07 अगस्त, 2018 को नई दिल्ली में ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के सातवें दीक्षांत समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | अगस्त 7, 2018

" मुझे जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह का हिस्सा बनने में बहुत प्रसन्नता हो रही है जो सामाजिक विज्ञान और मानविकी में उत्कृष्टता के केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है।

दीक्षांत समारोह स्नातक छात्रों के लिए महत्वपूर्ण अवसर होते हैं क्योंकि यह उनके वर्तमान कार्यों की समाप्ति और अपने सपनों को साकार करने के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत का अवसर है। मैं सभी स्नातक छात्रों को अपनी शुभकामनाएं देता हूं। मैं उनके माता-पिता और इस विश्वविद्यालय के शिक्षकों को भी बधाई देना चाहूंगा।

मुझे विश्वास है कि ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी द्वारा रखी गई अकादमिक नींव इन युवा प्रतिभाओं को वास्तविक दुनिया में स्थान बनाने और भारत को गौरव प्रदान करने के लिए तैयार करेगी।

प्रिय बहनों और भाइयों, शिक्षा को न केवल वर्तमान और भावी चुनौतियों का सामना करने के लिए छात्रों को कौशल और ज्ञान के साथ युक्त करना चाहिए, बल्कि उनमें मानवीय मूल्यों, सहिष्णुता, नैतिक और करुणामय व्यवहार को भी बढ़ावा देना चाहिए। एक मजबूत नैतिक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति अडिग रहेगा या सत्यनिष्ठा के साथ समझौता नहीं करेगा। शिक्षा को मनुष्य में सर्वश्रेष्ठ गुणों को विकसित करना चाहिए और व्यक्ति का समग्र विकास करना चाहिए।

यहां, मैं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रसिद्ध शब्दों को याद करना चाहता हूं, जिन्होंने कहा था: " ऐसी शिक्षा जो हमें अच्छे और बुरे के बीच भेदभाव करना नहीं सिखाती है, अच्छे को गले लगाना और बुरे को छोड़ना नहीं सिखाती है, ऐसी शिक्षा भ्रामक है "। जब भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था, राष्ट्रपिता ने यह भी कहा था कि: शिक्षा इतनी क्रांतिकारी होनी चाहिए कि यह साम्राज्यवादी शोषक की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के बजाय सबसे गरीब ग्रामीणों की आवश्यकताओं की पूर्ति करे।

शिक्षा एक ऐसा आधार है जिस पर एक राष्ट्र और उसके लोगों की प्रगति निर्भर करती है। वैश्वीकरण और भौतिकवाद के वर्तमान युग में हमें ऐसी शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है जो न केवल उत्कृष्टता के नए मानक स्थापित करे बल्कि देखभाल और सहभाजन के दृष्टिकोण को भी बढ़ावा दे, एक समावेशी दृष्टिकोण पैदा करे और प्रकृति के साथ एक होने की आवश्यकता को बढ़ावा दे।

जब हम भविष्य की चुनौतियों को पूरा करने की योजना बनाएं, तब हमें अपने अतीत को नहीं भूलना चाहिए। भारत को एक समय 'विश्ववगुरु' के रूप में जाना जाता था,जहां दुनिया भर के शोधकर्ता और ज्ञान-साधक नालंदा और तक्षशिला जैसे शिक्षा केंद्रों में अध्ययन के लिए आते थे। समय आ गया है कि भारत एक बार फिर ज्ञान और नवाचार का वैश्विक केंद्र बनने की अपनी क्षमता को फिर से तलाशे। हमें शिक्षा प्रणाली में सुधार करके अकादमिक उत्कृष्टता लाने के लिए सही पारिस्थितिक तंत्र बनाने की जरूरत है।

