07 जनवरी, 2018 को राजस्थान के टोंक जिले में वनस्थली विद्यापाठ के 34वें दीक्षांत समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

टोंक जिला, राजस्थान | जनवरी 7, 2018

"महिलाओं की शिक्षा के लिए विश्व के इस सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय, वनस्थली विद्यापीठ के 34वें दीक्षांत समारोह में भागीदारी करना वास्तव में अनुपम है।

इस दीक्षांत समारोह में भाषण देने के लिए आमंत्रित किये जाने लिए मैं आपके विशिष्ट कुलपति का कृतज्ञ हूं। इस उत्सव का हिस्सा बनना और यहां आना बहुत सम्मान की बात है।"

वनस्थली विश्वविद्यालय ने गत वर्षों में व्यापक रूप से प्रशंसनीय विशिष्ट पहान विकसित की है। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, पंडित हीरालाल शास्त्री जिन्होंने ग्रामीण पुनर्निमाण को समर्पित एक संस्था को आरम्भ करने के लिए अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी थी, द्वारा परिकल्पित और पल्लवित की गई यह संस्था एक सर्वोत्कृष्ट शैक्षणिक संस्था में परिवर्तित हो गई है। इस संस्था के पार्श्व में उनकी पत्नी एवं वनस्थली विद्यापीठ की सह-संस्थापक, श्रीमती रतन शास्त्री की गतिमान भावना सम्बद्ध रही है। नवयुवा कन्याओं की अनेक पीढ़ियां उनके व्यक्तिगत, समर्थक संरक्षण में निखरी हैं। उन्हें 1955 में पद्मश्री, 1975 में पद्म भूषण तथा महिलाओं एवं बच्चों के उत्थान और कल्याण के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए जमनालाल बजाज पुरस्कार प्रदान किया गया। मैं प. हीरालाल शास्त्री के साथ-साथ श्रीमती रतन शास्त्री और उन सभी लोगों को जिन्होंने इस सर्वोत्तम संस्था को यह स्वरूप प्रदान करने में उनकी सहायता की है को नमन करता हूं।

आज, हम उन छात्राओं, की उपलब्धियों के लिए उत्सव मना रहे हैं जिन्होंने अपने अध्ययन कार्यक्रम को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। साथ ही, हम इस विश्वविद्यालय को स्वरूप प्रदान करने वाले शिक्षक-संकाय के अथक समर्पित प्रयासों का भी उत्सव मना रहे हैं।

प्रिय छात्रों

मैं आप सभी को अपनी शुभकामनाएं देता हूं और आशा करता हूं कि आप अपने सपनों को साकार करने के लिए यहां से अर्जित ज्ञान एवं प्रशिक्षण का उपयोग करेंगे।

मैं यह भी आशा करता हूं कि व्यक्तिगत जीवन की संतुष्टि के अलावा आप जिस प्राचीन भूमि से संबंध रखते हैं उस पर भी छाप छोड़ने में समर्थ हो पायेंगे। वनस्थली से स्नातक उपाधि प्राप्त करने वाली छात्राएं समस्त विश्व में अपनी नेतृत्व क्षमताओं के लिए जानी जाती हैं और वे राज्यपाल, कॉरपोरेट जगत की मुख्य कार्यपालक, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी, सुप्रसिद्ध कलाकार एवं संगीतज्ञ, अग्रणी प्रशासक, प्रबुद्ध शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता रही हैं तथा उन्होंने अपने-अपने परिवारों, संगठनों और परिवेश में सामान्यत: आमूल-चूल परिवर्तन किए है। मुझे विश्वास है कि आप सब अपनी बड़ी बहनों से प्राप्त नेतृत्व क्षमता की विरासत को आगे बढायेंगी और इस पथ पर अग्रसर रहेंगी।

