04 सितम्बर, 2017 को तेलंगाना के डा. मेरी चेन्नारेड्डी ह्यूमन रिसोर्स डेवलेपमेंट इंस्टीट्यूट में एआईएस और सीसीएस अधिकारियों के लिए 92वें बुनियादी पाठयक्रम के उदघाटन के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का अभिभाषण

हैदराबाद | सितम्बर 4, 2017

मुझे आज बुनियादी पाठयक्रम के उद्घाटन सत्र में आप सभी के समक्ष बोलते हुए खुशी का अनुभव हो रहा है। यह पाठ्यक्रम आपके कैरियर की बुनियाद है और यह आपकी भावी उपलब्धियों की दिशा में प्रारंभिक प्रयास है।

मैं इस पेशे को चुनने के लिए आपको बधाई देता हूँ, इससे आपको देश की सेवा करने के लिए कुछ अत्यधिक रोचक और चुनौतीपूर्ण अवसर मिलेंगे। अखिल भारतीय सेवाओं की शुरुआत 1765 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सरकारी रिकार्डो में प्रयुक्त 'सिविल सेवक' की अवधारणा में निहित है और यह गवर्नर जनरल कार्नवालिस ही थे जिन्होंने अनुबद्ध सिविल सेवा (उच्चतर सिविल सेवा) और गैर- अनुबद्ध सिविल सेवा (निम्नतर सिविल सेवा) पदों की शुरूआत की थी।

मूल रूप से यह सेवा सिर्फ अंग्रेजों के लिए ही बनाई गई थी। भारतीयों को 1870 के बाद उस समय इन सेवाओं के लिए प्रतियोगिताओं में बैठने की अनुमति दी गई जब 1870 में भारतीय सिविल सेवा अधिनियम पारित किया गया था। भारत के स्वतंत्र होने के बाद संस्थापक सदस्यों ने अखिल भारतीय सेवाओं को बनाने की आवश्यकता पर बहस की और यह निर्णय लिया कि सिविल सेवाओं को बनाया जाना आवश्यक है जिससे राष्ट्र को एकीकृत करने में गति मिलेगी।

स्वतंत्र भारत में अखिल भारतीय सेवाओं को स्थापित करने का श्रेय भारत के प्रथम गृह मंत्री और समूचे देश को राजनीतिक दृष्टि से एकीकृत करने वाले महान प्रणेता श्री सरदार पटेल को जाता है।

भारत की स्वतंत्रता के पश्चात सिविल सेवाओं में बदलाव लाया जाना था। सेवा कर रहे विदेशी स्वामियों से परिवर्तित हुए प्रशासकों से यह आशा की गई थी कि वे संवैधानिक उपबंधों के आधार पर शासन के प्रजातांत्रिक ढांचे में रहकर लोगों की सेवा करेंगे।

इसके लिए महज प्रशासन करने अथवा दक्षतापूर्वक कार्यों को करने पर जोर दिए जाने की बजाय पूर्ण हृदय से देश की सेवा करने पर बल देने की आवश्यकता थी जैसा कि सरदार बल्लभ भाई पटेल ने 21 अप्रैल 1947 को नई दिल्ली में मेटकाफ हाउस में सिविल सेवा के परिवीक्षाधीन अधिकारियों को अपने प्रथम संबोधन के समय खूबसूरती से कहा था कि :

"सेवा अब विगत की परम्पराओं और आदतों में जकड़े बिना राष्ट्र की सेवा करने के लिए मुक्त होगी अथवा उन्हें इस भूमिका को अपनाना होगा।"

अधिकारियों को अपने दिन-प्रतिदिन के प्रशासन के कार्य में वास्तविक सेवाभाव से कार्य करना होगा, क्योंकि कोई अन्य तरीका कारगर नहीं होगा।

आपके पूर्ववर्ती अधिकारी ऐसी प्रथाओं की देन थे जिसमें वे आम आदमियों से अलग हटते गए और उनसे कट गए। यह आपका परम कर्तव्य होगा कि आप भारत के आम आदमियों को अपना मानें अथवा इस प्रकार से कार्य करें कि आप स्वयं को उनमें से एक मानें।

आप सभी उन अनेक सिविल सेवकों द्वारा पीछे छोड़ी गई विरासत के उत्तराधिकारी हैं जिन्होंने हमारे देश के संस्थापकों और सरदार पटेल जैसे स्वप्नदर्शी नेताओं के इस महान दृष्टिकोण को आत्मसात किया।

आप गत सत्तर वर्षों में बनाई गई उस सुदृढ़ नींव पर अपने कैरियर को साकार करने जा रहे हैं। इस संसार और इस देश में काफी परिवर्तन हुए हैं अत: आपको अपने पूर्ववर्तियों की तुलता में एक अलग माहौल में कार्य करना होगा।