अच्छे मुखौटों वाली चमकदार इमारतों की संख्या बढा़ना और अधिक विश्वविद्यालयों की स्थापना करना ही पर्याप्त नहीं है। हमें बदलती जरूरतों के अनुसार शिक्षा प्रणाली को पुनर्विन्यासित करना होगा और छात्रों को अप्रत्याशित और नई चुनौतियों से निडरतापूर्वक निपटने और उन पर विजय पाने में सक्षम बनाना होगा। इसके लिए हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों को शिक्षण के अपने तरीकों को पुनर्निर्मित करना चाहिए और ‘सब चलता है’ जैसा दृष्टिकोण छोड़कर कठोर शैक्षिक मानक बनाने चाहिए।

भारत आज एक युवा राष्ट्र है जिसका लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा 35 साल से कम उम्र की आबादी का है। किसी अन्य राष्ट्र को इस तरह का बड़ा जनांकिकीय लाभ प्राप्त नहीं है। युवाओं को सही शिक्षा, ज्ञान और कौशल प्रदान करके हमें इस विशाल मानव पूंजी को राष्ट्रीय संपत्ति सर्जकों में परिवर्तित करने की जरूरत है।

प्रिय छात्रों,

भारत आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और आप सभी को विभिन्न क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में अवसर प्राप्त होंगे। आज जब भारत के अगले 15-20 वर्षों में दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने की संभावना है, आप सभी को अपने सपनों को साकार करने और देश के विकास में योगदान देने के लिए सही दिशा में अपने ज्ञान, कौशल और ऊर्जा को लगाना होगा।

जब आप अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आगे बढ़ते हैं, तब जीवन आसान नहीं होता है। बाधाएं, आघात और कठिन परिस्थितियां आपके रास्ते में आएंगी। आपको कठिन समय का सामना करना पड़ेगा। लेकिन आपको अपने लक्ष्यों तक पहुंचने से कोई भी बाधा रोक न पाए या विचलित न कर पाए। आपको पूर्ण समर्पण और दृढ़ संकल्प के साथ अपने रास्ते पर विचलित हुए बिना चलते रहना चाहिए। याद रखें कि कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है।

मेरा मानना है कि सफलता प्राप्ति जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए और मैं सभी प्रसन्न स्नातक छात्रों से आग्रह करता हूँ कि वे अपने-अपने व्यवसाय क्षेत्र में प्रवेश करने वाले हैं अत: वे नैतिक ईमानदारी से कार्य करें और गरिमा तथा सम्मान के साथ आचरण करें।

छात्र को कौशल और ज्ञान से युक्त करने के अलावा, शिक्षा को व्यक्ति को ज्ञान भी प्रदान करना चाहिए। सुव्यवस्थित उच्च शिक्षा का महत्व अत्यधिक है। गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा राष्ट्र के आर्थिक और मानव विकास में योगदान देती है। भारत एक समृद्ध मध्यम आय वाला देश बनने की अपनी यात्रा आरंभ कर रहा है और मुझे कोई संदेह नहीं है कि नवोन्मेषी अत्याधुनिक विश्वविद्यालय इस विशाल परिवर्तन के चालक होंगे। इस संदर्भ में मैं प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के 'सुधार(रिफॉर्म), प्रदर्शन(परफॉर्म) और परिवर्तन(ट्रान्स्फोर्म)' तीन शब्द मंत्रों को याद करना चाहता हूं। इस प्रकार, समृद्धि के लिए भारत के परिवर्तन का मुख्य चालक शिक्षा होगी।

मुझे विश्वास है कि ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान सीखने और शोध की गुणवत्ता को बढ़ाने की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे जिससे भारत को प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने में लाभ मिलेगा।

उच्च शिक्षा से संबंधित भारत के ज्ञान आयोग की रिपोर्टों में भारतीय विश्वविद्यालयों में खासकर शिक्षण और शोध के अभिनव तरीकों में जो सामाजिक समस्याओं को हल करेंगे और हमारी युवा आबादी के सपनों को पूरा करेंगे, गुणात्मक और मात्रात्मक विकास की बात कही गयी है ।