बहनो और भाइयो,

इस मनोरम सुबह में मुझे सुरमयी वनों के बीच स्थित इस अनूठे विश्वविद्यालय की विभिन्न गतिविधियों की झलक पाने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। स्पष्ट रूप से, वनस्थली विद्यापीठ पिछले अनेक वर्षों में एक सक्रिय शैक्षणिक संस्था के रूप में उभरा है जो अपनी छात्राओं को उन अनेक भूमिकाओं को निभाने के लिए तैयार कर रही है जो वे अपने-अपने जीवन में निभायेंगी। इसने इस राज्य और देश में मौजूद शैक्षणिक संस्थाओं के समूह में अपना एक स्थान बनाया है और अपने क्षेत्र का लगातार विस्तार करती जा रही है।

मैं यह महसूस करता हूं कि शिक्षा चहुंमुखी, जीवनदायी और चरित्र निर्माणपरक होनी चाहिए। वनस्थली विद्यापीठ का पंचमुखी शिक्षा प्रतिमान चहुंमुखी शिक्षा प्रदान करने की नवीन पद्धति है जो प्रत्येक छात्रा को अपनी नैसर्गिक क्षमता को पहचानने में समर्थ बनाता है, और अपने सांस्कृतिक एवं परिवेशात्मक संदर्भ के साथ अर्जित ज्ञान को समाहित करने में उनकी मदद करता हूं।

यह जानकार वास्तव में बहुत संतुष्टि होती है कि महिलाओं को शिक्षा प्रदान करने की अपनी यात्रा में वनस्थली विद्यापीठ बहुत आगे पहुंच गई है। ऐसे समय में जब साक्षरता दर बहुत कम थी और लड़कियों को घर की चारदीवारी में रखा जाता था, वनस्थली विद्यापीठ कन्या शिक्षा के क्षेत्र में पथ-प्रदर्शक बना। ऐसे समय में जब महिलाएं साइकिल चलाना सीख रही थीं, वनस्थली विद्यापीठ ने यह सुनिश्चित किया कि महिलाएं अश्वरोहण सीखें और ग्लाइडरों एवं पायलटों के रूप में और ज्यादा ऊंचाइयों को छुए। पुन: ऐसे समय में जब महिलाओं को व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त के पश्चात् छोटी-मोटी नौकरियों के साथ जीवन-यापन करने के लिए कहा जाता है, वनस्थली विद्यापीठ ने भारतीय वायु सेना में पहली बार सहयोजित की गई फाइटर पायलटों में से एक फ्लाइट लेफ्टिनेंट अवनी चतुर्वेदी जैसी महिलाओं को पोषित किया। आज जब विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पाठ्यक्रमों में अभी भी पुरुषों का वर्चस्व है, महिलाओं के इस प्रमुख विश्वविद्यालय की छात्राएं इंटरनेट जैसी चीजें सीख रही हैं और मैकेट्रोनिक्स एवं रोबोटिक्स की अति उन्नत 4.0 औद्योगिक प्रयोगशालाओं में प्रौद्योगिकी संबंधी कौशल प्राप्त कर रही हैं।

मुझे बताया गया कि वर्तमान में भारत में महिलाओं के लिए गैर-सरकारी विश्वविद्यालयों में वनस्थली विद्यापीठ का स्थान सबसे ऊपर है और फिक्की ने इसे द यूनिवर्सिटी ऑफ द इयर 2016 घोषित किया था और इसने अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त किए हैं। वह दिन दूर नहीं जब हम इस विश्वविद्यालय का नाम विश्व में विश्व विद्यालयों की रैंकिंग में अपेक्षाकृत और ज्यादा उँचे स्थान पर देखेंगे।

प्रिय छात्राओं, आपको यह स्मरण रखना चाहिए कि कोई भी विश्व विद्यालय न केवल अपने वर्तमान छात्रों की वजह से अपितु अपने सफल पुरातन छात्रों के समग्र प्रयासों में संलिप्तता से नई ऊँचाइयों को छूता है। मैं आशा करता हूं कि आप नई उंचाइयां प्राप्त करेंगी और न केवल अपनी इस मातृ संस्था की सफलता में अपितु समाज, राष्ट्र और इस संसार की भलाई में भी योगदान देंगी।

