गरिमापूर्ण विकास हमारे राष्ट्र का एजेंडा होना चाहिए : उपराष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का दसवां वार्षिक व्याख्यान दिया।

नई दिल्ली
दिसम्बर 19, 2017

भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु ने कहा है कि गरिमापूर्ण विकास हमारे राष्ट्र का एजेंडा होना चाहिए और संसद में केवल विधेयक ला देने मात्र से बहुत सारी चीजें तब तक नहीं बदल सकती हैं, जब तक कि हममें राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक कौशल न हो। वह आज यहां 'राष्ट्र निर्माण में अल्पसंख्यक' विषय पर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का दसवां वार्षिक व्याख्यान दे रहे थे। इस अवसर पर केन्द्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री श्री मुख्तार अब्बास नकवी और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि बहुलवाद, समावेशन और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की अवधारणा को अपने शासन की आधारशिला बनानी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक आयोग को यह अधिदेशित है कि वह अल्पसंख्यकों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए समुचित उपाय सुझाए और उनकी रूपरेखा तैयार करे। उनका यह भी कहना था कि आयोग का समावेशी विकास संबंधी मूलभूत सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि राजनैतिक लोकतंत्र के लाभ उन लोगों तक भी पहुंचे जिनके मुख्यधारा से छूट जाने की संभावना है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि सबसे दुर्बल, सबसे दूर वाले और सबसे असाधारण व्यक्ति का सशक्तिकरण ही 'अंत्योदय' का सिद्धांत है। उन्होंने आगे यह कहा कि भारत संविधान द्वारा प्रदत्त चार महत्वपूर्ण स्तंभों-न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता पर आधारित है और इन स्तंभों की मजबूती हमारे द्वारा बनाए जा रहे भव्य भारत जैसी महारचना की शक्ति को सुनिश्चित करती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण में अल्पसंख्यक समूहों की भूमिका अभूतपूर्व रही है और वे ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि उन्होंने भारतीय के रूप में अपनी पहचान को ज्यादा महत्व दिया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि "अपने विकास संबंधी एजेंडे के शीर्ष पर राष्ट्रीय हितों को महत्व देते ही अन्य कारक कम महत्वपूर्ण हो जाते हैं।" उन्होंने यह भी कहा कि सबको शिक्षण, धर्नाजन और सक्रिय नागरिक के रूप में उभरने के लिए समान अवसर दिया जाए और यह महत्वपूर्ण है कि हमें एक सीखने-जानने वाले समाज के रूप में उभरना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि "जाति, पंथ, क्षेत्र और भाषाओं के होते हुए भी पहले हम भारतीय हैं।"

उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमें आत्म-परीक्षण करना चाहिए और विभेदकारी, विध्वसंक, अधोगति की ओर ले जाने वाली प्रवृत्तियों और विपथनों को पहचानना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि हमें धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ मिलकर इन पर विजय प्राप्त करनी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि "आंतरिक तनाव उत्पादक नहीं होते हैं और हमें अपने समृद्ध मानव संसाधनों को उत्पादनकारी लक्ष्य प्राप्ति के उद्देश्य की ओर अर्थात् निर्माण की दिशा में लगाना होगा।"

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