05 जुलाई, 2018 को पोर्ट ब्लेयर के डॉ. बी .आर. अम्बेडकर प्रौद्योगिकी संस्थान में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

पोर्ट ब्लेयर | जुलाई 5, 2018

"आप सभी के साथ बातचीत करने और आपसे अपने विचार साझा करते हुए मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है।

भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से अपनी उच्च शिक्षा प्रणाली के विस्तार सहित विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से कदम उठाए हैं।

आज 65 प्रतिशत से अधिक भारतीय 35 साल से कम उम्र के हैं। ऐसी संभावना है कि भारत 2030 तक दुनिया का सबसे युवा देश होगा, जिसमें 140 मिलियन लोग उच्च शिक्षा के संस्थानों में प्रवेश करने के लिए तैयार होंगे।

हमारे पास भारत में लगभग 800 विश्वविद्यालय हैं जो पूरे देश में लाखों छात्रों की शैक्षणिक आवश्यकताओं को पूरा कर रहे हैं। ऐसी संभावना है कि दुनिया के हर चार स्नातकों में से एक स्नातक भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली से होगा।

हालांकि, हमें राष्ट्र निर्माण के लिए जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाने के लिए उच्च शिक्षा की "गुणवत्ता" में सुधार करने की आवश्यकता है।

भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली को तेजी से बदलती ज्ञान अर्थव्यवस्था की उभरती हुई चुनौतियों से निपटने के लिए खुद को पुन: तैयार करने की जरूरत है।

केजी से पीजी तक हमारी शिक्षा प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है ताकि इसे अधिक दृढ़ , प्रभावी और गुणवत्ता उन्मुख बनाया जा सके जिसमें महज प्रमाण पत्र धारकों को पैदा करने के बजाय समग्र व्यक्तित्व विकास पर जोर दिया जाए। वैश्विक 21 वीं सदी के ज्ञान समाज की चुनौतियों से निपटने के लिए शिक्षण विधियों, पाठ्यक्रम और सीखने की प्रक्रियाओं में परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

हमारे विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से बाहर आने वाले छात्रों को निस्संदेह तकनीकी-रूप से समझदार और विद्वान होना चाहिए। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनमें सुदृढ नैतिक और आचार मूल्यों के साथ-साथ अडिग सत्यनिष्ठ और ईमानदारी होनी चाहिए। उनमें बुजुर्गों और शिक्षकों के लिए सहानुभूति, करुणा और सम्मान का भाव होना चाहिए।

वास्तव में, भारत को प्राचीन काल में 'विश्वगुरु' के रूप में जाना जाता था और दुनिया भर के ज्ञान-साधक नालंदा और तक्षशिला जैसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में आकर अध्ययन करते थे। शिक्षा के अपने मानकों में बड़े पैमाने पर सुधार करके और नए मानक स्थापित करके हमें भारत को फिर से अत्याधुनिक ज्ञान और नवाचार का केंद्र बनाना होगा।

भारतीय शैक्षिक संस्थानों को प्रौद्योगिकी संचालित डिजिटल युग में एक छाप छोड़ने के लिए, हमें अनुसंधान को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने की जरूरत है। आधुनिक प्रयोगशालाओं से लैस करके हमारे उच्च शैक्षणिक संस्थानों में नवाचार का एक पारिस्थितिक तंत्र बनाया जाना चाहिए। विश्वविद्यालयों और उद्योग के बीच संबंधों को मजबूत करने की जरूरत है और सामाजिक समस्याओं को हल करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए अनुसंधान उन्मुख परियोजनाओं में अधिक निवेश किए जाने की आवश्यकता है।

हमें बचपन से ही वैज्ञानिक प्रवृत्ति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना होगा। बच्चों को रट कर सिखाने पर ध्यान देने के बजाए हस्तगत प्रयोगों के माध्यम से सिखाया जाना चाहिए। प्रसिद्ध चीनी दार्शनिक, कन्फ्यूशियस ने कहा था, "मैं सुनता हूं और भूल जाता हूं, मैं देखता हूं और मुझे याद रहता है, मैं करता हूं और मैं समझता हूं।"

जैसा कि आप सभी जानते हैं, ज्ञान और सशक्तिकरण के माध्यम से समाज के परिवर्तन के लिए शिक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है। 'वास्तविक शिक्षा' को छात्रों के सर्वांगीण विकास को बढ़ावा देना चाहिए। इसे स्वरोजगार या लाभकारी रोजगार के लिए अकादमिक उत्कृष्टता और कौशल पर भी समान रूप से जोर देना चाहिए।