तथापि कुछ मार्गदर्शी सिद्धांत हैं जो देश की उच्चतर सिविल सेवा के लिए एक आधार का निर्माण करते हैं। इन अनिवार्य तत्वों का सदैव पालन करना चाहिए। मैं चार महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित करूँगा, जिन पर शायद आप अमल करेंगे, वे हैं 'सहानुभूति', 'दक्षता', 'निष्पक्षता' और 'सच्चरित्रता'

प्रथम शब्द 'सहानुभूति' है। गांधी जी ने ऐसे व्यक्तियों को सलाह दी थी जिनको यह संदेह होता है कि उनके द्वारा किया गया कार्य सही है या नहीं, उन्हें स्वंय को देश के सबसे गरीब व्यक्ति की जगह रखकर देखना चाहिए कि कोई विशिष्ट नीति या कार्यक्रम किस प्रकार से उनके जीवन पर प्रभाव डालता है।

उन्होंने इसे शाश्वत ताबीज के रूप में हमें दिया है जो तब एक उपयोगी सोच उपकरण के रूप में कार्य करेगा, जब नौकरी के दौरान किसी निर्णय को लेते हुए उसके फायदे और नुकसान के बारे में आप सोच रहे होंगे। यदि देश की सेवा करने पर बल दिया जाता है तब हम एक अनिवार्य विशेषता, जिसे हम आत्मसात कर सकते हैं, वह है उन व्यक्तियों के बारे में बेहतर समझ-बूझ बनाना जिनकी आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और जीवन स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए हम सेवा करते हैं।

दूसरा सिद्धांत है 'दक्षता'। आप प्रशासक के रूप में सत्ता और प्राधिकार में उच्चतम पदों पर होते हैं, तब आप पर स्कीमों को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए नीतियों को कार्यक्रम में बदलने की भारी जिम्मेदारी होगी। आप कानून और उसके कार्यान्यवन के बीच की अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी होंगे।

कोई भी नीति उसके कार्यान्वयन के अनुरूप होती है। अक्सर इस देश में हम अच्छी नीतियों के खराब कार्यान्वयन को दर्शाते रहते हैं। परियोजनाओं और कार्यक्रमों के मंदगति से तथा अप्रभावी रूप से संपादन होने से ऐसे आम व्यक्तियों को परेशानी होती है जिनकी हम सेवा करने का प्रयास कर रहे हैं।

लागत और समय बढ़ने से राष्ट्र की विकासात्मक प्रगति रूक जाती है। हमें हमेशा यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि देश और जनता शीर्षस्थ नौकरशाहों से उच्च स्तरीय निपुणता और दक्षता से कार्य करने की अपेक्षा करते हैं।

आपको अपनी सोच और अपने कार्यो में तेजी लाने की आवश्यकता है। आपको नई-नई जानकारी और ज्ञान होना चाहिए तथा सेवा प्रदायगी में सुधार लाने के लिए उनका उपयोग करना चाहिए। ऐसे कई सिविल सेवक हैं जिन्होंने उल्लेखनीय नवान्मेष किए हैं और निष्क्रिय पड़े संस्थानों को दक्ष कार्यकरण वाले व्यवसायिक केन्द्रों के रूप में परिवर्तित किया है।

चूँकि कार्य और रहन-सहन परिवेश में बदलाव आए हैं, हमें प्रत्येक भारतीय, विशेषकर, जिनकी पर्याप्त रूप से सहायता नहीं की गई है, के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने के अंतिम उद्देश्य को हासिल करने के लिए अपने कार्य करने के तौर तरीकों में सुधार लाने के लिए मिले प्रत्येक अवसर का उपयोग करना चाहिए। नवीनता लाना महत्वपूर्ण है।

हमने क्या उपलब्धि हासिल की और क्या नहीं, इसकी ईमानदारी पूर्वक समीक्षा करना हमारे कार्यकरण का अंतरंग हिस्सा होना चाहिए। हमें इस बात की ध्यान में रखना चाहिए कि समाज में हमारा क्या स्थान है और हम सिविल सोसायटी और निजी क्षेत्र के बीच किस किस प्रकार से भागीदारी कर सकते हैं ताकि विकास की गति को बढाया जा सके और प्रदान की जा रही सेवाओं की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण रूप से संवर्धन हो सके।

प्रधानमंत्री का उद्घोष कि 'सुधार करो, निष्पादन करो और बदलाव करो' आपको दक्षता और परिवर्तनकारी नेतृत्व की नई ऊंचाईयों को छूने के लिए प्रेरित कर सकता है।

निष्पक्षता और सच्चरित्रता नामक तीसरा और चौथा सिद्धांत सरदार पटेल के इस उपदेश में समाहित है:
“"इन सबसे बढ़कर मैं आपको सर्वाधिक प्रशासनिक निष्पक्षता और सच्चरित्रता बनाए रखने की सलाह दूंगा।"”

सिविल सेवा का निर्माण देश के शासन में निष्पक्ष समावेशी प्रबंधन संस्कृति उपलब्ध कराने के लिए किया गया था। भारत के बहुभाषी, बहुधर्मी और बहुलवादी समाज को देखते हुए यह नितांत आवश्यक था।

