भारत ने धर्म को शासन के केन्द्र में रखा है : उपराष्ट्रपति उप राष्ट्रपति महोदय ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अधिवक्ता संघो के सदस्यों को संबोधित किया।

हैदराबाद
नवम्बर 20, 2017

भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु ने कहा है कि भारत ने धर्म को शासन के केन्द्र में रखा है। उन्होंने आज हैदराबाद में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अधिवक्ता संघो के सदस्यों को संबोधित किया। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन, तेलंगाना के उप मुख्यमंत्री श्री मोहम्मद महमूद अली और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि धर्म समाज को स्थायित्व प्रदान करने, सामाजिक व्यवस्था को कायम रखने तथा मानव जात के सार्वलौकिक कल्याण तथा प्रगति के लिए होता है। उन्होंने आगे कहा कि इन उद्देश्यों की पूर्ति में जो कुछ भी सहायक होता है, वही धर्म है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि धर्म को बचाए रखने का अर्थ है हमारी सभ्यता को जीवित रखना और यदि इस विधि के शासन का अनुपालन करेंगे तो हमारा मानव समाज जीवित रहेगा और इसीलिए हम कहते हैं : 'धर्मो रक्षित रक्षित:'। उन्होंने चाणक्य को उद्धत करते हुए कहा, "कानून और नैतिकता के बल पर ही विश्व टिका हुआ है।" उन्होंने कहा कि हमारे जीवन में इसे चरितार्थ करने के लिए हम सबको इस काम में हाथ बटाना है और अपनी भूमिका निभानी है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि कानूनों को लागू किए जाने और न्याय प्रदान किए जाने का कार्य कहीं अधिक प्रभावी तरीके से और तेज गति से किए जाने की आवश्यकता है और यह सब निष्पक्ष और न्यायोचित प्रतीत होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि इस देश में वकीलों, न्यायाधीशों और न्यायालयों का आचरण आम नागरिक के जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है। उन्होंने कहा कि वकीलों के अन्दर का जोश और उनमें व्याप्त गतिशीलता "न्यायिक सक्रियता" का आधार होता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि संस्था के रूप में न्याय प्रत्यावर्तन व्यवस्था अब चौराहे पर है और इसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि नैतिक और नैतिक मूल्यों में सामान्य गिरावट ने न्याय प्रत्यावर्तन व्यवस्था को भी प्रभावित किया है। वकीलों को खुद को बदलते रुझान के अनुरूप ढालना चाहिए और न्यायपालिका में उचित जानकारी के साथ सहयोग करना चाहिए।

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