आज, हम इस बात पर गर्व महसूस करते हैं कि हमारे देश ने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर ली है। हमारे विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थाओं ने बड़ी संख्या में वैज्ञानिक एवं वृत्तिकों को तैयार किया है जो अपने-अपने क्षेत्रों में अभूतपूर्व योगदान दे रहे हैं। फिर भी, हमें आत्म संतुष्ट नहीं होना चाहिए। यहां तक कि 'सर्वोत्तम' भी 'बेहतर' बन सकता है।

मुझे यह जानकारी दी गई कि पिछले एक दशक में वनस्थली ने विज्ञान संबंधी शिक्षा एवं अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बुनियादी विज्ञानों में छात्राओं का नामांकन तीन गुना हो चुका है और अनेक उत्कृष्टता केन्द्र स्थापित किए गए हैं। विज्ञान केन्द्रों का दौरा करते समय भी, मैं अत्याधुनिक बुनियादी सुविधाएं, अत्याधुनिक उपस्करों से सुसज्जित विश्व स्तरीय प्रयोगशालाएं देख पाया। मुझे विश्वास है कि आज स्नातक हो रही हमारी युवा महिला वैज्ञानिक इस राष्ट्र की अमूल्य सम्पत्ति हैं। मैं आप सबको बधाई देता हूं और एक उत्तम और परिपूर्ण जीविका जीवन की ऐसी कामना करता हूं।

प्रिय छात्राओं,

हमारे देश का एक लंबा, स्वर्णिम इतिहास है। प्रसिद्ध दार्शनिक विल डुरांट ने कहा था : "भारत हमारी नस्ल की मातृभूमि है, और संस्कृत यूरोपीय भाषाओं की जननी है: वह हमारे दर्शन शास्त्र की जननी है; वह हमारे दर्शन शास्त्र की जननी है; अरबियों के माध्यम से हमारे अधिकांश गणित की जननी; बुद्ध के माध्यम से ईसाई-धर्म में सम्मिलित आदर्शों की जननी; और ग्राम समुदाय के माध्यम से स्व-सरकार और लोकतंत्र की जननी है। भारत माता अनेक रूपों में हम सभी माता है। "

कृपया महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आंईसटीन द्वारा कही गई इस बात पर गौर करें "हम भारतीयों के अत्यंत ऋणी है जिन्होंने हमें गणना करनी सिखाई जिसके बिना किसी भी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज का होना सम्भव नहीं था।”

आपको और मुझे यह बौद्धिक एवं दार्शनिक परम्परा विरासत में प्राप्त हुई है। प्रश्न यह है कि इस महान विरासत से हम कितने परिचित हैं। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उत्कृष्टता की इस खोज को हम कितने आगे तक जारी रख सकते हैं? मित्रों, इसका उत्तर प्रत्येक भारतीय के मन और मस्तिष्क में मौजूद है। हमें यह जानना होगा कि भारत की पहचान क्या है और फिर निष्ठापूर्वक एवं समर्पण के साथ इस मनोरम वृद्ध को लगातार सींचना होगा। संकोच और नैराश्य को नष्ट करना होगा।

अब जबकि हमारा देश वृद्धि एवं विकास के नये-नये मानदण्डों को हासिल करने के लिए उद्यत है, इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसमें महिला सशक्तिकरण महत्वपूर्ण निर्धारक घटक होगा और मेरा यह मानना है कि शिक्षा महिलाओं के सशक्तिकरण का सर्वोत्तम मार्ग है। हमारे देश के समक्ष अभी विकट चुनौतियां हैं। हमारी एक-तिहाई महिला आबादी पढ़ने और लिखने में अक्षम है। उच्चतर शैक्षणिक संस्थाओं में महिलाओं के नामांकन की दर पुरुषों से काफी कम है। पुरुषों और महिलाओं के बीच के इस अन्तर को पाटने की आवश्यकता है। साक्षरता एवं शिक्षा सशक्त, समावेशी महिलाओं के प्रति उत्तरदायी भारत की नींव हैं।

