उपराष्ट्रपति श्री एम.वेंकैया नायडु ने कहा कि भारतीय नागरिक होने का अर्थ संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठते हुए अपनी व्यापक पहचान निर्मित करना है, जो आध्यात्मिक चेतना पर आधारित है।

शिरडी
दिसम्बर 23, 2017

श्री नायडु ने इस तथ्य को दृढ़तापूर्वक सामने रखा कि राष्ट्रवाद का जन्म उद्देश्य और कार्य में सामंजस्य की भावना से होता है।

श्री नायडु ने उल्लेख किया कि शिरडी साईं बाबा ने "परम सत्य" के संदेश को प्रचारित करने के लिए हिन्दुत्व और सूफी मत के तत्वों को एकीकृत किया।

भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम.वेंकैया नायडु ने दृढ़ता के साथ कहा है कि भारतीय नागरिक होने का अर्थ आध्यात्मिक होना है क्योंकि यह संकीर्ण और विभाजनकारी मानसिकता से ऊपर उठते हुए अपनी व्यापक पहचान बनाने की कोशिश है। आज महाराष्ट्र के शिरडी में आयोजित "दूसरा विश्व साईं मंदिर शिखर सम्मेलन" में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए श्री नायडु ने आध्यात्मिक खोज और राष्ट्रवाद के बीच समानता होने की बात कही।

श्री नायडु ने इस बात की चर्चा की कि शिरडी साईं बाबा ने 'सबका मालिक एक' (समस्त संसार एक ही 'ईश्वर' द्वारा संचालित होता है) के परम सत्य के संवाद का प्रचार करते समय हिन्दुत्व और सूफी मत के तत्वों को संयोजित किया जो उनके अनुसार, मानव एकता का सिद्धांत है और जो विश्व के सभी प्रमुख धर्मों को रेखांकित करता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि आध्यात्मिकता शांति स्वरूप को प्राप्त करने के लिए "परम सत्य" की खोज में निहित है, श्री नायडु ने ज़ोर देते हुए कहा कि "राष्ट्रवाद" चेतना के उच्च स्तर की ओर ले जाता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि "भारत वृहत्तर समूह है और भारतीय होने का अर्थ है जन्म, जाति, प्रांत या धर्म आधारित पहचान से परे मानव जाति के उत्थान हेतु संगठित रूप से आगे बढ़ना। राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद व्यापक एकता और एकीकरण के ऐसे माध्यम हैं, जो मनुष्य को एकीकृत करते हुए उनकी प्राथमिक पहचान की सीमा को लांघ जाते हैं। राष्ट्रवाद के इस एकीकरण के सिद्धांत का गलत अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए। एक भारतीय के रूप में स्वयं को अनुभव करना, सोचना और उसी के अनुरूप कार्य करना अपनी प्राथमिक और विभेदकारी पहचान की सीमा से ऊपर उठना है। अतः, मेरे दृष्टिकोण में भारतीय होने का अर्थ आध्यात्मिक होना है, क्योंकि यह भावना हमें पहचान के उच्चतर स्तर, साझे अनुभव, उद्देश्य और कृत्यों की ओर उन्मुख करती है।"

इस बात का उल्लेख करते हुए कि शिरडी साईं बाबा ने उस "आंतरिक अशांति" के समाधान के रास्ते दिखाए हैं जिसका लोगों को सामना करना पड़ रहा है। श्री नायडु ने कहा कि भारत, जिसका एक व्यापक सामासिक एवं सामूहिक अस्तित्व है, सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर कई समस्याओं का सामना कर रहा है जिनके समाधान का सर्वोत्तम विकल्प यही है कि सभी भारतीय राष्ट्रवाद की भावना से युक्त होकर संगठित रूप से इस दिशा में प्रयास करें। उन्होंने ज़ोर देकर कहा, "'नये भारत' के निर्माण के लिए इस तरह के आध्यात्मिक उन्नयन की आवश्यकता है, जिसमें सब एक समान हों और जिसमें सबकी बराबर हिस्सेदारी हो।"

श्री नायडु ने आगे यह कहा कि भारतीय सभ्यता ने 'सर्वे भवन्तु सुखिनः और वसुधैव कुटुंबकम' के सिद्धांतों की शुरू से ही वकालत की है और सभी देशवासियों को इस भावना से प्रेरित होकर साथ मिलकर काम करना चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने भारी संख्या में उपस्थित साईं बाबा के भक्तों और अन्य व्यक्तियों से बाबा की सौवीं पुण्यतिथि के अवसर पर इस संदेश को प्रचारित करने और शांति,एकता और मानवता के बंधन को मजबूत करने का आग्रह किया।

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