जाति, पंथ, धर्म और लिंग आधारित घोर असमानताएं विद्यमान रहने की स्थिति में भारत का विकास नहीं हो सकता: उपराष्ट्रपति उपराष्ट्रपति द्वारा सोशल एक्सक्लूजन एंड जस्टिस इन इंडिया नामक पुस्तक का विमोचन

नई दिल्ली
नवम्बर 17, 2017

भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकेया नायडु ने कहा कि जब तक देश में जाति, पंथ, धर्म और लिंग आधारित घोर असमानताएं विद्यमान रहेंगी, तब तक हम भारत को विकसित राष्ट्र नहीं बना सकते। वह आज यहां श्री पी.एस. कृष्णन द्वारा लिखित पुस्तक "सोशल एक्सक्लूजन एंड जस्टिस इन इंडिया" का विमोचन करने के बाद जनसभा को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर केन्द्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री श्री थावरचंद गहलोत और अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि पिछले सात दशकों के दौरान लेखक समाज के वंचित वर्गों के लिए सामाजिक न्याय के प्रखर हिमायती रहे हैं और उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त भेदभाव के मूल का गहन विवेचन किया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह पुस्तक समाज के वंचित वर्गों, दलितों, आदिवासियों और सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों से संबंधित मुद्दों के प्रति लेखक की समझ और गहन जानकारी का प्रमाण है और इसमें आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना में तथा समग्र रूप से देश में उनके लम्बे अनुभव के आधार पर इन समस्याओं को दूर करने के व्यावहारिक और प्रभावी तरीके बताए गये हैं।

उप-राष्ट्रपति ने कहा कि लेखक ने हमारे संविधान निर्माताओं विशेषकर गांधी जी और डा. अम्बेडकर के बीच हुए संवादों को प्रस्तुत किया है और भारत के संविधान के अंतिम संस्करण में इन दो महापुरुषों के विविध विचारों के सम्मिश्रण को प्रस्तुत किया है। उन्होंने आगे कहा कि डा. अम्बेडकर के स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्रिमंडल में बतौर विधि मंत्री शामिल होना और तत्पश्चात् उनका संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनना ऐसे निर्णायक कदम थे जिनके कारण सामाजिक न्याय और समावेशन के संबंध में राष्ट्रीय सहमति बनी जैसा कि लेखक द्वारा बताया गया है।

उप-राष्ट्रपति ने कहा कि यह पुस्तक न केवल विश्लेषणात्मक शोध और संकलन की कृति है बल्कि एक ऐसी पुस्तक भी है जो इस संबंध में व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करती है कि किस प्रकार संवैधानिक उपबंधों को विधानों और अन्य सुव्यवस्थित हस्तक्षेपों में परिवर्तित किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि केवल दलितों और आदिवासियों तथा सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों (एसईडीबीसी) की अधिक, सर्वाधिक तथा अत्यन्त पिछड़ी जातियों के सशक्तिकरण के माध्यम से ही हमारा देश इष्टतम रूप से प्रगति कर सकता है।

उप-राष्ट्रपति ने कहा कि लेखक ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान, राजनीतिक आरक्षण, सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण, पदोन्नति में आरक्षण, बंधुआ मजदूरी के निषेध संबंधी विभिन्न संवैधानिक उपबंधों और अनुसूचित जनजातियों के विकास हेतु अनूठे उपबंध के कार्यान्वयन की जांच की है। उन्होंने आगे कहा कि वह लेखक के इस मत का पूर्णत: समर्थन करते हैं कि संविधान के इन अनुच्छेदों को ईमानदारीपूर्वक और सम्पूर्ण रूप से कार्यान्वित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि इन अनुच्छेदों को, जो उस वैश्विक विचार की भावपूर्ण अभिव्यक्ति है जिसमें सामाजिक समावेशन और सामाजिक न्याय बुनियादी और अति महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं, पूरी तरह कार्यान्वित करने से बेहतर हमारे संविधान के जनकों के प्रति और कोई श्रंद्धाजलि नहीं हो सकती।

उप-राष्ट्रपति ने कहा कि हमने लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर छूट गये लोगों पर ध्यान देकर अपने लोकतंत्र को सुदृढ़ करने का गंभीर संकल्प लिया है और सबका साथ, सबका विकास हमारा राष्ट्रीय उद्देश्य बन गया है। उन्होंने आगे कहा कि अंत्योदय को अपरिवर्तनीय दृष्टिकोण के रूप में लिया गया है। तथापि, हमारे सामने कटु वास्तविकताएं पेश आ रही हैं और हमारे लिए आज यह सबसे बड़ी चुनौती है, उन्होंने यह भी कहा।

उप-राष्ट्रपति ने कहा कि हम जानते हैं कि हमें क्या करना चाहिए लेकिन हम इसे नहीं कर रहे हैं और हम साथ मिलकर अपना काम नहीं कर रहें हैं। उन्होंने आगे कहा कि हम सभी को "कार्य की इस कमी" का संज्ञान लेना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वंचित लोगों तक पहुंचने के लिए सामाजिक समूहों के उप-वर्गीकरण पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए।

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