओर से आपसी समझबूझ का दृष्टिकोण हो। ऐसा सभा के प्रभावी कार्यकरण हेतु इसके सुदृढ़ीकरण की रणनीति बनाने से होगा न कि इसकी कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न करके। इसके लिए सभी संबंधित पक्षों द्वारा विवेकशील रवैया अपनाया जाना आवश्यक है।

दुर्भाग्य से, हमारे देश में उत्तरोत्तर विधायिका की कार्यवाही में बाधा डालने और व्यवधान उत्पन्न करने को प्रथम संसदीय विकल्प के रूप में अपनाया जा रहा है। हमारे संसदीय लोकतंत्र के संदर्भ में इसके गंभीर परिणाम होंगे। इस विकल्प के स्थान पर मुद्दों के समाधान और जनता को पेश आ रही समस्याओं का हल ढूंढने के लिए प्रभावी वाद-विवाद की नीति तत्काल अपनाया जाना आवश्यक है।

ऐसा कैसे किया जाए? इस महती सभा के सदस्य के रूप में हमें प्राप्त अवसर का सदुपयोग करने के लिए हमें कुछ अलग करने की आवश्यकता नहीं है, बस हमें अपना काम अलग ढंग से करना होगा और वह तरीका है कार्यवाही में बाधा और व्यवधान उत्पन्न करने के स्थान पर विषय के संबंध में तीखे और भावप्रवण रूप से वाद-विवाद और चर्चा करना। मेरा दृढ़ विश्वास है कि विपक्ष को अपनी बात कहने का और मौजूदा सरकार को अपनी राय देने का मौका मिलना चाहिए। वास्तव में इसका यही अर्थ है कि दोनों ही पक्षों को एक दूसरे का सम्मान करना होगा और इस प्रक्रिया में एक-दूसरे के साथ समायोजन करना होगा।

मैं जो कर सकता हूं और जो करना चाहूंगा वह यह कि मैं इस बात का पूरा प्रयत्न करूंगा कि इस सभा को प्रभावी रूप से काम करने में सक्षम बनाने के लिए सभी सदस्यों को बोलने और काम करने का पूरा मौका दूं। निश्चिमत ही मैं अनियंत्रित छात्रों को अनुशासन का पाठ सिखाने वाले प्रधानाध्यापक की तरह काम नहीं कर सकता। मुझे मालूम है कि ऐसे काम करना संभव नहीं है। मेरा यह प्रयास होगा कि सभा में सद्भावना और आपसी विश्वास का वातावरण बने। हमारे देश में विधायिकाओं की सामान्य कार्यपद्धति में नवीनता लाने की जरूरत है। मेरा प्रयास होगा कि आप सभी के सहयोग से यह महती सभा इस बदलाव को हासिल कर पाए।

चहुंमुखी और तीव्र सामाजिक-आर्थिक विकास के माध्यम से राष्ट्र निर्माण तत्कालीन सरकार का ही विशेषाधिकार या उत्तरदायित्व नहीं है। यह एक राष्ट्रीय कार्य है और इसके लिए राष्ट्रीय प्रयास की आवश्यकता है। इस प्रयास में विपक्ष एक महत्वपूर्ण भागीदार है और विधायिकाएं प्रभावी सक्षमकारी मंच हैं। विपक्ष्ा द्वारा कार्यपालिका का उत्तरदायित्व सुनिश्चिित करने का सर्वोत्तम तरीका सरकार को मुद्दों पर बहस के लिए तैयार करना और उसे सुविज्ञ वाद-विवाद में घेरना है। मेरा मानना है कि यदि प्रश्न काल न हो या किसी अविलंबनीय लोक महत्व के मुद्दे पर चर्चा बाधित होती है तो इसका लाभ कार्यपालिका को ही होता है। कार्यपालिका को भी समझना चाहिए कि विपक्ष को साथ लेकर काम करने में उन्हीं का फायदा है क्योंकि विपक्ष के रचनात्मक सहयोग से तैयार किसी भी विधान के प्रति जनता में सम्मान और स्वीकार्यता की भावना में बढ़ोतरी होती है। हमारी विधायिकाओं के कार्यकरण में बदलाव इसी प्रबुद्ध दृष्टिाकोण से संभव है। /p>

