उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु ने कहा है कि संसद के कामकाज के बारे में गलत धारणाएं अच्छी नहीं यह अनवरत कार्यरत है

नई दिल्ली
दिसम्बर 11, 2017

उन्होंने विधायिकाओं की रैंकिंग, विपक्ष के लिए कोरम, व्यवधान डालने वालों की दैनिक अधिसूचना, विधायिकाओं के प्रभावी कामकाज के लिए महिलाओं के लिए आरक्षण का सुझाव दिया

श्री नायडु ने कहा कि न्यायालय स्वयं को कानून नहीं बना सकते हैं; संवैधानिक संतुलन को बनाए रखा जाना चाहिए

श्री नायडु का मानना है कि कार्यवाही को बाधित करना और कार्यसंचालन विषयक नियमों का उल्लंघन विधायिकाओं के प्रति नकारात्मक धारणा का मुख्य कारण है

भारत के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति श्री एम. वेंकैया नायडु ने आज देश में विधानसभाओं की प्रभावी कार्यप्रणाली को सुनिश्चित करने के लिए 10 बिंदु वाले चार्टर का सुझाव दिया ताकि लोकतांत्रिक संस्था के प्रति लोगों का सम्मान निरंतर बना रहे।

पीआरएस विधायी अनुसंधान द्वारा आज आयोजित "विधानमंडलों का महत्त्व" विषय पर एक सार्वजनिक व्याख्यान में उन्होंने विस्तारपूर्वक अपने विचार रखे। श्री नायडु ने विधानमंडलों के मुख्य कार्यों, उनके कार्यनिष्पादन, उनके समक्ष चुनौतियों और भावी पथ को रेखांकित किया।

श्री वेंकैया नायडु ने कहा, "(विधानमंडलों के प्रति) गलत धारणाएं प्रभावी संसदीय लोकतंत्र के प्रतिकूल हैं, क्योंकि जनता द्वारा निर्वाचित निकायों के प्रति लोगों का अविश्वास लोकतांत्रिक संस्थाओं के कार्यकरण का क्षरण करता है।" उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस धारणा के विपरीत, विभाग संबंधित संसदीय स्थायी समितियों और संसद की अन्य समितियों के द्वारा संसद पूरे वर्ष कार्य करती है जिससे संसद के विधायी, विचार-विमर्श और निरीक्षण कार्यों की प्रभावकारिता में वृद्धि होती है।

श्री नायडु ने कहा कि 1952-57 के दौरान प्रथम लोकसभा की 677 बैठकें हुई थीं और उनमें 319 विधेयक पारित किए गए थे, जबकि 2004-2009 के दौरान 14 वीं लोकसभा के मामले में 332 बैठकें हुईं और 247 विधेयक पारित किए गए। 15वीं लोक सभा की 357 बैठकें हुई थीं और 181 विधेयक पारित किए गए थे। उन्होंने कहा कि इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं लगाया जा सकता कि संसद अपनी जिम्मेदारी से बच रही है।

श्री नायडु ने बताया कि राज्य सभा की आठ समितियों सहित कुल 24 विभाग संबंधित स्थायी समितियां सभी केन्द्रीय मंत्रालयों की अनुदान मांगों की, विधायी प्रस्तावों और राष्ट्रीय स्तर की नीतिगत पहलों की गहन जांच कर रही हैं। इन समितियों के पास संबंधित मामलों में साक्ष्य और सूचना प्राप्त करने के लिए सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों को बुलाने की शक्ति है। उन्होंने आगे कहा कि 2016 में जहां संसद के दोनों सदनों की लगभग 70 बैठकें हुईं, वहीं विभाग संबंधित स्थायी समितियों की 400 बैठकें हुईं। उद्देश्यपूर्ण विचार-विमर्श और जांच के साथ 2 से 3 घंटे तक की प्रत्येक बैठक के साथ यह संसद की 200 बैठकों के बराबर है और यह साबित करता है कि संसद 24 x 7 काम कर रही है।

राज्यसभा के सभापति का मानना है कि कार्यवाही में बार-बार व्यवधान, विधायिकाओं के सदस्यों का सदन के बीचो बीच आ जाना और सभा के कार्यसंचालन विषयक नियमों का उल्लंघन करना तथा सभापीठ के निर्देशों की अवहेलना करना आदि ऐसे मुख्य कारण हैं जिससे देश की जनता के मन में विधायिकाओं के प्रति नकारात्मक धारणा बनती है और इन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

विधायिकाओं के प्रभावी कार्यकरण के लिए, श्री वेंकैया नायडु ने दस सुझाव दिए जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

