प्रतिभा और योग्यता को मान्यता देना भारत की संस्कृति और परंपरा का हिस्सा रहा है: उपराष्ट्रपति स्वराज्य पुरस्कार 2017 का वितरण

पणजी, गोवा
दिसम्बर 16, 2017

भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु ने कहा है कि प्रतिभा और योग्यता को मान्यता देना भारत की संस्कृति और परंपरा का हिस्सा रहा है और इस प्रकार के पुरस्कारों का प्रदान किया जाना अन्य लोगों में प्रेरणा का संचार करता है। वे आज पणजी, गोवा में इंडिया आइडियाज़ कॉन्क्लेव, 2017 द्वारा आयोजित स्वराज्य पुरस्कार 2017 समारोह में स्वराज्य पुरस्कार प्रदान करने के पश्चात सभा को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर गोवा के मुख्य मंत्री श्री मनोहर पर्रिकर, नागर विमानन मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री जयंत सिन्हा और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

उप राष्ट्रपति ने कहा कि यहां प्रतिभा की कमी नहीं है, जिसको हर क्षेत्र में प्रोत्साहन और बढ़ावा दिए जाने के साथ-साथ यथोचित मान्यता दी जानी चाहिए। पुरातन काल में एक तिहाई से अधिक वैश्विक संपदा पर भारत का नियंत्रण था और आज से लगभग दो सदी पूर्व, देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वैश्विक जीडीपी का 27 प्रतिशत था। उन्होंने आगे कहा कि भारत पुन: सबसे तेजी से बढ़ने वाली विशाल अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है और कुछ ही दिन पूर्व संयुक्त राष्ट्र की विश्व आर्थिक स्थिति रिपोर्ट में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वर्ष 2018 में 7.2 प्रतिशत और वर्ष 2019 में 7.4 प्रतिशत की दर से वृद्धि होने का अनुमान लगाया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि रिपोर्ट के अनुसार अच्छी निजी खपत और सार्वजनिक निवेश तथा जारी संरचनात्मक सुधारों के कारण भारत की स्थिति काफी सकारात्मक बनी हुई है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत को 'विश्वगुरू' के रूप में जाना जाता था और विश्व भर से विद्वान और ज्ञान के खोजी व्यक्ति नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला, पुष्पगिरि और वल्लभी जैसे विश्वद्यिालयों में अध्ययन करने के लिए भारत आया करते थे। उन्होंने यह भी कहा कि वेदों में समानता, वैश्विक शांति, सहिष्णुता, अहिंसा, कल्याण और बन्धुत्व के विषय में चर्चा की गई है और वेदों के अनुसार कोई भी किसी से बेहतर अथवा कमतर नहीं है। उन्होंने कहा कि विश्व के समक्ष मौजूद अनेक समस्याओं का हल वेदों में पाया जा सकता है, जिनमें हमें नैतिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक विकास के लिए आवश्यक मार्गदर्शन मिलता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि इतिहास बताता है कि भारत कभी भी आक्रमणकारी नहीं रहा और सदा ही आक्रमणों का शिकार रहा है। भारत और उसके शांतिप्रिय नागरिकों का हमेशा से 'सर्वे जना: सुखिनो : भवन्तु' में विश्वास रहा है जो इस देश के चिरकालीन सांस्कृतिक सदाचार को दर्शाता है। उन्होंने आगे कहा कि हम में से प्रत्येक को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि हमने ऐसी महान और शांतिवादी विरासत पाई है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि हम एक नए भारत का निर्माण करें, जो राष्ट्रमंडल में पुन: अपना यथोचित स्थान ग्रहण करेगा।

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