05 अगस्त, 2018 को हैदराबाद में सीएसआईआर-आईआईसीटी के प्लेटिनम जयंती समारोह (इंडियन इन्स्टिटूट ऑफ रासायनिक प्रौद्योगिकी) का उद्घाटन करने के उपरांत सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | अगस्त 5, 2018

"यह वास्तव में सीएसआईआर आईआईसीटी के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है जो 74 साल की सेवा पूरी करने के पश्चात आज अपने रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर रहा है।

मैं इस अवधि में हमारे देश के विकास में योगदान करने के लिए इसके पिछले और वर्तमान नेतृत्व, कर्मचारियों और छात्रों को बधाई देना चाहता हूं।

मुझे यकीन है कि संस्थान आने वाले वर्षों में अधिक जोश के साथ उत्कृष्टता की इस खोज को जारी रखेगा।

प्रिय बहनो और भाइयो,

सतत विकास के लिए विज्ञान प्रमुख उत्तोलक है और देश की समृद्धि और सुरक्षा सीधे इसकी वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति पर निर्भर है।

पेनिसिलिन से लेकर अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों तक की वैज्ञानिक खोजों ने दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया है। आधुनिक दवाएं, इंटरनेट, ई-कॉमर्स, डिजिटल लर्निंग, कृषि में नवाचार, जैव-प्रौद्योगिकी, निर्माण और आधारभूत संरचना कुछ ऐसी खोजें हैं जिनका हमारे जीवन पर गहरा परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ा है।

इन खोजों की अगुआई सामान्यतः निजी क्षेत्र के द्वारा की गई है, हालांकि, सरकार की एक बड़ी ज़िम्मेदारी है। इसे नियामक रूपरेखा तैयार करनी है और अनुसंधान और खोजों को पोषित करने के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करना है।

सीएसआईआर, रसायन विज्ञान, जीवविज्ञान, इंजीनियरिंग, समुद्री विज्ञान और सामग्रियों में विशेषज्ञता रखने वाली 38 अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं के नेटवर्क के साथ, भारत सरकार के महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक एजेंडे में बहुत अधिक योगदान कर रहा है। मुझे खुशी है कि आईआईसीटी जैसे संस्थान इस दिशा में काम कर रहे हैं।

ऐतिहासिक रूप से भारत ज्ञान का प्रकाशस्तंभ रहा है। उन्होंने कहा कि हमारी आयुर्विज्ञान की आयुर्वेद प्रणाली बहुत पुरानी ई. पू. 5000 की है और सिंधु घाटी सभ्यता में 2,500 ई.पू. में सिंचाई और मल निकास प्रणाली थी। 200 ई.पू. तक दक्षिण भारत उच्च गुणवत्ता वाले पिटवा लोहा बना रहा था और 'शून्य' का आविष्कार और खगोल विज्ञान में योगदान निःसन्देह सुविख्यात हैं।

आइए हम अपने पूर्वजों द्वारा किए गए कुछ अमूल्य योगदानों को देखें। आर्यभट्ट के 'आर्यभट्टियम' को एक मौलिक कार्य माना जाता है; वराहमिहिर की 'पंचसिद्धांतिका' भी इसी तरह का अग्रणी कार्य है। निःसन्देह, चरक और सुश्रुत को शल्य चिकित्सा के जनक के रूप में जाना जाता है। ऋषि कणाद ने कणाद सूत्र में सर्वप्रथम "अणु" (परमाणु) को पदार्थ का अविनाशी कण बताया, वहीं पतंजलि को योग का जनक माना जाता है। प्राचीन भारत के ऐसे अनगिनत महान वैज्ञानिक थे, जिन्होंने विश्व के वैज्ञानिक खजाने को समृद्ध किया है।

हमें उनकी उपलब्धियों पर गर्व करने और उनसे विरासत में प्राप्त ज्ञान को पूरी दुनिया के साथ साझा करने की आवश्यकता है।