दुख की बात है कि पिछले कुछ वर्षों में विश्व विश्वविद्यालय रैंकिंग में दुनिया के शीर्ष 200 संस्थानों की सूची में एक भी भारतीय विश्वविद्यालय का स्थान नहीं है। मुझे इस तथ्य का भलीभाँति भान है कि चीन जैसे अन्य विकासशील देशों ने गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कदम उठाए हैं जबकि भारत अभी पीछे है। हमें खासतौर से दुनिया भर के अन्य विश्वविद्यालयों, जो कम अवधि में आगे बढ़ चुके हैं, की सर्वोत्तम प्रक्रियाओं से सीखकर इस निराशाजनक परिदृश्य को बदलने और अपने विश्वविद्यालयों में नए मूल्यों और भविष्योन्मुखी सोच जागृत करने की जरूरत है।

शिक्षा और विशेष रूप से उच्च शिक्षा समाज में परिवर्तन लाने का एक महत्वपूर्ण घटक रहा है। हमें अपने विश्वविद्यालयों में शिक्षण, संकाय, अनुसंधान और क्षमता निर्माण की गुणवत्ता से संबंधित मानकों को संवर्धित करना है ताकि वे ज्ञान के निर्माण के क्षेत्र में भारत के स्तर को बढ़ा सकें और हमारे युवाओं को करियर बनाने के ऐसे अवसर भी प्रदान कर सकें जो अर्थपूर्ण और लाभप्रद हों । जनसमुदायों के जीवन स्तर में सुधार करने की भारत की खोज सीधे शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ी है।

मैं 'गुणवत्ता' शब्द पर जोर देना चाहता हूं क्योंकि हमने देखा है कि पिछले दो दशकों में हमारे 'युवाओं की संख्या में अत्यधिक वृद्धि' को समायोजित करने के लिए कई नए विश्वविद्यालय खुले हैं। हालांकि यह दुख की बात है कि शिक्षण और शोध की गुणवत्ता में कोई ऐसी उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है जो भारत को दुनिया के सर्वोत्तम विश्वविद्यालयों की श्रेणी में लाये।

हमारे संस्थान अभी भी अनावश्यक नौकरशाही, संकीर्ण अकादमिक राजनीति और दूरदर्शी प्रशासनिक नेतृत्व के अभाव से ग्रस्त हैं। वित्तीय कमजोरी और उच्च शिक्षा की निम्न गुणवत्ता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूं कि नए और अभिनव विश्वविद्यालयों की स्थापना में निजी क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान अत्यावश्यक हैं।

वित्त पोषण और विस्तार के लिए राज्य पर अत्यधिक निर्भरता वैश्वीकरण के युग में एक व्यवहार्य विकल्प नहीं है। बढ़ती और उभरती हुई शक्ति के रूप में, भारत को अपनी व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन लाने के लिए कमर कसनी होगी। हमारे विश्वविद्यालयों में सुधार की इस आशा का दायित्व हम सभी पर खासतौर पर उच्च शिक्षा संबंधी विभिन्न सरकारी मंत्रालयों, शिक्षाविदों और निजी क्षेत्र पर भी है।

विश्व स्तरीय विश्वविद्यालयों के निर्माण के लिए हमें दुनिया भर के अनुभवों से सीखना चाहिए और दुनिया भर के शीर्ष रैंक वाले सार्वजनिक और निजी विश्वविद्यालयों पर एक नज़र डालने मात्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि गैर-लाभकारी प्रणाली शिक्षण, अनुसंधान और क्षमता निर्माण में उत्कृष्टता सुनिश्चित करने का एक प्रभावी तरीका है।

सुदृढ़ , गैर-लाभकारी, परोपकारी निजी विश्वविद्यालय जिनका लक्ष्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना और अकादमिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देना हो, को जल्द से जल्द स्थापित करना होगा। मौजूदा सार्वजनिक विश्वविद्यालयों, जो संकाय और बुनियादी ढांचे के लिए अपर्याप्त वित्त पोषण से पीड़ित हैं, के विकास के साथ-साथ यह प्रक्रिया चलनी चाहिए । भारत में उच्च शिक्षा को पेश आ रहे संकट का एक उचित समाधान गैर-लाभकारी प्रणाली की शुरुआत और विस्तार हो सकता है। निजी संस्थानों द्वारा प्रभावी ढंग से ऐसा किया जाता है, यह इस सिद्धांत पर कार्य करता है कि संस्था द्वारा अर्जित अतिरिक्त आय को अपने पास रखा जाता है और अनुसंधान पहल, छात्रवृत्ति और फेलोशिप और बुनियादी ढांचे के विकास जैसे अकादमिक विकास के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

