03 सितम्बर, 2017 को नलसर, हैदराबाद स्थित इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ लॉ के 78वें सत्र में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम.वेंकैया नायडु का अभिभाषण

हैदराबाद | सितम्बर 3, 2017

महामहिम, श्री ई. एस. एल. नरसिम्हन; तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्यों के लिए हैदराबाद स्थित उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति रमेश रंगानाथन; विधि मंत्री, ए. इंद्राकरण रेड्डी; कुलपति प्रो. (डा.) फैज़ान मुस्तफा; इंटरनेशनल इस्टिट्यूट ऑफ लॉ के अध्यक्ष, डा. पी. एस. राव, अंतर्राष्ट्रीय विधि के विख्यात कानूनविद, छात्रों, देवियों और सज्जनों, वास्तव में, प्रतिष्ठित इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ लॉ (इंस्टिट्यूट डे डॉर्ट इंटरनेशनल) के 78वें सत्र, जो पहली बार भारत में आयोजित किया जा रहा है, का शुभारंभ करते हुए मुझे अत्यधिक प्रसन्नता हो रही है।

मुझे इस बात की दोहरी खुशी है कि हैदराबाद की अग्रणी संस्था, नलसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ एक सप्ताह तक चलने वाले कार्यक्रम की मेजबानी कर रहा है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय विधि में प्रगति से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाएगी और संकल्प स्वीकृत किए जाएंगे।

इंस्टिट्यूट डे डॉर्ट इंटरनेशनल बेल्जियम में 11 अंतर्राष्ट्रीय अधिवक्ताओं द्वारा 1873 में घेंट टाउन हाल में अपनी स्थापना से अब तक बहुत प्रगति कर चुका है। अपनी स्थापना से अब तक बहुत प्रगति कर चुका है। अपनी स्थापना के 31 वर्षों के भीतर ही 1904 में इसे शांतिपूर्ण तरीकों से राष्ट्रों के बीच विवादों के निपटान को बढ़ावा देने में इसके प्रयासो को मान्यता देते हुए शान्ति के लिए नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता को बढ़ावा देने और युद्ध काल के दौरान विधि के शासन को स्वीकारने के लिए राष्ट्रों को समझाने-बुझाने के लिए इसकी प्रशंसा की गई।

अधिवक्ताओं के इस अद्वितीय गैर-सरकारी संगठन को अपने 'जस्टिशिया एट पेस' - न्याय और शांति के अपने नारे साथ - 1899 में हुई हेग कांग्रेस में मध्यस्थता संबंधी उपबंधों को अपनाये जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का भी श्रेय प्राप्त है तथा विभिन्न मामलों के संबंध में इसकी सिफारिशों पर समय-समय पर लीग ऑफ नेशन्स और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक निकायों ने ध्यान दिया है।

अंतर्राष्ट्रीय निजी विधि से लेकर प्रत्यर्पण से जुड़े मामलों पर इसके मतों और दृष्टिकोणों को विश्व के सभी देशों से मान्यता और सम्मान प्राप्त हुआ है।

मैं जानता हूँ कि यह संस्थान विभिन्न देशों से अंतर्राष्ट्रीय विधि में 132 अति विलक्षण न्यायविदों को सदस्यता प्रदान करता है। स्पष्ट है कि चुने गए व्यक्तियों से यह आशा की जाती है कि वे किसी भी सरकारी या राजनैतिक प्रभाव से मुक्त हो।

इंस्टिट्यूट ऑफ इंटरनेशनल लॉ की स्वतंत्र प्रकृति को देखते हुए, इसके विचार-विमर्श और संकल्प निष्पक्षता की मोहर धारण किए हुए होते हैं तथा जो निस्संदेह विश्व में न्याय के निमित्त और शान्ति को बढावा देने में सहायता करेंगे।

मुझे विश्वास है कि भारत में इस महत्वपूर्ण सत्र का आयोजन होने से न केवल अंतर्राष्ट्रीय विधि की महत्ता के संबंध में ज्यादा जागरूकता बढेगी अपितु युवा अधिवक्ताओं और छात्रों को भी इस विषय में विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए प्रेरणा मिलेगी।