दोस्तों, भारत सबसे तेजी से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था है और आपके पास प्रचुर अवसर हैं। आप सभी को मेरी सलाह है कि आप महज रोजगार तलाशने वाले नहीं बल्कि रोजगार सर्जक बनने की कोशिश करें। रचनात्मक, अभिनव बनें और नए क्षेत्रों का पता लगाने की कोशिश करें। सदमों से डरो मत। समर्पण, जुनून, प्रतिबद्धता, परिश्रम, अनुशासन और दृढ़ता से आप अपने सपने पूरे कर पाएंगे और अपने लक्ष्य को प्राप्त करेंगे।

शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं को बदलते शैक्षिक और रोजगार परिदृश्यों के संबंध में अगले 30-50 वर्षों के लिए रोडमैप तैयार करने की आवश्यकता पर ध्यान देना चाहिए। अगले कुछ दशकों में किस तरह के पेशेवरों की आवश्यकता होगी और भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपनी शिक्षा प्रणाली को कैसे बदलें?

मुझे यह जानकर खुशी हो रही है कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का प्रशासन युवाओं, जो लगभग चार लाख आबादी में से लगभग 1.1 लाख हैं, को दवा, इंजीनियरिंग, आतिथ्य, समुद्री और विधि के क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए काफी अच्छे अवसर प्रदान कर रहा है।

हालांकि इन द्वीपों में युवाओं के लिए उच्च शिक्षा के अवसर काफी अच्छे हैं, किंतु रोजगार के अवसर बहुत सीमित हैं। इसलिए छात्र मुख्य भूमि भारत को रोजगार के लिए संभावित क्षेत्र के रूप में लगातार देखते हैं।

पिछले कुछ सालों में, पूरी दुनिया में हमारे देश के प्रति धारणा में काफी सुधार हुआ है और ये द्वीप आसियान देशों के करीब होने के कारण, छात्र आसियान क्षेत्र में रोजगार के अवसरों की भी तलाश कर सकते हैं। यह तभी संभव है जब छात्रों का शैक्षणिक स्तर अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता के अनुरूप हो।

हम सभी जानते हैं कि बाजार बहुत प्रतिस्पर्धी बन गया है और अभिनव उत्पादों की मांग प्रति दिन बढ़ रही है। मैं सभी युवाओं को सलाह दूंगा कि वे समकालीन वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए एक साथ कई कार्यों को संभालने की मानसिकता विकसित करें और उनमें दो से अधिक क्षेत्र में कौशल हो।

पहचान बनाने के लिए नए समाधान या उत्पादों सहित अभिनव और अलग सोच की आवश्यकता है। जैसा कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा बार-बार प्रोत्साहित किया गया था, बड़ा सपना देखें, उच्च लक्ष्य बनाएं और अपने सपने को साकार करने के लिए मिशनरी उत्साह और सुस्थिर प्रतिबद्धता के साथ काम करें ।

प्रिय छात्रो और संकाय सदस्यो,

ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती है और डिजिटल लर्निंग संसाधन उपलब्ध होने से, अब आप पहले से कहीं ज्यादा आसानी से दुनिया भर से संसाधनों को प्राप्त कर सकते हैं। कृपया उनका पूरी तरह से उपयोग करें और जब आप अधिक कुशल बनें, उत्कृष्टता का लक्ष्य रखें। संतुष्ट मत बनो। हमेशा दुनिया में श्रेष्ठ होने के लिए कड़ी मेहनत करें। यही दृष्टिकोण संकाय और छात्रों को अपनाना चाहिए। आखिरकार, न केवल प्राचीन भारत में बल्कि समकालीन दुनिया में भी, दुनिया की सर्वश्रेष्ठ आईटी कंपनियों के शीर्ष पर भारतीय हैं। माइक्रोसॉफ्ट के सत्य नाडेला और गुगल के सुंदर पिचाई और अन्य लोगों ने भारत को गौरवान्वित किया है। आपको उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।

आपके संस्थान का नाम आधुनिक भारत के एक महान सपूत के नाम पर भी रखा गया है, जो अपने असाधारण ज्ञान और कड़ी मेहनत से एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गया और जिसने हमारे संविधान को आकार दिया। डॉ अम्बेडकर शिक्षा की उस शक्ति और सशक्तिकरण का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं जो ज्ञान हमारे जीवन में लाता है।

आपके भावी प्रयासों के लिए आप सभी को मेरी शुभकामनाएँ।

जय हिन्द!"