सुब्रह्मण्य भारती चाहते थे कि भारत संकीर्णता की घरेलू दीवारों को ध्वस्त करे: उपराष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति ने सुब्रह्मण्य भारती की जयंती समारोह में सभा को संबोधित किया

चेन्नई
दिसम्बर 10, 2017

उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु, ने कहा है कि गुरु देव रवींद्रनाथ टैगोर की तरह सुब्रह्मण्य भारती चाहते थे कि भारत संकीर्णता की घरेलू दीवारों को ध्वस्त करे। वह आज चेन्नै में महान राष्ट्रकवि सुब्रह्मण्य भारती की जयंती के समारोह में उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर तमिलनाडु के राज्यपाल, श्री बनवारीलाल पुरोहित और अन्य गण्मान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस महान प्रेरणादायी व्यक्ति को 'भारती' की उपाधि दी गई थी। इसी प्रकार 'महाकवि' की उपाधि भी दी गई थी। ये दोनों उपाधियां उनकी कविताओं और उनके भाषणों के माध्यम से शब्द-संसार में उनके असाधारण योगदान को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें वास्तव में ज्ञान की देवी का आशीर्वाद प्राप्त था।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि 'स्वतंत्रता' के संबंध में उनकी परिकल्पना व्यापक थी। उन्होंने कहा कि वह न केवल स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए और निरंतर विदेशी शासन के खिलाफ लड़ते रहे, अपितु वह चाहते थे कि भारत भूख, लैंगिक भेदभाव, अस्पृश्यता, अशुद्ध वातावरण, संकीर्ण भाषाई और धार्मिक मतांधता से भी मुक्त हो।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि वह चाहते थे कि भारतीयों को अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व होना चाहिए और भाषा और साहित्य इस विरासत का अभिन्न अंग हैं। उन्होंने भारत की विविधता की सराहना की और सभी भाषाओं से प्रेम किया तथा उन्होंने तेलुगू को 'सुंदर तेलुगु' के रूप में वर्णित किया।

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