भारत में विधि के शासन की अवधारणा पुरातन काल से व्यवहार में है। संस्कृत शब्द धर्म का व्यापक अर्थ न्याय परायणता, कर्त्तव्य और विधि है। इसके मूल शब्द का अर्थ धारण योग्य, संभालना, पोषण करना और सहायता प्रदान करना है।

वास्तव में, रामायण और महाभारत दोनों उदात्त महाकाव्यों में बताया गया है कि किस प्रकार धर्म अच्छाई और न्याय परायणता के माध्यम से बुराई पर अच्छाई की जीत तथा मानवता की रक्षा के लिए आधार बनाता है।

मनुस्मृति में दिया गया संस्कृत श्लोक, "धर्मों रक्षति रक्षति:" भारतीय दर्शन शास्त्र के मूलभूत सिद्धांत- जो धर्म की रक्षा और उसका पालन करता है, धर्म उसकी रक्षा और पोषण करता है- के माध्यम से समुचित रूप से सारगर्भित करता है। वैदिक काल से भिन्न-भिन्न शासन व्यवस्थाओं के दौरान इस उपमहाद्वीप में- कौटिल्य के (लगभग ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी) अर्थशास्त्र में विधि एवं न्याय के शासन एवं प्रशासन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को संपुटित किया गया है, के समय से ही किसी-न-किसी रूप में विधि व्यवस्था विधमान रही जबकि ब्रिटिश लोगों ने बंगाल में 1772 में प्रशासन और न्याय के सिद्धांतों का सूत्रपात किया।

भारत 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के दर्शन में विश्वास रखता है जिसका अर्थ है 'पूरा विश्व एक परिवार है' और सदैव अंतर्राष्ट्रीय संधियों और संविधियों का सम्मान करता रहा है।

भारत अंतर्राष्ट्रीय संविधियों तथा विधि के शासन के कार्यान्वयन को बहुत अधिक महत्व देता है तथा वैश्विक स्तर पर शांति और न्याय को प्रोत्साहन देने में दृढ़ विश्वास रखता है। उल्लेखनीय है कि भारत उन देशों में शामिल था जिन्होंने कुछ महत्वपूर्ण वैश्विक अभिसमयों के विकास में तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा लॉ ऑफ सी कन्वेंशन जैसे अभिसमयों को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय विधि को बढ़ावा देने के लिए एशियाई-अफ्रीकी विधि परामर्शी संगठन के गठन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

यह कहना व्यर्थ होगा कि भारत अनेक महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय संधियों/प्रोटोकॉल/करारों का हस्ताक्षरकर्ता है। इनमें जैविक हथियारों संबंधी अभिसमय, रासायनिक हथियारों संबंधी अभिसमय, अन्तर्राष्ट्रीय विमानन संबंधी शिकागो अभिसमय, बाल अधिकारों संबंधी अभिसमय, खेलों में डोपिंग संबंधी अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय, जातिसंहार संबंधी अभिसमय, निजी अन्तर्राष्ट्रीय विधि संबंधी हेग सम्मेलन की संविधि, क्योटो प्रोटोकॉल, मांट्रियाल प्रोटोकॉल, नाभिकिय आतंकवाद संबंधी अभिसमय तथा नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन संबंधी अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय शामिल हैं।

मैं एक बार पुन: इस बात पर बल देना चाहूंगा कि वैश्विक शांति को बढ़ावा देने में प्रमुख हितधारक होने के नाते, भारत अन्तर्राष्ट्रीय विधियों और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के आधार पर बातचीत के माध्यम से विवादों के शांतिपूर्ण ढंग से निपटान में दृढ़ विश्वास रखता है।

इस अवसर पर, मैं साझे मुल्यों एवं हितों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था को विकसित करने और इसे बनाए रखने में कुछ भारतीय और एशियाई अन्तर्राष्ट्रीय विधि अध्येताओं द्वारा दिए गए अमूल्य योगदान को संक्षेप में स्मरण करना चाहूंगा।

