03 मार्च 2018 को देहरादून, उत्तराखंड में अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

ऋषिकेश, उत्तराखंड | मार्च 3, 2018

"हिमालय की गोद में, गंगा मैया के पावन तट पर परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश आम तौर पर योग की जन्म स्थली और विश्व की योग राजधानी के रूप में भी जाना जाता है, जहां आज विश्व के कोने-कोने से आये योग विशारदों, योगाचार्यों और योगाभ्यासियों की उपस्थिति में मेरे लिए इस विश्व-विख्यात वार्षिक योग महोत्सव का उद्घाटन करने में आपके साथ भागीदारी करना अद्भुत है।

योग,स्वास्थ्य के प्रति एक संपूर्ण दृष्टिकोण है जिसके शारीरिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक पहलू हैं। योग-विज्ञान प्राचीन, लेकिन शाश्वत है। इस ज्ञान का उपयोग हमारे समकालीन जीवन को बेहतर, स्वस्थ और सुखद बनाने के लिए किया जा सकता है।

योग शब्द की उत्पत्ति दो मूल शब्दों से हुई है जिनमें एक का अर्थ "संयोजन" होता है और दूसरे का "एकाग्रता"। यह शारीरिक स्वास्थ्य को मानसिक और भावनात्मक संतुलन के साथ जोड़ता है। इससे एकाग्रता और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में सुधार होता है।

शारीरिक व्यायाम का महत्व लगभग 11वीं सदी में हठयोग नामक योग की एक शाखा के रूप में उभरकर सामने आया। पिछले कुछ वर्षों में इन व्यायाम क्रियाओं को विश्वभर में महत्व और प्रमुखता मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि हमने महसूस किया कि ज्ञान के इस खजाने को समूचे विश्व के साथ साझा किया जाना चाहिए क्योंकि योग का यह प्राचीन विज्ञान आधुनिक विश्व को भारत की अमूल्य देन है। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की बदौलत संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया है और अब इसे विश्व भर में मनाया जाता है।

परमार्थ निकेतन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव (आईवाईएफ) योग की शक्ति और सार्वभौमिक लोकप्रियता तथा विश्व के प्रत्येक कोने से लोगों को साथ लाने की इसकी क्षमता का पक्का प्रमाण है। पिछले वर्ष ही आई वाई एफ ने विश्व भर के 101 से अधिक देशों से आये 1700 से अधिक प्रतिभागियों की मेजबानी की थी और इस वर्ष वे उससे भी अधिक प्रतिभागियों की मेजबानी कर रहे हैं।

ऋषिकेश और गंगा मैया के घाट वास्तव में ऐसा स्थान है जिसने पिछले हजारों वर्षों से शान्ति और योग के सच्चे तत्व की खोज के लिए ऋषियों, तीर्थ-यात्रियों, जनसामान्य और प्रसिद्ध व्यक्तियों को समान रूप से आकर्षित किया है। इस पावन भूमि की वायु, जल और मिट्टी में योग समाया हुआ है। अत: आशा मैं करता हूँ कि इस अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव में, आपकी भागीदारी से जैसाकि आयोजकों ने कहा है, आपको न केवल योग-शिक्षा मिलेगी बल्कि योग के ज्ञान से परिवर्तन की अनुभूति भी होगी।

ऋषि पतंजलि ने प्रथम योग दर्शन का संकलन किया, जिन्होंने योग को अपने स्वयं के अनियमित विचारों को नियंत्रित करने और आंतरिक सामंजस्य पैदा करने वाली शांत मन:स्थिति को प्राप्त करने की क्षमता के रूप में परिभाषित किया है।

आधुनिक युग की शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की स्वास्थ्य समस्याओं पर काबू पाने के लिए योग को हमारे रोजमर्रा के जीवन का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए। योग एक संपूर्ण प्रणाली है जिसमें चित्त और शरीर एक होकर पूर्णत: तरोताजा हो जाते हैं क्योंकि शारीरिक मुद्राओं, श्वसन क्रियाओं और ध्यान से व्यक्ति के समग्र स्वास्थ्य में सुधार होगा।

नि:संदेह, योग से मनुष्य को अंतरात्मा का बोध करके और परिवेश के साथ पूर्ण शांति प्राप्त करके आध्यात्मिक तलाश में भी सहायता मिलती है।

योग का उद्देश्य हमें संतुलन की अवस्था प्राप्त करने में हमारी सहायता करना है जबकि हम स्वयं के साथ शांत चित्त होते हैं जिससे कि हम अपने इर्दगिर्द शांतिपूर्ण माहौल बना सके। हम अपने परिवेश, अपने साथी मनुष्यों, प्रकृति और पर्यावरण के साथ सामंजस्य की अवस्था में होते हैं।

भगवान कृष्ण ने भगवद् गीता में तीन योगों - कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग की बात कही है। ये तीन पहलू - कर्म, ज्ञान और भक्ति हैं जो जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रासंगिक हैं। हमें सदैव सक्रिय रहना चाहिए और पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ कार्य करना चाहिए। इसके साथ-साथ, जब हम अपना कार्य करते हैं तो इससे हमें सीखना और ज्ञान का प्रसार करना चाहिए। यदि कर्म, ज्ञान और भक्ति एक साथ मिल जाएं तो हमारे द्वारा किया जाने वाला कार्य बिल्कुल असाधारण बन जाता है।

मैं विश्व द्वारा योग महोत्सव में भागीदारी किए जाने और इसके सही मर्म को समझने तथा लोगों को हमारी पावन भूमि की परंपरा के अनुरूप एकसूत्र में बांधकर विविधता के प्रसार हेतु इतने सुन्दर महोत्सव के आयोजन के लिए, परमार्थ निकेतन में अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव (आईवाईएफ) के संस्थापक पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती जी और आईवाईएफ की निदेशक साध्वी भगवती सरस्वती जी को हार्दिक बधाई देता हूँ। मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई है कि पिछले लगभग बीस वर्षों के दौरान परमार्थ निकेतन में यह महोत्सव किस प्रकार से फला-फूला है।

मैं पूज्य स्वामी जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और कई अवसरों पर पूज्य स्वामी जी के साथ रहा हूँ। सभी के कल्याण हेतु उनकी प्रेरणा से किए गए ढेरों सेवा-उपक्रमों में उनके योगदान से राष्ट्र और विश्व बड़ा समृद्ध हुआ है। विशेष तौर पर, अपने ग्लोबल इंटरफेथ वाश अलायन्स के साथ स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा देने के लिए उनकी जोशपूर्ण पहल तथा गंगा एक्शन परिवार संबंधी उपक्रम सराहनीय हैं क्योंकि इन प्रयासों से धर्मों के बीच समरसता बढ़ी है। उनमें कर्मयोगी, भक्तियोगी और ज्ञानयोगी का अनूठा मिश्रण है! उन्होंने न केवल योग करने बल्कि सच्चे अर्थ में योगी होने का आदर्श प्रस्तुत किया है। मैं जानता हूँ कि आपमें से अनेक लोग उनके आदर्श से प्रेरित और प्रभावित हुए होंगे और इस मनोरम आश्रम में वर्षभर आते रहेंगे।

मैं उपनिषदों से प्रार्थना के साथ अपनी बात को समाप्त करना चाहूँगा जिसमें सौभाग्य, उत्तम स्वास्थ्य और सकारात्मक विचारों के लिए प्रार्थना की गई है।

सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
माँ कश्चित् दु:ख भाग्भवेत्

"सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, किसी को भी दु:ख का भागी न बनना पड़े।”

जय हिन्द!"