सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं के लिए न्याय सदा पहला सिद्धांत रहा है और यह पहला सिद्धांत ही रहना चाहिए: उपराष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति ने मानवाधिकार दिवस समारोह को संबोधित किया

नई दिल्ली
दिसम्बर 10, 2017

भारत के उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु ने कहा है कि सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं के लिए न्याय सदा पहला सिद्धांत रहा है और यह पहला सिद्धांत ही रहना चाहिए। वह आज यहां मानवाधिकार दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एच.एल. दत्तू और अन्य गण्मान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि हर साल 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस उस दिन की याद में मनाया जाता है, जिस दिन 1 948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को अपनाया था। उन्होंने आगे कहा कि भारत ने विश्व स्तर पर और देश के भीतर मानव अधिकारों के परिरक्षण और संरक्षण के लिए अपनी प्रतिबद्धता के प्रति सुस्पष्ट है। उन्होंने कहा कि भारत ने अनेकों प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार अभिसमय और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन अभिसमयों पर हस्ताक्षर किए हैं।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि मानवाधिकारों के लिए हमारी प्रतिबद्धता हमारी संस्कृति का हिस्सा है, और अनंत काल से हमने सदैव दूसरों के मानवाधिकारों का सम्मान किया है। हमारे यहां कहावत है कि "सर्वजन: सुखिनो भवन्तु"; और हम "वसुधैव कुटुंबकम - पूरा ब्रह्मांड एक परिवार है" के सिद्धांत में विश्वास करते हैं। उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत में नागरिक के अधिकारों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और अन्य अधिकारों की गारंटी केवल इसलिए नहीं है कि ये अधिकार संविधान में दिए गए हैं, अपितु इनकी गारंटी इसलिए है क्योंकि वे हमारे डीएनए का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि "धर्मनिरपेक्षता, जिसे संविधान में बाद में शामिल किया गया था, वह शुरू से ही हमारे डीएनए में बसी हुई है," एक देश के रूप में भारत में किसी भी प्रकार की आक्रामकता का कोई इतिहास नहीं है और हमने यहां आए सभी लोगों को अपने में सम्मिलित करने का प्रयास किया है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि मतदान गोली से अधिक शक्तिशाली है और सत्ता बंदूक की नोक पर हासिल नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि आपको दूसरों को मारने और फिर स्वयं मानव अधिकारों के तहत संरक्षित होने का कोई अधिकार नहीं है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि महिलाओं का सशक्तिकरण और महिला-पुरूष समानता के मुद्दे हमारे लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि महिलाओं की स्थिति, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, अभी भी अनिश्चित है। उन्होंने आगे कहा कि महिला-पुरूष असमानता प्रमुख सामाजिक असमानताओं में से एक है जिसके कारण 'नूतन भारत' में भी अधिकांश महिलाएं हाशिए पर हैं। उनके विचार में निम्न साक्षरता दर और शिक्षा में लड़कियों के प्रति भेदभाव ने समाज में महिलाओं की स्थिति को और कमज़ोर करने में योगदान दिया है। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि इन चुनौतियों का सामना करने के लिए 'बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ' जैसे कार्यक्रम अपनाए जा रहे हैं।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र आतंकवाद और उग्रवादी हिंसा का भी सामना कर रहा है, और ये दोनों व्यक्तियों के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का दमन करते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार की हिंसा और संवेदनहीन हत्याएं मानव अधिकारों के उल्लंघन का सबसे बुरा स्वरूप हैं और इन पर तदनुसार कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

Is Press Release?: 
1