आधुनिक युग में भी विज्ञान में भारत का योगदान काफी महत्वपूर्ण है। 20 वीं शताब्दी की शुरूआत में प्रो. सत्येंद्रनाथ बोस के 'बोसॉन', प्रो. सुब्रमण्यम चंद्रशेखर की 'चंद्रशेखर सीमा', सर सी.वी. रमन के 'रमन प्रभाव' और प्रोफेसर जगदीश चंद्र बोस के 'वायरलेस संचार' ने वैश्विक मान्यता प्राप्त की है। वास्तव में, भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। खोज के लिए सही पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण की एकमात्र आवश्यकता है।

मुझे यह जानकर खुशी हो रही है कि सीएसआईआर कुल 1,207 सरकारी संस्थानों में से 9 वें स्थान पर है जो एक समग्र संकेतक पर आधारित है जो नवीनतम सीमागो रैंकिंग के अनुसार अनुसंधान प्रदर्शन, किए गए खोजों और सामाजिक प्रभाव को जोड़ता है।

हालांकि हमें खोज और आविष्कार की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान एवं विकास में बड़े पैमाने पर निवेश को बढ़ाने की आवश्यकता है। अनुसंधान पर सरकारी खर्च के अलावा निजी क्षेत्र को उदारता से अनुसंधान में सहयोग देने के लिए आगे आने की आवश्यकता है। प्रक्रियात्मक बाधाओं को कम कर, पदानुक्रमित बाधाओं को दूर कर और प्राथमिकताओं को पुनर्निर्धारित कर सभी वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में अनुसंधान और खोज के लिए उपयुक्त पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण किए जाने की आवश्यकता है।

वैज्ञानिक संस्थाओं को प्रतिभावान युवा वैज्ञानिकों को नए और अपरंपरागत विचारों और परियोजनाओं को लाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। उन पथ प्रवर्तक शोधों, जो वर्तमान की एक या अधिक सामाजिक चुनौतियों का जवाब देते हैं, को करने के लिए अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।

जैसा कि आप सभी जानते हैं, 192 देशों के साथ भारत ने संयुक्त राष्ट्र के 17 संपोषणीय विकास लक्ष्यों को अपनाया है। इन लक्ष्यों में गरीबी को इसके सभी रूपों सहित समाप्त करने,भुखमरी को समाप्त करने और संपोषणीय कृषि, अच्छा स्वास्थ्य, समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,लिंग समानता को बढ़ावा देना शामिल है।

यदि हम "जैसा चल रहा है वाला दृष्टिकोण" को अपनाते हैं, तो इन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकता है।

वैज्ञानिक अनुसंधान और खोज कई आयामों पर सामाजिक प्रगति को तेज कर सकता है। सीएसआईआर जैसे संस्थानों का देश को आगे बढ़ाने और इसके सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को बदलने में एक प्रमुख भूमिका है।

प्रिय बहनो और भाइयो,

हमारे पास लगभग 800 विश्वविद्यालय हैं और देश भर में फैले कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक संस्थान हैं।

खोज को प्रोत्साहित करने और लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार के भाग के रूप में, भारत सरकार ने कई पहलों की शुरुआत की है। 'मेक इन इंडिया' भारत को दुनिया के लिए विनिर्माण केंद्र बनाने और लाखों नौकरियों को पैदा करने की परिकल्पना करता है। 'स्वच्छ भारत अभियान' महात्मा गांधी के सपनों का एक स्वच्छ भारत बनाने का इरादा रखता है और हमारे स्वास्थ्य के स्तर में काफी सुधार कर सकता है। जन धन योजना, डिजिटल इंडिया और आधार जैसी योजनाएं देश के आर्थिक विकास में लोगों को साझेदार बनाने का लक्ष्य रखती हैं।