1. विधायिका के कार्यनिष्पादन को मापना

राज्य सभा के सभापति ने बैठकों की संख्या, पारित किए गए विधेयकों, लंबित विधेयकों, सदस्यों की भागीदारी, प्रत्येक विधेयक पर बहस की अवधि, बहस की गुणवत्ता और चर्चा योग्य सार्वजनिक हित के मुद्दों की विविधता, व्यवधानों की सीमा, समितियों द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रतिवेदनों आदि के आधार पर 1 से 10 के पैमाने पर विधायिका की प्रभावशीलता और कार्यनिष्पादन के वैज्ञानिक मापन की बात की। उन्होंने विधायिकाओं के सदस्यों के प्रदर्शन का भी इसी प्रकार आकलन करने का सुझाव दिया।

2. देश के विधानमंडलों की रैंकिंग

यह देखते हुए कि राज्यों और शहरों के स्थानीय निकायों को जीडीपी विकास, उपलब्ध अवसंरचना, सामाजिक और मानव विकास सूचकांक, कारोबारी सुगमता, स्वच्छता आदि जैसे विभिन्न मापदंडों पर रैंकिंग दी जा रही हैं, श्री नायडु ने कहा कि देश के सभी विधानमंडलों को भी इसी तरह से रैंकिंग दी जा सकती है और इस रैंकिंग को सार्वजनिक बनाने से संबंधित विधायिकाओं, सरकारों और यहां तक कि संबंधित राजनीतिक दलों पर भी सार्वजनिक दबाव बनेगा।

3. विपक्ष के सदस्यों के लिए गणपूर्ति

यह बताते हुए कि सदन के भीतर गणपूर्ति (सदस्यों की न्यूनतम संख्या) को सुनिश्चित करने के लिए केवल सरकारों और सत्तारूढ़ दलों को ही उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, श्री नायडु ने कहा कि इस तरह की गणपूर्ति को दूसरों पर भी लागू किया जाना चाहिए, क्योंकि सदन में प्रतिनिधित्व वाले प्रत्येक दल का सदन की प्रभावी कार्यवाही में योगदान देना आवश्यक है।

4. व्यवधानों को अधिसूचित करना

कार्यवाही के बार-बार व्यवधानों, सदस्यों का सदन के बीचों-बीच आ जाने और सभापीठ के निर्देशों की अवहेलना करने पर चिंता व्यक्त करते हुए श्री नायडु ने सुझाव दिया कि विधायिकाओं को ऐसे सदस्यों के नाम इस समुक्ति के साथ सार्वजनिक करने चाहिएं कि उन्होंने सभापीठ के निर्देशों की अवहेलना करते हुए और इस प्रकार सदन के कार्यकरण को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हुए नियमों का उल्लंघन किया है।

5. सदस्यों का स्वत: निलंबन

सदन के बीचों-बीच आ जाने वाले सदस्यों की समस्या से निपटने के लिए श्री नायडु ने ऐसा करने वाले सदस्यों के स्वत: निलंबन के लिए कार्यसंचालन विषयक नियमों में एक विशेष उपबंध करने का सुझाव दिया।

6. समावेशी और प्रबुद्ध विधानमंडलों को सुनिश्चित करना

श्री नायडु ने समावेशी और प्रबुद्ध विधायिकाओं को सुनिश्चित करने के लिए सुधारों और शिक्षा के अलावा विधायिकाओं में महिलाओं के उचित प्रतिनिधित्व के लिए महिला आरक्षण विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए कहा।

'संवैधानिक संतुलन' को बनाए रखने की आवश्यकता, जिसके तहत कानून बनाने का अधिदेश विधायिका के पास होने, कानून लागू करने का अधिकार कार्यपालिका के पास होने और कानूनों की व्याख्या करने का अधिकार न्यायपालिका के पास होने, पर बल देते हुए राज्य सभा के सभापति ने कहा कि "न्यायालय स्वयं को कानून नहीं बना सकते हैं" और किसी एक अंग को दूसरों के अधिकारक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

न्यायपालिका के दूसरों के अधिकारक्षेत्र में हस्तक्षेप की कुछ घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने उच्च्तम न्यायालय द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना के लिए कानून को निरस्त करने, पिछले वर्ष राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वाहनों के पंजीकरण पर उपकर लागू करने, डीजल वाहनों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने आदि का उदाहरण दिया।

राज्य सभा के सभापति ने विधायिकाओं को पर्याप्त जानकारी रखने और तैयारी के साथ सदन में आने के लिए आग्रह किया ताकि बहस और हस्तक्षेपों की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके।

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