इतिहास उपनिवेशवाद के युग से पूर्व इस उप-महाद्वीप और एशिया में फले-फूले राज्यों और वैभवशाली सभ्यताओं के अस्तित्व का साक्षी है। उनके बीच में व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में व्यापक अन्तर्राज्यीय संबंध विद्यमान थे। संधियों के उपसंहार और अन्य पहलुओं को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के अध्यक्ष न्यायमूर्ति नगेन्द्र नाथ जैसे एशियाई और भारतीय अध्येताओं ने सुव्यस्थित तरीके से अभिलिखित और अध्ययन किया है उनका 1969 में प्रकाशित "इंडिया एण्ड इंटरनेशनल लॉ" नामक मौलिक कार्य सर्वविदित है।

प्रोफेसर एलेक्जेंडरोविज़, एम.के. नवाज़ और नीलकांत शास्त्री ने भी औपनिवेशवाद के आगमन से पूर्व एशिया और भारत में अन्तर्राष्ट्रीय विधि के सिद्धांतों के अनुप्रयोग की जांच-पड़ताल की है।

लैटिन वाक्यांश 'पैक्ट संट सेर्वेंडा' जिसका अर्थ "संविदा सर्वथा पालनीय" है जो अन्तर्राष्ट्रीय विधि अथवा प्रसंविदाओं के मूल तत्व या सिद्धान्त का आधार हैं तथा स्पष्ट रूप से यह संकेत देता है कि इसका निर्वहन न होना संविदा का हनन अथवा उल्लंघन होने के समान होगा। अन्य शब्दों में, यह विवादों का निपटान शांतिपूर्ण तरीकों से किए जाने के महत्व पर प्रकाश डालता है।

भारतीय अध्येता जिन्होंने अन्तर्राष्टीय विधि के सिद्धान्त एवं व्यवहार में उल्लेखनीय योगदान दिया है उनमें यू.एन.इंटरनेशनल लॉ कमीशन (आईएलसी) के प्रथम भारतीय सदस्य और बाद में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) के प्रथम भारतीय न्यायाधीश, न्यायमूर्ति बेनेगल राव तथा न्यायमूर्ति राधा बिनोद पाल (अपनी टोक्यो असहमति के लिए प्रसिद्ध तथा आईएसी के सदस्य), और न्यायाधीश पी.एस.राव (आई.सी.जे. के तदर्थ न्यायाधीश, विवाचक, आईएलसी.के अध्यक्ष, भारत के विधि सलाहकार और अब 2015 से इस संस्थान के अध्यक्ष) इसमें शामिल हैं।

इस क्षेत्र के अन्य सुप्रसिद्ध विशेषज्ञों में प्रोफेसर बी.एस.मूर्ति, टी.एस.राव, आर.पी. आनन्द, उपेन्द्र बक्शी और रहमतुल्ला खान शामिल हैं। मैं डा. कृष्ण राव के योगदान को भी स्मरण करना चाहूंगा जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून संबंधी सभी मामलों में भारत के लिए और अधिक व्यवस्थित विधिक परामर्शी सेवा के गठन में प्रमुख भूमिका निभायी थी। वह सिंधु जल संधि, 1959 को अंतिम स्वरूप प्रदान करने, कच्छ के रण की सीमा परिनिर्धारित करने तथा विभाजन के बाद की अवधि में भारत और इसके पड़ोसी देशों के बीच उत्पन्न अन्य अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों के समाधान में सहायक रहे थे।

जैसा की पहले बताया गया, भारत ने संयुक्त राष्ट्र तथा साठ के दशक में अंतराष्ट्रीय कानून को संहिताबद्ध करने तथा उसके निरंतर विकास में सक्रिय भूमिका भी निभाई थी। हम डा. कृष्ण राव तथा एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरिका के अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय विधिवेत्ताओं के अत्यधिक आभारी हैं जिन्होंने अन्य बातों के साथ-साथ उपनिवेशवाद ओर रंगभेद को अपराध माने जाने, बल प्रयोग को रोकने, राज्यों के अपने प्राकृतिक संसाधनों पर स्थायी प्रभुत्व के सिद्धान्त, राज्यों के बीच मंत्रीपूर्ण संबंधों को शासित करने के सिद्धान्तों और अनन्य रूप से शान्ति के प्रयोजनार्थ वाह्य स्थानों को आरक्षित रखे जाने के संबंध में अंतरराष्ट्रीय कानून के मूलभूत सिद्धांतों को बढ़ावा देने में संयुक्त मोर्चे का गठन किया।