मैं 19 वर्षों से इस महती सभा का सदस्य हूं और ज्यादातर समय विपक्ष का सदस्य रहा हूं, अत: मुझे सभा के दोनों पक्षों की संवेदनाओं, कार्यसंचालन विषयक नियमों, माननीय सदस्यों के अधिकारों और विशेषाधिकारों और उनकी भावनाओं और कुछ अवसरों पर उनकी हताशा का ज्ञान है।

मुझे यह भी ज्ञात है कि डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डा. जाकिर हुसैन, न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला, श्री आर.वेंकटरमन, डा. शंकर दयाल शर्मा , श्री के. आर. नारायणन, श्री भैरों सिंह शेखावत और अन्य प्रबुद्ध व्यक्तियों ने इस महती सभा की कार्यवाहियों की उत्कृष्टतापूर्वक अध्यक्षता की है। मेरे पूर्ववर्ती श्री हामिद अंसारी ने 10 वर्ष तक सभा की अध्यक्षता की। मेरा प्रयास होगा कि इन योग्य व्यक्तियों द्वारा स्थापित परंपराओं और मानकों को बनाए रखूं।

मैं इस अवसर पर माननीय सदस्यों से यही अपील करना चाहूंगा कि सभा में कुछ भी कहने या करने से पहले देश के सर्वाधिक निर्धन और सर्वाधिक वंचित व्यक्ति के बारे में सोचें। देश के संविधान के विशिष्ट सिद्धांतों, स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों और महात्मा तथा डा. बी.आर. अंबेडकर जैसी महान आत्माओं और हमारे देश को इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए अब तक अपना खून-पसीना बहाने वाले अन्य नेताओं के पवित्र विचारों से हमारा पथ आलोकित होना चाहिए। हमें सर्वदा यह याद रखना होगा कि विश्व के राष्ट्रों के बीच अपना सही स्थान पाने और प्रत्येक नागरिक के चेहरे पर मुस्कान सजाने के लिए अभी हमें कितनी दूरी और तय करनी है। बेहतर भविष्य के लिए हमें लोगों के अधिकारों से निर्देशित होना चाहिए।

इस समय संघ और राज्य सरकारें नवीन संकल्प और अत्यावश्यकता की भावना के साथ विकास की गति में तेजी लाने के लिए प्रतिस्पर्धी और सहयोगी संघवाद की भावना से काम करती दिखाई दे रही हैं ताकि लोगों के जीवन में बेहतरी लाने के लिए उन्हें और अधिक अवसर उपलब्ध कराए जा सकें। इस राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने में हमें एक उत्प्रेरक की भूमिका निभानी चाहिए।

मैं आप सभी को विश्वास दिलाना चाहूंगा कि मैं भारत के उपराष्ट्रपति एवं राज्य सभा के सभापति के पद की गरिमा को बनाए रखने और आपके भरोसे पर खरा उतरने का पूरा प्रयास करूंगा। मैं आपकी सेवा के लिए सदा तत्पर हूं और आपके सामूहिक विवेक के अनुसार इस महती सभा के कार्यकरण में सुधार के लिए आपके सुझावों का स्वागत करता हूं।

अंत में, मैं माननीय सदस्यों को स्वतंत्रता प्राप्ति की स्वर्ण जयंती के अवसर पर वर्ष 1997 में आयोजित विशेष सत्र में इस महती सभा द्वारा गृहीत संकल्प का स्मरण कराना चाहूंगा। सदस्यों ने सभा के प्रक्रिया और कार्य-संचालन विषयक नियमों की संपूर्ण पद्धति और सभापीठ के निदेशों के सचेतन और गरिमापूर्ण अनुपालन के माध्यम से संसद की प्रतिष्ठा को परिरक्षित और वर्द्धित करने का संकल्प लिया था। आइए हम इस पवित्र संकल्प का पालन करें।

सभी माननीय सदस्यों को धन्यवाद।

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