ये सभी कार्यक्रम विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर निर्भर हैं। इन कार्यक्रमों को और बेहतर बनाया जा सकता है और परिणाम अधिक टिकाऊ हो सकते हैं, यदि उन्हें लगातार अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) के प्रयासों द्वारा समर्थन मिलता रहे।

खोज की भावना और वैज्ञानिक वृत्ति, प्रासंगिक प्रश्न पूछने और व्यावहारिक उत्तरों की तलाश करने की भावना हमारे विद्यालय और महाविद्यालय की शिक्षा प्रणालियों का एक अभिन्न अंग बनना चाहिए।

भारत आज एक युवा राष्ट्र है जिसकी लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 साल से कम उम्र की है। हमें इस विशाल मानव पूंजी की क्षमता का पूरा फायदा उठाने की जरूरत है। हमें युवाओं को वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान और कौशल से लैस करना होगा। हमारे विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिक संस्थानों में शिक्षण और शोध की गुणवत्ता में काफी सुधार होना चाहिए।

भारत सरकार स्टार्ट अप इंडिया पहल के माध्यम से अपने नागरिकों के बीच उद्यमी भावना को बढ़ावा दे रही है। यह योजना प्रौद्योगिकी के स्नातकों को नई कंपनियों को शुरू करने का बहुत अच्छा अवसर प्रदान करती है। सीएसआईआर को यह सुनिश्चित करने का उपाय करना चाहिए कि पीएचडी विद्वानों को इन अवसरों का उपयोग करने और उद्यमी बनने के लिए उचित रूप से प्रशिक्षित और निर्देशित किया जाए। मुझे खुशी है कि इस संगठन की कई प्रयोगशालाएं पहले ही इंक्यूबेसन केन्द्रों का आयोजन कर रही हैं और इस गतिविधि को बढ़ावा दे रही हैं।

बहनो और भाइयो,

हालांकि हम विभिन्न मोर्चों पर प्रगति कर रहे हैं, वृद्धिशील प्रगति पर्याप्त नहीं है।

हमें अपनी मौजूदा प्रतिभा को पोषित करने और रचनात्मक व्यवधान और पथ प्रवर्तक नवाचारों को बढ़ावा देने की जरूरत है।

वैज्ञानिक संगठनों को महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को निर्धारित करना होगा और विश्व का अग्रणी संस्थान बनने के लिए रणनीतिक रूप से खुद की जगह बनानी होगी। सरकार को धन, स्वतंत्रता और लचीलापन प्रदान करके उत्कृष्टता के इस खोज को सुविधाजनक बनाना होगा।

मेरे विचार से विज्ञान का लोगों के जीवन पर सबसे बड़ा प्रभाव पड़ता है और आईआईसीटी जैसे संस्थानों को उन क्षेत्रों पर शोध पर ध्यान देना चाहिए जो बड़ी आबादी को प्रभावित करेंगे। उदाहरण के लिए, मैं कृषि और पर्यावरण का उल्लेख करना चाहूंगा जिसमें आपने पहले से ही महत्वपूर्ण योगदान किया है।

भारत मूल रूप से एक कृषि अर्थव्यवस्था है और यह तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक कि किसानों के जीवन में सुधार न हो। वैज्ञानिक संस्थानों को सरकार के प्रयासों का पूरक बनने की आवश्यकता है और मुझे यह जानकर खुशी हो रही है कि सीएसआईआर ने फाइटो-फार्मास्यूटिकल्स और सुगंधित पौधों की खेती के द्वारा किसानों की आय में सुधार के लिए मिशन मोड परियोजनाएं आरंभ की हैं। मुझे सूचित किया गया है कि सीएसआईआर नए और बेहतर फसल संरक्षण रसायनों को उपलब्ध कराने के लिए एक और मिशन की योजना बना रहा है। क्षेत्रवार समस्याओं को हल करने के लिए इस प्रकार का केंद्रित दृष्टिकोण सराहनीय है।