आज, हमें कार्य नीतिक रूप से मिल जुलकर कार्य करने और एक विकसित राष्ट्र बनने की आवश्यकता है। मानव संसाधनों को समृद्ध बनाना होगा। नियोज्यता में वृद्धि करने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के शैक्षणिक अवसर उपलब्ध करवाने की दिशा में हमें कर्मठतापूर्वक कार्य करना होगा। हमें धन सृजन और समावेशी वृद्धि में योगदान देने के लिए सम्यक ज्ञान, कौशल और नजरिए वाले पुरुषों एवं महिलाओं की आवश्यकता है। जनांकिकीय संरचना की वजह से हमारे देश को विशिष्ट लाभ मिला है। हमारी लगभग दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम आयु वर्ग की है। ज्ञान एवं कौशल से परिपूर्ण यह वर्ग एक बहुत बड़ा जनांकिकीय फायदा पहुँचा सकता है। आज राष्ट्र के समक्ष यही कार्य नियत है। सरकार बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से इन चुनौतियों का सामना कर रही है। तथापि यह समाज का अभियान होना चाहिए जिसमें जैसी आपकी संस्था की भूमिका महत्वपूर्ण बन जाती है।

मेरे लिए, वनस्थली विद्यापीठ परम्परा और आधुनिकता का प्रतीक है। मुझे ज्ञात हुआ है कि पुस्तकालय में अनेक दुर्लभ पुस्तकें हैं जिन्हें डिजिटलीकरण के द्वारा संरक्षित किया गया है। डिजिटल भारत, कौशल भारत और स्वच्छ भारत का समामेलन इस परिसर में देखा जा सकता है जो कि प्रशंसनीय है। हाल ही में अटल इंक्यूबेशन सेंटर की स्थापना से, यह संस्था अपने युवा उद्यमियों पर भी गर्व कर पायेगी और स्टार्ट-अप इंडिया अभियान के लिए भी अनुकरणीय बन पाएगी।

वनस्थली विद्यापीठ की पंचमुखी शिक्षा की अनूठी शैक्षिक विचारधारा है और संघर्ष एवं वैभव के इन 82 वर्षों के दौरान यह महिला शिक्षा की प्रमुख संस्था के रूप में उभरा है तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एकाधिकार रूपों में अपनी अनूठी पहचान बनाने की ओर अग्रसर है।

Yमित्रों, इस गतिशील विश्वविद्यालय जो बहुत ज्यादा अनुकूलनीय है, में अध्ययन का अवसर पाने के लिए आप अत्यधिक सौभाग्यशाली हैं। यह हमारी समृद्ध उर्वर भूमि में अवस्थित है। तथापि, यह आपको चहुंदिशा से ज्ञान की ताजी हवा की अनुभूति करवाती है। यह विवेक के तेज प्रकाश से आपको अनुप्राणित और आलोकित करती है।

वनस्थली विद्यापीठ का प्रतीक चिह्न हमारे प्राचीन संस्कृत के अवतरण "सा विद्या या विमुक्तये" (विद्या वह है जो मुक्त कर दे) की ही भावना से ओत-प्रोत है। मैं आशा करता हूं कि आगामी वर्षों में आप और ज्यादा सफलता प्राप्त करते हुए आगे बढ़ें। मैं महिला शिक्षा के क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित करने वाली वनस्थली विद्यापीठ के ज्ञान के प्रतीक के रूप में अनेक वर्षों तक यशस्वी बने रहने की भी कामना करता हूं।"