07 दिसंबर, 2017 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में अशोक सिंघल: स्टैंच एंड पर्सिएट एक्सपोनेंट ऑफ हिंदुत्व नामक पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

नई दिल्ली | दिसम्बर 7, 2017

आज हम एक पवित्र आत्मा का पुण्य स्मरण कर रहे हैं। सार्वकालिक लोकप्रिय संगठनकर्ता अशोक सिंहल जी कालजयी प्रेरणा पुंज हैं। अशोक सिंहल ने समाज और देश के लिए अपने जो कीमती 75 वर्ष दिए हैं, उस त्याग व तपस्या का फल भारत की भावी पीढ़ियों को जरूर मिलेगा ऐसा हम सब विश्वास करते हैं। उनके जीवन में विरूद्धों का सामंजस्य दिखाई देता है। ज्ञान, विज्ञान और अभियांत्रिकी का छात्र प्रयोगशाला से ज्यादा एकांत में गंगा किनारे चिंतन करते थे। धर्म, समाज और संस्कृति की चिंता करते थे। आत्म संस्कार और जीवन में आत्मानुशासन के लिए संघ की शाखा से जुड़कर निरंतर सक्रिय रहते थे।

किशोरावस्था में अपने विषय में ने सोचकर अंग्रेजों के अत्याचारों से लड़ने को उद्यत रहकर उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया था। किशोर अशोक चाहते थे कि मुस्लिम समाज के लोग भी ज्यादा से ज्यादा असहयोग आन्दोलन में भाग लें। कांग्रेस के कुछ लोगों के जोर देने के बावजूद वे आजादी के आन्दोलन से जुडने के लिए गांधी की कांग्रेस को नहीं बल्कि डॉ. हेडगेवार के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को वरीयता दी। अपना सम्पूर्ण जीवन संघ कार्य के लिए समर्पित करने वाले महान व्यक्ति अशोक जी हैं।

जीवन में जितनी प्रतिकूलताएं मिलीं उनसे डटकर मुकाबला कर अशोक जी एक नया रास्ता बनाते रहे और भीड़ में भी प्रामाणिकता के साथ अपनी अलग और विशिष्ट पहचान बनाते रहे। आन्दोलन में लाठी और गोली खाने के लिए वे हमेशा सबसे आगे रहे और विशेष से लेकर सामान्य कार्यकर्ता की चिंता उन्हें परिवार के मुखिया की रहत रही। ऐसे विलक्षण अशोक सिंहल हम सबके लिए प्रेरक है। उनका आचरण और विचार दर्शन हमेशा के लिए प्रेरणा, ऊर्जा, उत्साह और संचार का काम करेगा।

अशोक जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित लेखक महेश भागचन्दका की पुस्तक ASHOK SINGHAL STAUNCH AND PERSEVERANT EXPONENT OF HINDUTVA अशोक जी के जीवन के विविध पहलुओं से परिचित कराती है। कुछ पहलुओं का मैं जिक्र करना चाहता हूं:

  1. अशोक जी साधक व तपस्वी थे। छात्र जीवन में ही अशोक जी ने समाज देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा का संकल्प ले चुके थे।
  2. हृदयाघात ने अशोक जी को संकल्पवान व प्रतिबद्ध बनाया था : समाज, देश व धर्म के लिए तन-मन से समर्पित अशोक जी को 1962 में कानपुर में गुरुदक्षिणा कार्यक्रम के दौरान बैरिस्टर नरेन्द्र जीत सिंह के निवास पर जोर का हृदयाघात हुआ। इससे अशोक जी ने मन में निश्चय किया यह जीवन तो अब समाज और देश के लिए होम करना है। इसी संकल्प के चलते धर्म व अध्यात्मक के मामले में वे अनुशासन और शुद्धता के पक्षधर रहे।
  3. जब अशोक जी को घर से निकलने की धमकी मिली तो उन्होंने इसे प्रेरणामंत्र माना था : बीएचयू से माइनिंग इंजीनियरिंग में टॉप करने के बाद जब युवा अशोक ने पिता महावीर सिंह को बताया कि वह संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बनकर देश सेवा से जुड़ना चाहते हैं तो प्रशासनिक अधिकारी पिता सन्न रह गए। उन्होंने अशोक जी को बहुत समझाया, बुझाया, धमकाया और घर से निकलने का भी आदेश दिया किंतु जब उन्हें लगा कि अशोक जी के इरादों, रुचि और संकल्प को नहीं बदला जा सकता तो उन्होंने सहर्ष आर्शीवाद देते हुए अपने बेटे का मन, आत्मा और विवेक से भारत माँ का बेटा बनने का आशीर्वाद दिया।
  4. अशोक जी चन्द्रशेखर आजाद व उनके सहयोगी अपने बड़े भाई को वे प्रेरक मानते थे।
  5. अशोक जी संगीत के अद्भुत मर्मज्ञ थे : अशोक जी का आंदोलनकारी और मुखर व्यक्तित्व बाहर से क्रांतिकारी लगता था लेकिन उनका अंतर्मन बहुत निश्छल व कोमल था उन्हें संगीत का अच्छा ज्ञान था।

कुल मिलाकर ASHOK SINGHAL STAUNCH AND PERSEVERANT EXPONENT OF HINDUTVA पुस्तक में लेखक महेश भागचन्दका ने हिन्दू धर्म की धरोहर पुरुषार्थी व साधक अशोक सिंहल जी के व्यक्तित्व व जीवनचर्या से जुड़े प्रसंगों को प्रमाणिकता के साथ गुंथकर भारत व विश्वभर के हिन्दुओं के लिए एक प्रेरणाप्रद दस्तावेज से रूप में उपस्थापित किया है।

निश्चित रूप से भारतीय सनातन मूल्य व हिन्दू संस्कृति के जीवंत संवाहक अशोक सिंहल पर केन्द्रित यह महाग्रंथ देश की युवा पीढ़ी के साथ-साथ विश्वभर में फैले प्रतिभाशाली भारतवंशी युवाओं के लिए ऊर्जा देने व प्रेरणा देने का कार्य करेगा।

इस पावन अवसर पर हिन्दुत्व की दिव्य महाविभूति ब्रह्मलीन अशोक सिंहल जी की पावन स्मृति को कोटि-कोटि नमन।

जय हिंद।