तापमान और वर्षा के असामान्य प्रतिरूपों के साथ-साथ वैश्विक तापवृद्धि हमारे जीवन को प्रभावित कर रही हैं। प्रदूषण लाखों लोगों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहा है। आईआईसीटी जैसे रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थानों को उन प्रक्रियाओं के विकास के लिए पहल करनी होगी जो प्रदूषण को बड़े पैमाने पर कम करे और वैश्विक तापवृद्धि को धीमा करे।

मैं समझता हूं कि सीएसआईआर ने पहले से ही इस क्षेत्र में दो मिशन परियोजनाएं शुरू की हैं और रासायनिक और दवा उद्योगों के लिए नए उत्प्रेरक और संधारणीय प्रक्रियाओं का विकास कर रही है। मुझे यह जानकर भी खुशी हो रही है कि सीएसआईआर वायु प्रदूषण को कम करने के लिए स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल पटाखे के विकास पर काम कर रहा है।

मुझे पता है कि सीएसआईआर-आईआईसीटी की मूल ताकत कार्बनिक रसायन शास्त्र में निहित है और इस क्षेत्र में यह सात दशकों से अधिक समय तक उत्कृष्टता की ओर लगातार बढ़ती रही है।

इन वर्षों के दौरान शोध प्रयासों के परिणामस्वरूप मानव कल्याण के लिए आवश्यक विभिन्न प्रकार के उत्पादों के लिए कई नवीन प्रक्रियाओं के विकास के रूप में हुआ है जैसे दवाएं, कृषि रसायन, खाद्य, आर्गेनिक मध्यवर्ती वस्तुएं, चिपकने वाले पदार्थ इत्यादि।

मुझे प्रसन्नता है कि आज सीएसआईआर-आईआईसीटी को व्यापक रूप से एक मूल्यवान प्रौद्योगिकी भागीदार और फार्मा एंड जेनेरिक, कृषि रसायन और हरित कीटनाशक, खाद्य और पोषण, ऊर्जा और पर्यावरण, बहुलक और कार्यात्मक सामग्री, औद्योगिक उत्प्रेरक और फ़ाइन केमिकल क्षेत्रों के उद्योगों के लिए सक्षम समाधान प्रदाता के रूप में स्वीकार किया जाता है।

इसलिए, मुझे यह बहुत उपयुक्त लगता है कि संस्थान रजत जयंती वर्ष की शुरुआत को मनाने के लिए 6 से 8 अगस्त के दौरान "स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामग्री के लिए संधारणीय रसायन शास्त्र" (एसयूसीएचईएम-2018) नामक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन कर रहा है।

मैंने अतीत में कुछ अवसरों पर सीएसआईआर-आईआईसीटी का दौरा किया है और वहां पर भी वैज्ञानिक बिरादरी के साथ हुई बातचीत को मैंने अभी भी अपने मन में संजोया हुआ है। मुझे दृढ़ विश्वास है कि संस्थान अपने क्षेत्र में वैश्विक रूप से मान्यताप्राप्त सर्वश्रेष्ठ अनुसंधान संस्थान के रूप में उभरेगा।

मैं स्थापना दिवस और वह दिवस जब संस्थान अपने रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर रहा है, के अवसर पर सीएसआईआर-आईआईसीटी के निदेशक डॉ एस चंद्रशेखर,कर्मचारियों और छात्रों को बधाई देता हूं। इस अवसर का उदघाटन कार्यक्रम इस शानदार संस्थान के इतिहास में एक नए गौरवशाली अध्याय की शुरुआत होना चाहिए।

जैसा कि प्राचीन भारतीय संतों ने ईशवास्य उपनिषद में कहा है, "आइए हम मानवता के व्यापक हित और अपना जीवन सदाचारयुक्त बनाने हेतु सत्य की तलाश करें।" आप जिस वैज्ञानिक सत्य की खोज करें, वह हमारे देश और हमारी दुनिया को रहने के लिए बेहतर स्थान बनाए।

जय हिन्द!"