सफलता प्राप्ति हेतु बड़े सपने देखो और कड़ा परिश्रम करो: उपराष्ट्रपति अथर्व ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूट्स के छात्रों के साथ बातचीत

मुम्बई
अक्टूबर 28, 2017

भारत के उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु ने कहा कि अपनी आकांक्षाओं को साकार करने और अपने चुने हुए व्यवसाय में सफलता प्राप्ति के लिए बड़े सपने देखें, ध्येय ऊंचा रखें और कड़ा परिश्रम करें। यह बात उन्होंने मुम्बई स्थित राजभवन में आज अथर्व ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूट्स के छात्रों के साथ बातचीत करते हुए कही।

उपराष्ट्रपति ने दृष्टांत पेश किया कि किस प्रकार स्वर्गीय राष्ट्रपति, डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और प्रधानमंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी, जो बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि से संबंधित हैं, कड़े परिश्रम, अनुशासन और प्रतिबद्धता के बलबूते उच्चतम पदों पर आसीन हुए। उन्होंने यह भी कहा कि तेजी से बदलते विश्व में शैक्षणिक पाठ्यक्रम इस प्रकार का होना चाहिए जिससे छात्रों को यथोचित रोजगार प्राप्ति अथवा स्वनियोजित बनाने के लिए तैयार किया जा सके। मात्र उपाधियां हासिल करना पर्याप्त नहीं है, शिक्षा का उद्देश्य युवाओं को प्रबुद्ध बनाना और उनका सशक्तिकरण होना चाहिए तथा भारतीय बहुत प्रतिभाशाली हैं और उनकी इस प्रतिभा का दोहन कौशल विकास के माध्यम से किये जाने की आवश्यकता है।

उपराष्ट्रपति ने छात्रों से कहा कि वे अपने देश की संस्कृति, इतिहास और विरासत से अच्छी तरह से परिचित हों। उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृति का धर्म के साथ कोई संबंध नहीं है क्योंकि संस्कृति जीवन-शैली होती है और धर्म का संबंध पूजा पद्धति से है। दुर्भाग्यवश कुछ लोग दोनों को एक दूसरे के साथ मिला रहे हैं और उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दू धर्म नहीं है अपितु एक सांस्कृतिक संकेतार्थ है।

श्री नायडु ने छात्रों को समझाया कि सर्वप्रथम वे अपनी मातृभाषा में प्रवीण बनें और बाद में अंग्रेजी सहित जितनी चाहे उतनी भाषाएं सीखें। उन्होंने छात्रों से कहा, "अंग्रेजी सीखने के जुनून के कारण हम अपनी मातृभाषा को भूलते जा रहे हैं। आप अपनी मातृभाषा में ही बेहतर तरीके से अपनी बात कर सकते हैं।" उपराष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी है कि यदि मातृभाषा विद्यालयों में शिक्षण का माध्यम नहीं है तो उसे एक विषय के रूप में अवश्य पढ़ाया जाए।

उपराष्ट्रपति ने धर्म, क्षेत्र और जाति के नाम पर मतभेद उत्पन्न करने के प्रयासों की भर्त्सना की और ऐसे प्रयासों को पूरी तरह निरर्थक बताया। उन्होंने कहा कि देश के विकास के लिए कृषि और उद्योग समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

उपराष्ट्रपति, जो राज्य सभा के सभापति भी हैं, ने संसद और राज्य विधानमंडलों में होने वाले व्यवधानों पर चिंता व्यक्त की तथा रचनात्मक वाद-विवाद की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने विधि निर्माताओं से कहा, "वाद-विवाद करो, चर्चा करो और निर्णय लो, किंतु व्यवधान उत्पन्न मत करो।" श्री नायडु ने यह भी कहा कि राजनैतिक दलों पर विकास संबंधी कार्यसूची का अनुसरण करने के लिए दबाव बनाया जाना चाहिए।

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