सिविल सेवाएं भारत में मौजूद विभिन्न 'विभाजनों' को पाटने वाली अनिवार्य शक्ति थीं। निष्पक्ष हो और राष्ट्रीय एकीकरण व समावेशी विकास के विस्तृत दृष्टिकोण के साथ हमारे देश के निर्माताओं ने उच्च्तर सिविल सेवाओं की कल्पना देश के मजबूत ढांचे के रूप में की थी।

यह निष्ठा संविधान के अधिदेश और विधानमंडलों द्वारा निर्धारित नीतियों व न्यायपालिका द्वारा निर्धारित विधि और न्याय संबंधी मानदंडों के अनुसार समावेषी राष्ट्रीय विकास के प्रति होनी चाहिए।

प्रशासन को सेवा के प्रति उत्साहित होना चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि हम किस प्रकार के लोगों की सेवा कर रहे हैं। आपको सभी लोगों की किसी भेदभाव या दुराग्रह के बिना समान रूप से सेवा करनी चाहिए और विकास तथा प्रगति की प्रक्रिया में छूट गए लोगों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसके लिए आपको गांधीजी, डा. अंबेडकर और दीनदयाल उपाध्याय के 'अंत्योदय' दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए जिससे कोई भी व्यक्ति पीछे न छूट जाए।

अंत में मैं 'सच्चरित्रता' को रेखांकित करना चाहूंगा। उच्चतर सिविल सेवा के सदस्य होने के नाते आपके ऊपर न केवल संवेदनशील और दक्ष होने का उत्तरदायित्व है, अपितु आपकी सत्यनिष्ठा भी बेदाग होनी चाहिए। श्री सरदार पटेल द्वारा 70 वर्ष पूर्व कहे गए ये शब्द आज भी उतने ही सार्थक हैं। उन्होंने कहा था: "दुर्भाग्य से, आज का भारत एक सच्चरित्र सेवा का दावा नहीं कर सकता, लेकिन मैं आशा करता हूं कि अब आप सिविल सेवकों की एक नई पीढ़ी के साथ शुरूआत करते हुए तंत्र में मौजूद गलत व्यक्तियों द्वारा पथभ्रमित नहीं होंगे, अपितु बिना भय और पक्षपात के, किसी असंगत पुरूस्कार की आकांक्षा किए बिना अपनी सेवांए प्रदान करेंगे। मुझे विश्वास है कि यदि आप सच्ची भावना से अपनी सेवाएं प्रदान करेंगे तो आपको आपका सर्वश्रेष्ठ पुरूस्कार अवश्य मिलेगा।"

हमारा देश अपने उच्चतर सिविल सेवकों से उच्चस्तरीय प्रदर्शन के साथ-साथ सत्यनिष्ठा और निष्कपटता के उच्च स्तरों की भी अपेक्षा करता है। विशेषत: देश का युवा सिविल सेवकों को शिष्टाचार के आदर्श के रूप में देखता है।

'सिविल' शब्द सेवाओं की नामावली का एक हिस्सा है और जनता अपने सिविल सेवकों से गरिमापूर्ण तरीके से व्यवहार करने और धैर्यपूर्वक सुनने व संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की क्षमता रखने की अपेक्षा करती है। आपको अहंकार और निरंकुशता का त्याग करके दुसाध्य और विक्षोभपूर्ण मुद्दों पर भी शांतचित्त से विचार करना चाहिए।

यह बात हमेशा याद रखें कि एक भ्रष्ट तंत्र एक मजबूत देश की जीवनशक्ति का क्षरण कर देता है। यदि आपको भ्रष्टाचार का अंत करना है और एक ऐसे नए भारत का उत्प्रेरक बनना है जिसकी हम आकांक्षा करते हैं, तो आपको ईमानदार होने के साथ-साथ ईमानदार दिखना भी पड़ेगा।

आपको ऐसे सभी कार्यों से बचना चाहिए जिनसे देश की छवि धूमिल हो और आम जनता को यह प्रतीत हो कि यह सर्वमान्य 'मजबूत ढांचा' थोड़ा-सा झुक गया है या इसका क्षरण हो गया है।

भारत के 'लौह पुरूष' ने मजबूत ढांचे की कल्पना की थी। मैं आप सबका आवाह्न करूंगा कि अपने ओजस्वी सकारात्मक योगदान के द्वारा इसकी चमक में और वृद्धि करें।

इसे एक ऐसा बेदाग, स्वच्छ और चमकदार ढांचा बनाईए जो अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयासरत लाखों भारतीयों के जीवन को सहारा और मार्गदर्शन दे।

मैं आप सभी को उज्ज्वल कैरियर के लिए शुभकामनाएं देता हूं। मुझे विश्वास है कि आप और भी अधिक समृद्ध, सौहार्दपूर्ण, समावेशी, भ्रष्टाचार-मुक्त भारत का निर्माण करेंगे।

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