आज वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि हमारे ज्ञान और मानव पूंजी के सृजन में अधिक मूल्य कैसे सृजित किए जाएं और अच्छे शैक्षिक संस्थानों को कैसे पोषित किया जाये ?

मेरा मानना है कि हमारे विश्वविद्यालयों में छात्र क्रियाशीलता, संयुक्त संकाय अनुसंधान और संयुक्त परियोजनाओं को सुनिश्चित करने के लिए दुनिया के सर्वोत्तम संस्थानों के साथ सहयोग के लिए खुले दरवाजे होने चाहिए। इस तरह, हमारी व्यवस्था की कुछ कमियों को ज्ञान अंतरण के माध्यम से दूर किया जा सकता है। हम ऐसे युग में हैं जहां नवाचार का यह मतलब नहीं है कि विश्वविद्यालय प्रबंधन और कार्य करने के सभी पहलुओं को उलट-पलट दिया जाये। हम आसानी से अच्छे विचार ग्रहण कर सकते हैं और उन्हें भारतीय स्थितियों के अनुसार अनुकूलित कर सकते हैं, बशर्ते कि हमारे पास खुले दिमाग हों।

सुधार का एक प्रमुख क्षेत्र है देश भर के सर्वश्रेष्ठ छात्रों को शिक्षा को पूर्णकालिक करियर के रूप में अपनाने और उन्हें विश्वविद्यालय संकाय सदस्यों के रूप में बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करने की अनिवार्यता। अच्छी अकादमिक प्रतिभा के प्रतिधारण के अलावा ज्ञान का लोकतंत्रीकरण भी आवश्यक है। दुनिया भर से अकादमिक प्रतिभा को आकर्षित करने के लिए हमें अपनी संकाय भर्ती नीतियों की पुन: समीक्षा करने की आवश्यकता है।

मैंने देखा है कि ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में दुनिया भर के शीर्ष विश्वविद्यालयों से भर्ती किए गए पूर्णकालिक विदेशी संकाय सदस्यों की बड़ी संख्या है। वैश्विक प्रतिभा के साथ हमारे उच्च शैक्षिक लक्ष्यों को जोड़ने के लिए ऐसे अधिक नवाचारों की आवश्यकता होगी। ।

हमें विदेशों में काम करने वाले उच्च योग्यता प्राप्त भारतीयों के वापस आकर हमारे ही विश्वविद्यालयों में काम करने के लिए अनुकूल बौद्धिक वातावरण बनाने की भी आवश्यकता है।

मैं इस विश्वविद्यालय के कुलपति श्री नवीन जिंदल को यह सुनिश्चित करने के लिए बधाई देना चाहता हूं कि गुणवत्ता, अनुसंधान और अकादमिक उत्कृष्टता इस संस्था की आधारशिला हैं। इस विश्वविद्यालय के संकाय सदस्यों के लिए आप इन स्नातक छात्रों की पेशेवर सफलता और नैतिक सत्यनिष्ठा का मूल प्रेरक बल हैं। इन स्नातक छात्रों के जीवन को बदलने के लिए प्रोफेसरों को बधाई।

मैं स्नातक छात्रों को एक बार फिर बधाई देकर अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा। याद रखें कि सार्वजनिक कल्याण में मूल्यवान योगदान करने के लिए भारत और दुनिया आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप स्नातक होने के बाद कौन सा पेशा अपनाते हैं, बस हमेशा अपने उच्च नैतिक मूल्यों को अपने मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में सामने रखें।

मेरे युवा मित्रों को शुभकामनाएँ!

जय हिन्द!"