10 अप्रैल, 2017 को नई दिल्ली में श्री अश्विनी कुमार की पुस्तक होप इन ए चैलेंज्ड डेमोक्रेसी ऐन इंडियन नैरेटिव के विमोचन के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी का भाषण

नई दिल्ली | अप्रैल 10, 2017

वे लोग जो अश्विनी कुमार जी को जानते हैं, वे उनके प्रशंसनीय व्यक्तित्व के एक पहलु अर्थात अपनी बात पर जोर देने की उनकी निश्चित क्षमता से भी परिचित हैं। आज यहां मैं कुछ सीमा तक उनके व्यक्तित्व के इसी पहलू के कारण उपस्थित हुआ हूं!

यह खंड भाषणों और लेखन का ऐसा संग्रह है, जिसमें विधि और संविधान से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं, आर्थिक परिवर्तनों, और विदेशी संबंध जैसे विस्तृत विषय शामिल हैं। इस पुस्तक के केंद्र में भारत है और इसका शीर्षक इसके मूल विषय का परिचायक है।

लेखक के अपने शब्दों में, इस पुस्तक के प्रमुख विषय प्रथमतया 'धन और सत्ता के बीच संबंध और इसके सरकार की विश्वसनीयता और नैतिक प्राधिकार पर पड़ने वाले प्रभाव पर आधारित हैं। और इसका दूसरा विषय 'असहिष्णुता' का असहनीय वातावरण है जिसका वर्णन इसमें किया गया है। 'लोकतंत्र की संस्थाओं के बीच बिगड़े संतुलन, देश की धर्म-निरपेक्ष अन्तश्चेतना और इसकी सामाजिक समरसता पर पड़ रहे दबाबों का भी इसमें उल्लेख है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि ये सभी अनेक नागरिकों में व्याप्त विस्तृत, चिंता को प्रतिबिंबित करते हैं।

एक दशक से भी पहले सरकार के एक प्रमुख विधि अधिकारी ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की 'मूल संरचना को ध्वस्त करने वाली कैंसरकारी घटनाओं के कारण देश में कानून के शासन के प्रति खतरे और दीर्घकाल में इससे भारत के समक्ष उत्पन्न होने वाले खतरे के संबंध में लिखा था।

यह स्वयं सिद्ध है कि सभी लोकतांत्रिक देशों में सामाजिक बाध्यताओं और वैयक्तिक स्वतंत्रता, राज्य सुरक्षा के आदेशों और नागरिकों की स्वतंत्रता तथा विविध राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण के बीच तनाव रहता है। इस तनाव को इस तरह से दूर करना कि संबंधित समाज के घोषित उद्देश्यों पर ध्यान केन्द्रित रहें, हमेशा चुनौतिपूर्ण होता है।

विविधताओं और असमानताओं से उभरे विरोधाभासों के मद्देनजर हमारे देश में लोकतांत्रिक राजनीति को हमेशा चुनौती मिलेगी। जब अम्बेडकर ने 29 नवंबर, 1949 को 'विरोधाभासों के जीवन' और 'राजनीतिक लोकतंत्र के ढांचे को ध्वस्त करने वाली असमानता की अपनी आशंका' का जिक्र किया था, तब उनका यही आशय था।

संविधान के भाग III, IV और IVक की व्यापकता और 1950 से संशोधनों की बहुलता के बाद कुछ हद तक उनकी आशंकाएं अभी भी जायज हैं। सामाजिक न्याय, समानता और व्यक्ति के सम्मान के लक्ष्य को अभी भी पर्याप्त रूप से प्राप्त किया जाना शेष हैं और वर्ष 2015 के संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के मानव विकास सूचकांक में 188 देशों के सर्वेक्षण में हमारे देश को 130 वें स्थान पर रेखांकित रूप में दर्शाया गया है।

इसी प्रकार वेल्थ रिसर्च फर्म 'न्यू वर्ल्ड वेल्थ' की हाल की रिपोर्ट में भारत को विश्व की बारहवी सर्वाधिक असमान अर्थव्यवस्था बताया गया है, जिसमें भारत की कुल संपत्ति का लगभग आधा हिस्सा एक प्रतिशत सर्वाधिक अमीरों के हाथ में है जबकि शीर्ष 10 प्रतिशत का 74 प्रतिशत संपत्ति पर नियंत्रण है। सबसे गरीब 30 प्रतिशत के पास कुल संपत्ति का मात्र 1.4% है।

इन परिस्थितियों के आधार पर समाजशास्त्री टी.के. उमेन ने यह निष्कर्ष निकाला कि स्वतंत्र भारत की संविधान पारित करने की प्रवृत्ति सर्वविदित है परंतु इन्हें लागू किए जाने के मामले में स्थिति बहुत खराब है और इस संबंध में इसकी सुधारातीत अक्षमत उजागर है। उमेन यह भी कहते हैं कि जबकि लोकतांत्रिक गतिशीलता ने सत्ता के लिए कड़े संघर्ष को तो जन्म दिया है, पर इसने लाखों नागरिकों को गरीबी की घृणित चंगुल से मुक्त नहीं किया है।

यह भारतीय लोकतंत्र के लिए चुनौती है। आशा है कि इस चुनौती का समाधान भी इसके ढांचे से ही निकलेगा। इसके लिए सिद्धांतों और प्रक्रिया के प्रति समर्पण की आवश्यकता है।

इस बात का मूल्यांकन करना पाठक का कार्य है कि इस पुस्तक में वर्णित दृष्टिकोण इस प्रक्रिया में किस हद तक सहायक है।
जय हिंद।