अंतरराष्ट्रीय कानून के संबंध में भारत के विधिक सलाहकार के रूप में डा. कृष्ण राव के पश्चात् डा. एस.पी. जगोटा ने समुद्री संसाधानों के प्रयोग और विभिन्न समुद्री क्षेत्रों की बाहरी सीमाएं तय करने के लिए नई संवैधानिक व्यवस्था कायम करने में अविकसित देशों के अन्य प्रतिनिधियों के साथ अग्रणी भुमिका निभाई। मनुष्य के आम विरासत की धारणा के प्रबंधन हेतु अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के साथ-साथ विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र की धारणा की उत्पत्ति, समुद्री कानून संबंधी इंटरनेशनल सीबेड ऑथोरिटी तथा अंतरराष्ट्रीय अधिकरण की स्थापना, ऐसी नई विधिक व्यवस्थाएं हैं जो विकासशील तथा अत्यधिक पिछडे़ देशों के हितों को विशेष ध्यान में रखते हुए मानव जाति के लाभ के लिए बनायी गयी हैं।

हाल के वर्षों में, विशेषरूप से 11 सितम्बर, 2011 के हमले के पश्चात् भारत अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का मुकाबला करने में अत्यधिक प्रयासरत रहा है। अनेक अभिसमय संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में किए गए प्रयासों के परिणाम स्वरूप अस्तित्व में आए हैं। इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के दमन के संबंध में सार्क अभिसमय और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के दमन संबंधी व्यापक अभिसमय जो अभी संयुक्त राष्ट्र के विचाराधीन है, को अंतिम रूप दिए जाने के भारत के प्रस्ताव का उल्लेख किया जा सकता है। भारत अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की बढ़ती घटनाओं, जिससे विश्व शान्ति के प्रति खतरा उत्पन्न हो गया है, को ध्यान में रखते हुए और विलम्ब किए बिना निकट भविष्य में इस महत्वपूर्ण अभिसमय को अंतिम रूप दिए जाने के लिए अत्यन्त गंभीर हैं।

आज भारत सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और इसके पास युवा और शिक्षित कार्य बल है। यह एक परिपक्व संसदीय प्रजातंत्र का प्रतिनिधित्व करता है जिसके पास अत्यंत स्वतंत्र न्यायपालिका और प्रेस है।

भारत की विदेश नीति राष्ट्रों की समान प्रभुता, अन्य राष्ट्रों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना और संयुक्त राष्ट्र के अनुच्देद 33 में उल्लिखित सिद्धांतों के अनुसार विवादों का शान्तिपूर्ण निपटान पर आधारित है। भारत अंतरराष्ट्रीय कानून, न्याय और समानता के आधार पर अन्य देशों के साथ अपने मतभेदों और विवादों के निपटान हेतु द्विपक्षीय वार्ताओं को अत्यधिक महत्व देता है। यह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अनिवार्य क्षेत्राधिकार का समर्थक है और यथोचित मध्यस्थता द्वारा विवादों के निपटान को महत्व देता है। यह अंतरराष्ट्रीय न्यायलय के समक्ष छ: बार उपस्थित हुआ जिनमें दो बार आवेदक के रूप में और अन्य अवसरों पर मध्यस्थता के पक्ष के रूप में गया।

भारत इंस्टीट्यूट डी ड्रोएट इंटरनेशनल द्वारा दिए गए तथा दिए जा रहे योगदान की कद्र करता है। मैं समझता हूं कि हैदराबाद सत्र के एजेंडे से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के निर्णयों, अंतरराष्ट्रीय प्रवासन से संबंधित विधिक मामले, निजी अंतरराष्ट्रीय कानून तथा अंतरराष्ट्रीय निवेश से जुड़े विवादों के संबंध में अनन्तिम उपायों की न्यायिक समीक्षा से संबंधित हैं। हम दीर्घावधिक विश्व शांति के प्रति आपकी प्रतिबद्धता के रूप में महत्वपूर्ण योगदान की आशा करते हैं।

मैं आपके प्रयास में आपकी पूर्ण सफलता तथा हैदराबाद के इस खूबसूरत शहर में आपके सुखद प्रवास की कामना करता हूं।
जय हिन्द।